Monday, March 14, 2011

फैसलाकुन संघर्ष में भिड़े हैं लोग


झारखंड के आदिवासियों ने पिछले दो दशकों में केवल इचा चारकई, कोयलकारो और नेतरहाट जैसे सफल आंदोलनों ने विकास के वर्तमान मॉडल को चुनौती दी है। इन आंदोलनों में उन लाखों लोगों की भागीदारी की, जिनकी वजह से एक इंच भी जमीन कम्पनियां नहीं ले पाई
लड़ेंगे-जीतेंगे और जान देंगे जमीन नहीं जैसे नारों से झारखंड के आदिवासी इलाके अपनी पारम्परिक प्रतिरोध चेतना के साथ प्राकृतिक संसाधनों बचाने के लिए फैसलाकुन संघर्ष कर रहे हैं। मानो जंगलों में पलाश के लाल फूल जंगल के इरादों को प्रकट कर रहे हैं। आदिवासी गीतों में कहा गया है कि जब तक आदिवासी नाचते गाते रहेंगे उन्हें न तो सांस्कृतिक तौर पर खत्म किया जा सकता है और न ही उनके स्वशासन के अधिकार को छीना जा सकता है। प्राकृतिक संसाधनों पर उनके नैसर्गिक हक भी बचे रहेंगे। एक ओर जहां संघर्षो में यह मिथकीय बोध सामूहिकता को प्रकट करता है वहीं राजनीतिक यथार्थ बता रहा है कि शासक समूहों ने न केवल आदिवासियों को बड़े पैमाने पर उजाड़ने के लिए कारपोरेट घरानों से सहमति बना ली है बल्कि सदियों पहले कोल विद्रोह, संताल हूल और बिरसा मुंडा, उलबुलान के बाद अंग्रेज शासकों ने आदिवासी स्वशासन पण्राली के माध्यम से जिन काश्तकारी प्रशासकीय संधियों को अंजाम दिया था उसे बदल देने की दिशा में निर्मम कदम उठाया जा रहा है। ग्रीनहंट के नाम पर आदिवसियों को डराने की कोशिश की जा रही है। बावजूद झारखंड में दर्जनों स्थानों पर आदिवासियों के जनता कर्फ्यू तथा दिकू प्रवेश निषेध जैसे कार्यक्रमों से देश-दुनिया के तमाम कारपोरेट परेशान हैं। सरकार पर उनका दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे काश्तकारी अधिनियमों को जल्द बदले ताकि जमीन लेने के लिए उन्हें कठिनाई न हो। आदिवासी आंदोलनों से निकलने नेताओं को पल्रोभन दिया जा रहा है और जो तन कर खड़े हैं उन्हें माओवादी बताने की। काठीकुंड का आंदोलन इसकी बानगी है। पावर प्लांट के खिलाफ गांव सभाओं ने पेसा के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल किया और आंदोलन खड़ा किया तो उन पर गोली चलाई गई और नेतृत्व के अनेक लोगों को माओवादी सम्पर्क के नाम पर जेल में बंद कर दिया गया। इसी तरह सिंहभूम के पोटका में ग्रामीण स्अली फैक्ट्ी लगाने के खिलाफ उठ खड़े हुए तो उनके नेता कुमारचंद्र मार्डी को अनेक लोगों के साथ जेल में बंद कर दिया गया। फिर भी आंदोलन थमा नहीं। अब इन आंदोलनकारियों का माओवादी सम्पर्क दिखाने की साजिश कम्पनी और पुलिस कर रही है। हुआ यह कि जब मार्डी और उनके साथियों को बंद किया गया तो एक माओवादी कमांडर ने बयान में कहा कि मार्डी गांधीवादी हैं और लम्बे समय से शांतिपूर्ण संघर्ष कर रहे हैं लेकिन उनकी बात सरकार नहीं सुन रही है। यही बयान प्रशासन की साजिश का केंद्र बन रही है। मित्तल जैसी बड़ी स्टील ताकत को दयामनी बरला के नेतृत्च में खूंटी-गुमला के आदिवासियों ने खदेड़ दिया। शांतिपूर्ण इस लड़ाई में कम्पनी और प्रशासन ने दयामनी को डराने के लिए एक हथियारबंद आपराधिक गिरोह का सहारा लिया। अब जब दयमानी बरला छाता नदी पर बनने वाले डैम का विरोध कर रहे ग्रामीणों के साथ खड़ी है तो उसे सभी ओर से आतंकित करने का प्रयास किया जा रहा है। सूचना अधिकार के तहत जब दयामनी ने यह जानने की कोशिश की कि यह डैम किस योजना के तहत बन रहा है तथा इसमें कितने लोग विसथापित होंगे तो सरकारी तंत्र ने लिखित बताया कि उसे इस डैम के बनने की जानकारी नहीं है। यही बात झारखंड के वरिष्ठ अधिकारी और खूंटी के उपायुक्त भी कह रहे हैं। इस तरह चुपके-चुपके आदिवासियों को उजाड़ने की कई योजनाओं के बारे में जानकारी मिली है जहां आदिवासी जल-जमीन-जंगल बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। झारखंड के आदिवासियों और मूलवासियों ने पिछले दो दशकों में न केवल इचा चारकई, कोयलकारो और नेतरहाट जैसे सफल आंदोलनों से विकास के वर्तमान मॉडल को चुनौती दी है। इन आंदोलनों के सफल होने के कारण उन लाखों लोगों की भागीदी रही, जिन्होंने सामूहिक नेतृत्व में ऐतिहासिक चेतना के साथ प्रतिरोध को उन्नत किया। इन आंदोलनों के कारण एक इंच जमीन कम्पनियां नहीं ले पायीं। 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद विभिन्न सरकारों ने 104 एमओयू विभिन्न कम्पनियों के साथ किए तो पूरे झारखंड में यह नारा बुलंद हो गया कि एक इंच जमीन नहीं देंगे। अरुंधति राय ने रांची पहुंच कर कहा कि वे झारखंड के लोगों को सलाम कहने आई हैं कि जंगल में से एक इंच जमीन नहीं दी गयी। झारखंड के विस्थापन विरोधी आंदालनकारी बताते हैं कि लोगों की सामूहिकता को तोड़ने के लिए ग्रीनहंट का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्हीं इलाकों में ग्रीनहंट का ज्यादा प्रभाव है, जहां कम्पनियों से सरकार ने सहमतियां की हैं। इन दोनों के बीच के संदर्भ को व्यापक परिप्रेक्ष्य में टाला नहीं जा सकता। अभी हाल में जब खरसवां का उपचुनाव हो रहा था तो टोंटो पोसी गांव के आसपास के आदिवासियों के विरोध को देखते हुए वोट के लिए अर्जन मुंडा को भी कहना पड़ा कि बिना लोगों की सहमति के योजनाएं जमीन पर नहीं बनायी जाएगी लेकिन चुनाव जीतने के बाद वे फिर सक्रिय हो गए हैं। आदिवासियों को लगता है कि वर्तमान सरकार का गठन कराने में कुछ खास उद्योग घरानों की भूमिका रही है और उन्हीं के इशारे पर छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम को, जो बिरसा मुंडा की शहादत के बाद 1908 में बना था और जिसके तहत आदिवासियों की जमीन संरक्षित है, बदलने का प्रयास किया जा रहा है। इसी क्रम में संतालपरगना काश्तकारी अधिनियम को संशोधित करने की राजनीतिक दलों के इरादों के खिलाफ रांची सहित राज्य के अन्य हिस्सों में रोज प्रदर्शन हो रहे हैं। लगता है बिरसा मुंडा के वंशज नए रूप में अपने संसाधन की हिफाजत करने जंगल से निकल रहे हैं।


No comments:

Post a Comment