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Saturday, April 16, 2011

अन्ना का आन्दोलन सवाल और सम्भावनाएं


तमाम प्रश्नचिह्नों के बावजूद इस आंदोलन से अनेक सम्भावनाएं उपजी हैं। युवाओं में एक नये प्रकार का आदर्शवादिताभरा उत्साह देखने को मिला है जिसमें दिशा और उद्देश्य के संकेत निहित हैं। यदि इस जज्बे को स्थानीय स्तरों पर समाज परिवर्तन में तब्दील किया जाए तो अनेक समस्याओं के स्थायी समाधान निकल सकते हैं। दूसरा, इन दिनों तोड़-फोड़, आगजनी, हिंसा, रास्ता रोको, रेल रोको जैसे दादागीरीपूर्ण तरीकों से चलाये जा रहे कथित आंदोलनों के मुंह पर यह एक तमाचा है। शायद इनके नेता यह सबक ले सकें कि आज भी असली शक्ति त्याग और नैतिकता में निहित है न कि स्वार्थ के लिए जोर-जबर्दस्ती से चलायी जा रही हुल्लड़बाजियों में
इसमें दो राय नहीं कि अन्ना हजारे के निर्विवाद और निष्कलंक व्यक्ति के नेतृत्व में जनता की ताकत की यह बहुत बड़ी जीत है। इससे लोकपाल कानून के बेहतर हो सकने तथा जल्दी पारित होने की सम्भावनाएं बढ़ी हैं। किंतु मेरे जैसे व्यक्ति, जिसे '74 के जेपी आंदोलन में लाठियां खाने, जेल जाने और नौजवानों को आंदोलित करने का अवसर मिला था, के मन में बहुत सारी सम्भावनाएं और सवाल उठ रहे हैं। मीडिया ने, खासकर टीवी चैनलों ने ऐसा माहौल खड़ा कर दिया है जैसे देश में क्रांति आ गई हो। अन्ना की तुलना महात्मा गांधी से की जा रही है, जंतर-मंतर को मिस्र का तहरीर चौक बताया जा रहा है और 9 अप्रैल को हुई जीत को दूसरी आजादी का जश्न कहा जा रहा है। गनीमत है, किसी ने मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की तुलना मुबारक या गद्दाफी से नहीं की। अभी लोकपाल विधेयक बनना तो दूर मसविदे के लिए समिति ही बनी है और यदि यही पूरे भारत की जीत है तो हमें सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि आज समाज कितनी गहरी हताशा, दिशाहीनता, नैतिक हृास और नेतृत्वशून्यता में जी रहा है। पार होने के लिए नाव को कब्जा लेने के जज्बे के बजाय अब हम तिनके के सहारे की तलाश भर से संतुष्ट होने लगे हैं। शायद सरकार भी यही चाहती है। कोई भी सरकार इतनी नासमझ नहीं हो सकती कि राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन, टू जी स्पेक्ट्रम, सांसदों की खरीद-फरोख्त जैसे रोज-ब-रोज उजागर हो रहे भ्रष्टाचार कांडों से उपजे जन-आक्रोश से पूरी तरह बेखबर बनी रहे। मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति के मामले में सर्वोच्च न्यायालय तथा संसद में सरकार की हुई फजीहत, विदेशी बैंकों में जमा काले धन को लेकर न्यायालय की डांट-फटकार को न तो सरकार और न ही समाज नजरअंदाज कर सकता है। ऐसी पृष्ठभूमि में अन्ना का अनशन एनजीओ, मीडिया और मध्यवर्गीय समाज को अपने गुस्से तथा अवचेतन नैतिकता के गुबार को निकालने का शायद सबसे उपयुक्त मौका था। टी.वी. चैनलों ने इस आग में सबसे ज्यादा घी का काम किया। सरकार को भी अपनी संवेदनशीलता और साहसपूर्ण नवीनता साबित करने का अच्छा मौका मिल गया। जो आक्रोश अगले चुनावों में सरकार और उसके सहयोगियों के भविष्य को अंधेरे में डाल सकता था, वह मोमबत्तियों के उजालों में तब्दील होता नजर आने लगा।
पूजकों का चरित्र बदलना अनिवार्यता नहीं
हमारा देश अवतारों और चमत्कारों का देश है। हम खुद अपनी रक्षा करने के बजाय किसी त्राता या देवदूत की प्रतीक्षा में जीते हैं। ऐसे में अन्ना हजारे जैसे भले व्यक्ति में एक नया अवतार खोज लेना सबसे आसान है। इसके मायने है कि किसी 'अवतार पुरुष' के बिना भ्रष्टाचार की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। अवतार पूजकों के लिए यह जरूरी नहीं होता कि वे अपना भी चरित्र बदलें। हर तरह का बदलाव तो देवता की जिम्मेदारी है। पिछले तीन दिनों में मास्टर जी भी अपने स्कूली बच्चों को जन-आंदोलनों का 'एक्सपोजर' कराने हेतु जंतर-मंतर जा पहुंचे। किंतु इस सारे मेलों और जश्न में बुनियादी सवाल जस के तस खड़े हैं। क्या अब ये स्कूल और शिक्षक संगठन ईमानदारी से कह सकते हैं कि कक्षाओं के दरवाजे सबसे गरीब बच्चों के लिए खोल दिये गये हैं ? दाखिले में सिफारिश और फीस खत्म करने तथा जी-जान से जुटकर पढ़ाई कराने की प्रतिज्ञा ले ली गयी है? क्या मीडिया मैनेजर सरकारी सुविधाओं के लिए की जाने वाली तिकड़मबाजियों से तौबा कर चुके हैं? क्या इस भीड़-भाड़ में शामिल लोगों, खासकर उद्योगपतियों, कारोबारियों व दुकानदारों ने अनैतिक मुनाफाखोरी खत्म कर अपने कर्मचारियों एवं श्रमिकों के पूरे अधिकार सुनिश्चित करते हुए ईमानदारी से टैक्सों की अदायगी का संकल्प ले लिया है? क्या अब बहती गंगा में हाथ धोने वाले फैशन, फिल्म, खेल, समाज तथा धर्म से जुड़ी हस्तियां आज से ही एक नए जीवन की शुरुआत करने जा रही हैं, जो पक्षपात, अनैतिक सुविधावाद और दूसरों की कीमत पर की जाने वाली मौज मस्ती से मुक्त होगा?
समाजसेवा की दुकानें भी तो हैं
दूसरा सवाल देश भर के गैर सरकारी संगठनों या एन.जी.ओ. के इस आंदोलन में कूद पड़ने से जुड़ा है। निश्चित रूप से इनमें कई संगठन समर्पित, ईमानदार और जनता से जुड़े हुए हैं किंतु ऐसी संस्थाओं की भी कमी नहीं हैं जिन्होंने समाजसेवा की दुकानें खोल रखीं हैं। दानदात्री संस्थाओं और कमीशनखोर अफसरों के अतिरिक्त उनकी न तो कोई जवाबदेही है और न ही वे किसी का प्रतिनिधित्व करते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ रही उनकी आवाज के क्या मायने हो सकते हैं ये अच्छी तरह जाना जा सकता है। तीसरा, यह भी सोचने की बात है कि अन्ना के आंदोलन में लगातार टी.वी. पर नजर आने वाले चेहरे कहीं उन लोगों के तो नहीं जो अभी तक राज्यसभा सदस्य, गवर्नर, राजदूत या दूसरे संवैधानिक पदों के पाने में असफल रहने पर अब अन्ना की नाव के सहारे वैतरणी पार करने में जुट पड़े हैं। अन्ना के प्रमुख सहयोगी बनने की होड़ में जुटे लोगों में से कितनों में यह साहस है कि वे आज ही अपनी नामी-बेनामी सम्पत्तियों, बैंक खातों और परिजनों, संतानों तथा चेलों के नाम पर चलाए जा रहे कारोबारों का विनम्रतापूर्वक जनता के सामने खुलासा कर दें। चौथा सवाल यह है कि क्या लोकपाल ऐसा रामबाण है जो दशानन नहीं बल्कि सहस्त्रानन बन चुके भ्रष्टाचार के रावण की नाभि बेध कर उसका अंत कर सके? हां, कानून से जनता के हाथ में ताकत जरूर आती है लेकिन उसका लागू हो पाना एकदम दूसरी बात है। जहां आधी आबादी नितांत गरीब हो, एक-तिहाई लोग सिर्फ अंगूठा छाप हों और दो तिहाई भर ही थोड़ा बहुत लिखना-पढ़ना जानते हों वहां कानूनों के अलावा यह भी जरूरी है कि सबके लिए अच्छी शिक्षा, सामाजिक और आर्थिक न्याय मिले। दुर्भाग्य से हमारी सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक ढांचा व संस्कृति और चुनाव इन प्राथमिकताओं के अनुकूल नहीं हैं।
पर उम्मीद भी उपजी है
इन तमाम प्रश्नचिह्नों के बावजूद इस आंदोलन से अनेक सम्भावनाएं उपजी हैं। युवाओं में एक नये प्रकार का आदर्शवादिता भरा उत्साह देखने को मिला है, जिसमें दिशा और उद्देश्य के संकेत निहित हैं। यदि इस जज्बे को स्थानीय स्तरों पर समाज परिवर्तन में तब्दील किया जाए तो अनेक समस्याओं के स्थायी समाधान निकल सकते हैं। दूसरा, इन दिनों तोड़-फोड़, आगजनी, हिंसा, रास्ता रोको, रेल रोको जैसे दादागीरीपूर्ण तरीकों से चलाये जा रहे कथित आंदोलनों के मुंह पर यह एक तमाचा है। शायद इनके नेता यह सबक ले सकें कि आज भी असली शक्ति त्याग और नैतिकता में निहित है न कि अपने स्वार्थ के लिए जोर-जबर्दस्ती से चलाई जा रही हुल्लड़बाजियों में। ऐसे समाजशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों के लिए पुनर्विचार की जरूरत है जो जन-आंदोलनों के गांधीवादी तरीकों को प्रभावहीन और अप्रासंगिक साबित कर चुके थे। साथ ही आंदोलनों में मीडिया के साथ-साथ संचार व सम्पर्क की नई-नई तकनीकों जैसे फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग, एस.एम.एस. आदि का महत्व भी सिद्ध हुआ है। इन विधाओं का भला इससे बेहतर इस्तेमाल और क्या हो सकता है? लेकिन यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि बेवजह जन-उन्माद तथा भावना और अपेक्षाओं का आकस्मिक उफान पैदा न करें।

Monday, March 28, 2011

जाट आंदोलन जन का नहीं जाति का आंदोलन है


अभी जाट आंदोलन की गर्मी दिख रही है। आरक्षण की मांग को लेकर इस महीने की प्राय: शुरुआत से ही जाट समुदाय के लोगों ने कई जगह रेलगाड़ियों का रास्ता रोका। फिर उन्होंने दिल्ली को पानी और दूध की आपूर्ति ठप करने की धमकी दी है। अनेक बार इनका विरोध हिंसक स्वरूप भी ले लेता है। कहा जा रहा है कि अभी इसमें और गर्मी आएगी। इस आंदोलन में शरीक लोग इसे जन आंदोलन बता रहे हैं। पर हकीकत यह है कि यह जन आंदोलन नहीं, जाति का आंदोलन है। जन आंदोलन और जाति आंदोलन में बुनियादी स्तर पर कई फर्क होते हैं। जाति आंदोलन और साम्प्रदायिक आंदोलन का चरित्र संकुचित और स्वार्थपरक होता है और इनमें भीड़ का इस्तेमाल एक निश्चित स्वार्थ के लिए होता है। हमें यह समझना होगा कि यह वास्तविक जन आंदोलन नहीं है। हकीकत तो यह है कि आज देश में कहीं भी वास्तविक जन आंदोलन नहीं हो रहा है। वास्तविक जन आंदोलन तो ट्यूनीशिया में हुआ, मिस्र में हुआ और अब लीबिया में हो रहा है। वहां जन की ताकत बड़े और बुनियादी बदलावों के खिलाफ आंदोलन कर रही है। अपने यहां कहीं-कहीं विरोध-प्रदर्शन कुछ मुद्दों पर हो तो रहे हैं लेकिन इन्हें जन आंदोलन नहीं कहा जा सकता है। दरअसल, अपने देश में जन आंदोलन राह भटक गए हैं। आजादी के लिए महात्मा गांधी ने बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। उन्होंने इसे समाज और संस्कृति से जोड़ा था। जब देश आजाद हुआ तो 1970 तक देश के जन आंदोलनों ने गांधी जी के रास्ते पर चलते हुए लोगों के हक और हित की बात की। '70 के दशक में युवाशक्ति का उभार दिखा। बिहार आंदोलन से बात शुरू हुई और यह फिर पूरे देश में फैली और सम्पूर्ण क्रांति बन गई। इसने सत्ता भी बदल दी। आंदोलन करने वाले सत्ता में आ गए पर जनता को यह पता चल गया कि समाज परिवर्तन सत्ता परिवर्तन से नहीं होता। इसके बाद कुछ लोग छोटी-छोटी जगहों पर जाकर बदलाव के लिए काम करने लगे तो कुछ नक्सल आंदोलन में शामिल हो गए। '80 के दशक में किसानों, मजदूरों, मछुआरों और अन्य ऐसे वगरें की एकजुटता शुरू हुई। इन्होंने अपने हक और हित की बात एकजुट होकर उठाई और जन आंदोलन को नई परिभाषा देने का काम किया। इसी दौरान कुछ आंदोलनों ने राजनीति का हिस्सा बनने की भी कोशिश की। राममनोहर लोहिया कहते थे कि सत्ता के प्रति आग्रह और सम्पत्ति के प्रति मोह से दिक्कतें पैदा होंगी। जन आंदोलनों के भटकाव की वजह यही बना। '90 के दशक में उदारीकरण और भूमंडलीकरण भारत पहुंचा। विदेशी पैसा भारत पहुंचा और पूरे देश में एनजीओ संस्कृति का प्रसार होने लगा। इनका चरित्र सामाजिक आंदोलन का कम और संस्था व प्रबंधन का अधिक होता है। इससे जन आंदोलनों की सामाजिक स्वीकार्यता को झटका लगा। पहले ये जनता के प्रति जवाबदेह होते थे लेकिन अब ये अनुदान देने वालों के प्रति हो गए। पश्चिमी तौर-तरीके अपनाए गए और 2000 आते-आते तो पूरी शब्दावली भी पश्चिमी हो गई। कहा जा सकता है कि 2010 से एनजीओ के जरिए जन आंदोलन चलाने वालों का चरित्र अंतरराष्ट्रीय हो गया। वेबसाइट, मीडिया और रिपोर्ट में इनका काम तो ज्यादा दिखता है लेकिन जमीन पर कम। अहम सवाल यह है कि वास्तविक जन आंदोलन और एनजीओ के जन आंदोलन के फर्क से जो सामाजिक स्वीकार्यता घटी है और खाई बढ़ी है, उसे कैसे पाटा जाए? इस बात पर विचार करना होगा कि जिनके लिए आंदोलन चल रहा है, उनका हित कैसे सधे?