पिछले दिनों मिर्चपुर में जातीय हिंसा के बाद पुलिस ने कुछ युवाओं को गिरफ्तार किया था, जिनका संबंध जाट समुदाय से था। इसके विरोध में जाटों की एक खाप पंचायत ने इस साल जनवरी में 11 दिन तक हरियाणा के जींद जिले में आंदोलन किया था। रेल व सड़क यातायात को रोका गया, रेल पटरियां उखाड़ी गई और बसों में आग लगाई गई। इसके अलावा आंदोलनकारियों ने रेलवे व सड़क पर जाम लगाने के लिए 3,130 पेड़ काट डाले, जिससे पर्यावरण को गहरा नुकसान हुआ और राज्य सरकार को कटे हुए पेड़ हटाने के लिए 90 हजार रुपये खर्च करने पड़े। साथ ही बसों को रिपेयर कराने में ढाई लाख रुपये का खर्च आया। इस आंदोलन से आम जनता को जो नुकसान हुआ, वह अपनी जगह है। अब लगता यह है कि बतौर हर्जाना खाप पंचायतों को 33.95 करोड़ रुपये भरना पड़ेगा। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व हरियाणा राज्य सरकार से कहा है कि वह इन खाप पंचायतों से जुर्माना वसूल करने के रास्ते बतलाए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उत्तर रेलवे और हरियाणा सरकार ने आंदोलन के कारण हुए नुकसान का अनुमान लगाया था। विरोध का यह अराजक और गैरकानूनी उदाहरण इकलौता नहीं है। यहां आए दिन विरोध और अपनी मांगे मनवाने के नाम पर देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अपनी उचित या अनुचित मांगे मनवाने के लिए राजनीतिक या गैर राजनीतिक संगठन आंदोलन करते हैं। ये आंदोलन अक्सर हिंसा का रूप धरण कर लेते हैं, जिनमें सरकारी-निजी संपत्ति को गहरा नुकसान पहंुचता है और आम जनता को भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके मद्देनजर रखते हुए देश की विभिन्न अदालतें बंद, आंदोलनों व प्रदर्शनों के खिलाफ फैसले सुनाती रही हैं और इन्हें प्रायोजित करने वाली पार्टियों पर जुर्माने भी लगाती रही हैं। मसलन, केरल में वामपंथियों द्वारा आयोजित बंद को उच्च न्यायलय ने गैर कानूनी घोषित किया था और माकपा पर जुर्माना किया था। इसी तरह मुंबई में शिवसेना पर जनसंपत्ति नष्ट करने के लिए 20 लाख रुपये का जुर्माना किया गया था। अदालतों द्वारा इस किस्म के जुर्माने लगाने का उद्देश्य यह प्रतीत होता है कि सरकारी व गैर सरकारी संपत्ति को नुकसान से बचाया जाए और जनता को असुविधा से दूर रखा जाए। संभवत: इसी तथ्य को मद्देनजर रखते हुए सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश जीएस संघवी और न्यायाधीश एके गांगुली की खंडपीठ ने राजस्थान के गूर्जर आंदोलन, हरियाणा के खाप आंदोलन आदि का जायजा लेते हुए कहा था, दुर्भाग्य से आज की सरकारें खामोश हैं। हर कोई खामोश है। हम इसे जारी नहीं रहने दे सकते। अदालतें सभी समस्याओं का समाधन नहीं कर सकतीं, लेकिन कानून के शासन को बरकरार रखने के लिए उन्हें हस्तक्षेप करना पड़ेगा और इनमें सबसे बुनियादी सवाल है सभ्य समाज। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट यह नहीं चाहता कि कोई व्यक्ति या संगठन अपनी मांगें मनवाने के लिए इस किस्म का आंदोलन करे, जिसमें संपत्ति नष्ट हो या जनता को असुविधा हो। सुनने में यह बात बहुत अच्छी और आदर्शवादी लगती है, लेकिन सवाल यह है कि वह कौन-सा तरीका है, जिसके जरिये गूंगी-बहरी सरकार से अपनी मांगें मनवाई जाएं? खामोशी और सभ्य तरीके से की गई इलतिजा तो कोई सुनता नहीं। इस बात पर बहस हो सकती है कि जींद जिले में खाप पंचायत का आंदोलन सही था या नहीं, लेकिन इस आंदोलन की आड़ में सभी आंदोलनों को शामिल करके सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी नजीर पेश की है, जो चिंता का विषय है। इस पर आगे विचार करने से पहले यह जरूरी लगता है कि जींद आंदोलन को संक्षेप में दोहरा दिया जाए। हुआ यह था कि हरियाणा के मिर्चपुर गांव में एक जातीय संघर्ष के दौरान दलितों के मकानों में आग लगा दी गई थी, जिसमें एक 70 वर्षीय व्यक्ति और उसकी अपाहिज बेटी जलकर राख हो गए थे। इस आगजनी व हत्या के आरोप में पुलिस ने सवर्ण जाति के कुछ युवकों को गिरफ्तार किया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में 11 खाप पंचायतों ने जींद में 11 दिन तक रेल व सड़क यातायात बंद रखा। इस चक्काजाम के लिए हजारों पेड़ काटे गए, राज्य परिवहर की बसों में आग लगाई गई और रेल पटरियां उखाड़ी गई। इसे मद्देनजर रखते हुए सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने 31 जनवरी को गंभीर रुख अपनाते हुए कहा, सरकार किस तरह मुट्ठीभर लोगों को यह अनुमति दे सकती है कि वह दूसरों को जनयातायात इस्तेमाल न करने दे? क्या सरकार पूरी तरह असहाय थी? यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर रेलवे और हरियाणा सरकार को आदेश दिया कि वह खापों द्वारा प्रायोजित आंदोलन से हुए नुकसान का अनुमान लगाएं। यह नुकसान 33.95 करोड़ रुपये आंका गया है और पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकारों को आदेश दिया कि वह शपथपत्रों द्वारा बताएं कि जिन खाप पंचायतों को मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने समाजिक संगठन कहा है, उनसे यह जुर्माना किस तरह से वसूल किया जाए। लेकिन इस जुर्माने को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के गूर्जर व अन्य आंदोलनों की ओर भी इशारा किया है। इससे यह चिंता बढ़ गई है कि क्या सुप्रीम कोर्ट सभी आंदोलनों पर प्रतिबंध लगाना चाहता है? अगर ऐसा है तो फिर राज्य सरकारों या केंद्र से जायज मांगें मनवाने का कौन-सा रास्ता होगा? यह सही है कि लोकतंत्र में कोई भी आंदोलन हिंसक नहीं होना चाहिए, लेकिन यह भी देखने को मिलता है कि जब तक आंदोलन में थोड़ी उग्रता शामिल न हो, सरकारों की कान पर जूं तक नहीं रेंगती। यह अफसोस की बात है कि लोकतंत्र के 63 वर्ष बाद भी हम जन विरोध व्यक्त करने का ऐसा कोई तरीका विकसित नहीं कर पाए हैं, जो शांतिपूर्ण हो और जिस पर राज्यों व केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया तेजी से आए और सकारात्मक हो। जापान में किसी बात का विरोध करने या मांगे पेश करने के लिए कर्मचारी काली पट्टी बांधकर काम पर जाते हैं और उत्पादन को तेज कर देते हैं। जापान सरकार के लिए मांजरा समझने को इतना ही इशारा काफी होता है, लेकिन जापान के इस मॉडल को कहीं और नहीं अपनाया गया है और अब अपने देश में संभव है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसी ही भावनाएं रखता हो कि विरोध के तरीके सभ्य और किसी को परेशानी में न डालने वाले हों। मगर सवाल है कि क्या जापान की तरह हमारे देश की सरकार भी इस तरह के विरोध प्रदर्शन के प्रति उतनी ही संवेदनशीलता दिखाएगी, जितना जापान की सरकार या वहां का जनमानस दिखाता है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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