हमें यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सभी नकली चालकों को उनके रिश्तेदारों ने ही मदद की है। यह साधन तो बहुत बड़ा है लेकिन इससे भिन्न शुद्ध दलाली के माध्यम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए जरूरी है कि नकली चालकों ही नहीं, उन्हें मदद पहुंचाने वाले अफसरों और उसके लिए अपनाई जाने वाली कानूनी कमजोरियों को भी जांचना होगा
जब बाजार गर्म हो तो चोरबाजारी भी गर्म होगी ही। चोरबाजारी केवल घटिया माल बेचना ही नहीं होता, घटिया और जानलेवा सेवा देना भी इसी वर्ग में आता है। छोटी हाट में चोरबाजारी कौन करेगा और कैसे? छोटे-छोटे देहाती बाजारों में ग्राहक और व्यापारी सब एक-दूसरे को जानते हैं और उनके बीच दुकानदारी के अतिरिक्त सामाजिक रिश्ते भी होते हैं। बहुत कुछ छिपा कर रखना आसान नहीं होता। लेकिन दिलचस्प बात है कि व्यापक और सार्वभौमिक बाजारवाद के इस दौर में रिश्तों और जान-पहचान के मायने भी बदल गए हैं। अब तो ये भी चोरी और छल कपट के साधन बन गए हैं। बाजार के किसी भी पहलू में इसे देखा जा सकता है, लेकिन फिलहाल हम हवाई यात्रा पर ही नजर डालें, जिसका सम्बंध हमारी व्यावसायिक सफलता से तो है ही, हमारी जान की सुरक्षा से भी है। दरअसल, इसीलिए नकली विमान चालकों के मामले पर इतना शोर मचा है- इसमें जान जाने का खतरा आम आदमी के साथ-साथ बड़े नेताओं और व्यापारियों को भी तो है। मीडिया के होहल्ला करने से घबराकर अब नागरिक उड्डयन के महानिदेशक ने अपने ही अधिकारियों की जांच पड़ताल आरम्भ करने का असाधारण आदेश जारी कर दिया है। इसके अनुसार सभी अफसरों के बारे में पता लगाना है कि उनके कौन-कौन से रिश्तेदार विमान सेवा चलाने वाली कम्पनियों में काम करते हैं। अगर हैं तो क्या उनके बारे में नियमों के अनुसार उन्होंने विभाग को पहले से सूचित किया है। ऐसा करने की जरूरत इसलिए आ पड़ी क्योंकि पिछले कई सालों से नकली हवाई प्रशिक्षण और प्रमाणपत्रों के आधार पर न जाने कितने ही विमान चालक हमारी वायु सेवाओं में भर्ती हो गए हैं। भर्ती ही नहीं हुए हैं, महत्वपूर्ण मागरे पर विमान भी चलाते रहे हैं। ऐसे नकली चालकों में बहुतों को उड्डयन महानिदेशालय में काम करने वाले अफसरों ने ही चालक का लाइसेंस दिलवाया है । निजी विमान सेवाओं को अपने मुनाफे से तो मतलब होता ही है, लेकिन महानिदेशालय की 'वक्र नजर' से भी तो बचना आवश्यक है। इसलिए अगर किसी अफसर ने अपने बेटे-बेटी या अन्य किसी रिश्तेदार को नौकरी पर लगाने को कहा है तो उसे कैसे टाला जाएगा, उस उम्मीदवार के बारे में अधिक जांच- पड़ताल करना भी मुनासिब नहीं होता। आखिर लाइसेंस तो महानिदेशालय ने ही दिया है न। यह चलन तो अब हर व्यापारिक घराने में है कि दो-चार कर्मचारी ऐसे हों जो उन सरकारी विभागों के हों जिनसे रोज-रोज का काम पड़ता है। भला हो परमेंदर कौर गुलाटी का, जिसकी गलती से नकली चालकों के इस व्यापक कुचक्र से परदा उठ गया। 11 जनवरी को निजी विमानसेवा का एक विमान अचानक हवाई अड्डे पर ऐसे उतरा जैसे किसी ने उसे फेंक दिया हो। इसे वैमानिक 'हार्ड लैंडिंग' कहते हैं जब कि जहाज को धीरे से बिना किसी धक्के के जमीन पर उतरना चाहिए। चालक परमेंदर कौर गुलाटी को दोषी मानकर अस्थायी तौर पर चालक के काम से हटा दिया गया। फिर भी कुमारी गुलाटी की रिश्तेदारी काम आई और उसे परिवहन विमान चलाने का लाइसेंस मिल गया, वह भी नकली प्रमाणपत्रों के आधार पर। अगर यह मामला ऐसे नहीं खुलता तो बाकी सभी मामलों पर परदा पड़ा ही रहता। अब तक पांच नकली चालकों के बारे में पुलिस को सूचना मिली है। ऐसे अधिकतर चालकों ने अपनी परीक्षा में प्राप्त अंकों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया है, लेकिन कुछ ने तो तकनीकी प्रशिक्षण अधिकारियों की आंखों में भी धूल झोंक दी जिनका काम चालक की तकनीकी क्षमता को जांचना होता है। यह संदेह पैदा होना स्वाभाविक है कि हर स्तर पर अधिकारियों की यह भूल कहीं जानबूझ कर तो नहीं की गई। यह बताने की जरूरत नहीं कि नकली और तकनीकी तौर पर अक्षम चालक विमान यात्रियों के लिए यमदूतों की तरह हो सकते हैं। हम नहीं जानते कि पिछले कई सालों में जो हवाई हादसे हुए उन में कितनों में अक्षम और अप्रशिक्षित चालकों की भूमिका रही है। लेकिन महत्वपूर्ण है कि हम यह भी नहीं जानते कि हमारी विमान सेवाओं में आज भी कितने अप्रशिक्षित चालक काम कर रहे हैं। उड्डयन महानिदेशालय ने जो कार्रवाई आरम्भ की है उस के पीछे कितना बड़ा संकल्प है और उसे कितनी कुशलता से तार्किक परिणति तक पहुंचाने का प्रयास होगा, इसके बारे में कोई पक्का दावा नहीं किया जा सकता है। पर मान लें कि इसे सचमुच उतनी ही मुस्तैदी से चलाया जाएगा जितनी जरूरत है, तो इससे पूरी तरह नहीं, लेकिन आंशिक तौर पर तो यह पता किया जा सकता है कि कौन-कौन से चालक संदिग्ध हो सकते हैं। संदेह के घेरे में आने के बाद असली अपराधियों को पकड़ना आसान होगा। सभी को नहीं। हमें यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि ऐसे सभी नकली चालकों को उनके रिश्तेदारों ने ही मदद की है। यह साधन तो बहुत बड़ा है, पर इससे भिन्न शुद्ध दलाली के माध्यम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए आवश्यक है कि नकली चालकों ही नहीं, उन्हें मदद पहुंचाने वाले अफसरों और उसके लिए अपनाई जाने वाली कानूनी कमजोरियों को भी जांचना होगा । निदेशालय ने नकली अंक तालिकाएं बनवाने के कुचक्र को रोकने के लिए अंक देने की प्रथा को ही समाप्त करने का फैसला किया है। अब प्रशिक्षण के बाद छात्र को परीक्षा में अंक नहीं दिए जाएंगे। वह अंक दिखाकर अपना परिणाम नहीं सिद्ध कर सकता है। परीक्षा का केवल परिणाम घोषित किया जाएगा। वास्तविक मूल्यांकन केवल निदेशालय के पास सुरक्षित रखा जाएगा और लाइसेंस देने से पहले उस सुरक्षित मूल्यांकन से मिलान करना आवश्यक होगा। उड्डयन व्यवस्था में अलग- अलग विभागों के बीच तालमेल के अभाव के कारण भी इस व्यवस्था में घुन लग गया है।
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