उप्र : टुकड़ों-टुकड़ों में जारी है जमीन की आजादी की जंग
1,047 किलो मीटर लम्बा गंगा एक्सप्रेस हाइवे निर्माण कार्य जो फिलहाल रुका हुआ है। वह देश की सबसे ज्यादा भूमि अधिग्रहीत करने वाली परियोजना है। इससे न सिर्फ लाखों किसान अपनी जमीन से बेदखल होंगे बल्कि पर्यावरण की भारी तबाही मचेगी
2006 दादरी, 2007 घोड़ी बछेड़ा, 2008 बादलपुर, 2009 टप्पल, 2011 कचरी और बारा समेत तमाम ऐसी तारीखें हैं जो अब उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन की तवारीख बन गई हैं। दादरी से शुरू हुआ भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसान आंदोलन आज सैकड़ों किलोमीटर दूर पूरब में कचरी, करछना में प्रतिरोध के नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है। तो वहीं इलाहाबाद के बारा के किसानों ने जेपी के पावर प्लांट के लिए भूमि-अधिग्रहण और पुनस्र्थापना नीति के विरुद्ध अपनी उपजाऊ जमीनों को बचाने के लिए आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। यूपी में मुलायम सरकार द्वारा दादरी में भूमि- अधिग्रहण किये जाने के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंकने वाले पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने भी यही कहते हुए आंदोलन शुरू किया था कि गुलाम भारत के जनविरोधी कानून को हथियार बनाकर आजाद भारत में भूमि अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। सरकार जनहित के नाम पर किसानों की जमीन अधिग्रहित करने का फरमान जारी कर देती है लेकिन जनहित के दायरे की व्याख्या करना मुनासिब नहीं समझती। दादरी के किसान आंदोलन के दबाव के चलते तत्कालीन केंद्र सरकार ने भूमि-अधिग्रहण अधिनियम 1894 में संशोधन का बिल लाई थी। वह बिल केंद्र सरकार के ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। 1047 किलोमीटर लम्बा गंगा एक्सप्रेस हाइवे जो फिलहाल रुका हुआ है। वह देश की सबसे ज्यादा भूमि अधिग्रहित करने वाली परियोजना है। इससे न सिर्फ लाखों किसानों अपनी जमीन से बेदखल होंगे बल्कि पर्यावरण की भारी तबाही मचेगी। यूपी में चल रहे भूमि अधिग्रहण आंदोलनों में सबसे सशक्त आंदोलन कृषि-भूमि बचाओ मोर्चा, गंगा एक्सप्रेस हाइवे का है जिसने मुआवजे से लेकर नौकरी देने के हर वादे को खारिज करते हुए किसी भी कीमत पर जमीन नहीं देने का निर्णय लिया है। बलिया, गाजीपुर और वाराणसी समेत कई जगहों पर जबरिया की गई पैमाइश के खूंटों को उखाड़ने के साथ ही किसानों ने इस पूरी परियोजना के खूंटे उखाड़ दिए हैं। पिछले दिनों कचरी करछना में जेपी द्वारा पावर प्लांट के नाम पर जो 2500 एकड़ भूमि अधिग्रहित की जा रही थी, उसमें 1660 एकड़ भूमि उपजाऊ थी। इस पावर प्लांट को 50 से 60 एकड़ में बनाया जा सकता है पर पावर प्लांट की आड़ में यहां जमीनों का बंदरबाट किया जा रहा है। दो साल पहले जिस जेपी ने पत्थर गाड़ा था वह बाद में नौकरी देने के अपने वादे से पीछे हट गई। ठीक इसी तरह 165 किलोमीटर लम्बे यमुना एक्सप्रेस हाइवे के नाम पर 14 लाख किसानों को उजाड़ा जा रहा है। इस जमीन अधिग्रहण घोटाले को इस बात से भी समझा जा सकता है कि पूरी सड़क के लिए जहां 1546 हेक्टेयर जमीन ली गई है, वहीं हाई-टेक सिटी बनाने के नाम पर 2500 हेक्टेयर जमीन ली गई है। 29 मई 2008 को यमुना एक्सप्रेस हाई-वे को लेकर किसानों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर जमीन देने से इनकार कर दिया। जिस पर कोर्ट ने अक्टूबर 2009 में सुनवाई करते हुए परियोजना पर अस्थायी रोक लगा दी। पर 2 जुलाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टप्पल के किसानों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि परियोजना से प्रभावित हो रहे सभी जिलों के किसानों के टप्पल इलाके के किसानों का औसत सिर्फ 20 प्रतिशत है। अत: उनके विरोध के मायने नहीं हैं। अदालत के इस फैसले के बाद किसानों के पास तीन महीने के वक्त था जिसके भीतर वह अपील कर सकते थे। पर कम्पनी ने अधिगृहित की गई जमीन पर काम शुरू कर दिया। फिर क्या था, शुरू हुआ टप्पल किसान आंदोलन जिसमें टप्पल के पास के गांव जहानगढ़ के 12 वर्षीय प्रशांत, किरपालपुर के 13 वर्षीय मोहित समेत पांच लोग पुलिस फायरिंग में मारे गए। अपनी जान देकर भी अपनी जमीन बचाने की यह लड़ाई जब कचरी करछना पहुंची तो भी पुलिस ने किसानों पर फायरिंग की जिसने इस बात को पुख्ता कर दिया कि हमारी लोकतांत्रिक सरकारें अपने कारपोरेट हितों के लिए किस हद तक जा सकती हैं। यमुना में बालू खनन को लेकर इलाहाबाद और कौशाम्बी में चल रहा खनन मजदूरों का आंदोलन भी पुलिसिया हिंसा का लम्बे समय से शिकार है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्देश है कि यमुना में मशीनों से खनन नहीं किया जा सकता। ऐसे में मशीनों द्वारा खनन किए जाने पर जब मजदूरों ने आंदोलन किया तो कौशाम्बी के नंदाका पुरा गांव में पुलिस ने माओवाद के नाम पर लोगों को घरों से निकालकर पीटा, उनकी बस्ती में आग लगा दी और धारा 144 के उल्लंघन तथा गैंगस्टरआदि धाराओं में जेल में ठूंस दिया। होना तो यह चाहिए था कि अवैध रूप से चल रही बालू खनन की मशीनों को रोका जाता। यहां सबसे दिलचस्प पहलू है कि लाल सलाम नारा लगाने के आधार पर इसे माओवादी आंदोलन की श्रेणी में रखने की हर सम्भव कोशिश प्रशासन करता है। वहीं सोनभद्र की सोन नदी को बंधक बना लिया गया है। चोपन ब्लाक के अगोरी किले का क्षेत्र कैमूर सेन्चुरी एरिया में आता है। इस किले के सामने सोन नदी पर पुल व सड़क बनाकर नदी की धार मोड़ दी गयी है और जेसीबी मशीन लगाकर बड़े पैमाने पर बालू का खनन चौबीस घंटे किया जा रहा है। इतना ही नहीं सोन नदी पर जगह-जगह बने पुलों और बांधों के कारण किसानों की सिचांई के लिए बनी सोन लिफ्ट परियोजना पर भी संकट आ गई है। पूरा मिर्जापुर-सोनभद्र का यह क्षेत्र पहाड़ों से घिरा हुआ है। कुछ एक अपवादों को छोड़ दिया जाएं तो सभी पहाड़ रिजर्व फारेस्ट व सेंचुरी एरिया में आते हैं। हजारों क्रेशर माफिया यहां खनन के लिए ब्लास्टिंग करते हैं जबकि पर्यावरण विभाग ने सोनभद्र जनपद में 264 क्रेशरों को ही अनुमति प्रदान की हुई है। अनपरा, ओबरा, हिण्डालको, रेनूसागर, कन्नौरिया जैसी औद्योगिक परियोजनाओं में एक ही स्थान पर पिछले 20-25 वर्षो से संविदा श्रमिक कार्य कर रहे थे। 6 अक्टूबर 2010 को 200 संविदा मजदूरों की छंटनी के खिलाफ 20 नवम्बर को शुरू हुई हड़ताल में सात हजार मजदूरों ने भाग लिया जो दस दिनों तक चली। इस आंदोलन में प्रबंधन और मजदूरों दोनों की ही तरफ से एफआईआर किया गया। पर पुलिस ने मजदूरों के एफआईआर पर अंतिम रिपोर्ट लगा दी वहीं प्रबंधन के पक्ष में चार्ज शीट दायर कर मजदूरों पर आपराधिक धाराएं थोप दीं। लम्बे संघर्षो से हासिल वनाधिकार कानून को विफल कर दिया गया है। आदिवासियों के उन दावों को जिन्हें गांव की वनाधिकार समिति ने स्वीकृत कर दिया था, उन्हें उपजिलाधिकारी ने खारिज कर दिया है। राबर्ट्सगंज की घोरावल तहसील में भाकपा माले के नेतृत्व में जनता ने कई जगह ऐसी जमीनों पर अपना कब्जा स्थापित किया है। जनवरी में म्योरपुर ब्लाक के बेलहत्थी गांव में रिहन्द जलाशय का जहरीला पानी पीने से 15 बच्चों की मौत हो गई। इस मुद्दे पर जन संघर्ष मोर्चा ने कई दिनों तक धरना-प्रदर्शन किया। इसके पहले भी इसी ब्लाक के कमरीड़ाड, लभरी और गाढ़ा में दो दर्जन से ज्यादा बच्चे रिहन्द बांध का पानी पीने से मर चुके है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सोनभद्र के जिलाधिकारी को निर्देशित भी किया था। आंदोलन के दबाव में करायी गयी जांच से यह प्रमाणित होने के बाद भी कि रिहन्द बांध का पानी जहरीला है, सरकार और जिला प्रशासन द्वारा औद्योगिक इकाइयों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई।
No comments:
Post a Comment