Tuesday, March 15, 2011

समान नागरिक संहिता क्यों नहीं


विगत पच्चीस वर्षों में यह पांचवीं बार है, जब सर्वोच्च न्यायालय ने विविध समुदायों के लिए अलग-अलग कानून को गलत बताया है। हाल में राष्ट्रीय महिला आयोग की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि हिंदुओं पर लागू नागरिक कानून में समय-समय पर हुए हस्तक्षेप के प्रति हिंदू समुदाय सहनशील रहा है। लेकिन दूसरे समुदायों के साथ ऐसा नहीं हुआ। यह सेक्यूलर निष्ठा में कमी ही है कि अन्य समुदायों के लिए नागरिक संहिता को सूत्रबद्ध नहीं किया गया। सर्वोच्च न्यायालय की यह तीखी टिप्पणी हमारे पूरे राजनीतिक वर्ग पर लागू होती है। एक देश में दो नागरिक कानून अस्वस्थ मानसिकता का चिह्न है।
इससे पहले जुलाई, 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता बनाने को कहा था। उससे भी पहले जोरेन दियेनगेध बनाम एसएस चोपड़ा (1985), मो. अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम (1985) तथा सरला मुद्गल बनाम केंद्र सरकार (1995) मामलों में सुप्रीम कोर्ट यही कह चुकी है। शाहबानो मामले में तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने फैसले में लिखा, ‘धार्मिक स्वतंत्रता हमारी संस्कृति की नींव है। लेकिन जो धार्मिक रीति मनुष्य की मर्यादा, मानवाधिकार का उल्लंघन करती हो, वह स्वतंत्रता नहीं, उत्पीड़न है। इसलिए उत्पीड़ितों की रक्षा और राष्ट्रीय एकता के विकास के लिए समान नागरिक संहिता परम आवश्यक है।फिर सरला मुद्गल मामले में कोर्ट ने रेखांकित किया कि विवाह, संपत्ति उत्तराधिकार जैसे मामले धार्मिक विषय नहीं हैं। इसमें जोर देकर कहा गया कि भारत में मुसलिम पर्सनल लॉका जन्म मजहब से नहीं, बल्कि लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स के बनाए कानून से हुआ था। 1791 में वह कानून आया, जिसके अनुसार शादी, तलाक तथा संपत्ति-विरासत मामलों में मुसलमान और हिंदू अपने-अपने धार्मिक चलन से चल सकते थे। लेकिन उसी ब्रिटिश सरकार ने 1832 में आपराधिक मामलों में मुसलिम लॉ को खत्म कर समान कानून लागू कर दिया। अर्थात् इसलामी शरीयत अनुल्लंघनीय नहीं है। इसीलिए यहां मुसलिम चोरों के हाथ नहीं काटे जाते, बल्कि हिंदू चोरों की तरह उन्हें भी जेल ही मिलती है। सरला मुद्गल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीधा आदेश दिया था कि केंद्र सरकार अगस्त, 1996 तक हलफनामा देकर अदालत को बताए कि सभी नागरिकों के लिए एक समान संहिता बनाने के लिए उसने क्या कदम उठाए। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का वही हुआ, जो हर देशहित की बातों के साथ होता है-उपेक्षा, टाल-मटोल या ऐसी बातें करने वाले व्यक्ति या संगठन पर लांछन लगाकर मामले से कन्नी काट लेना। इसके पीछे विभिन्न समुदायों को बांटे रखने की घातक राजनीतिक मंशा रही है। हमारे सेक्यूलर-वामपंथी उसी नीति पर चल रहे हैं, जिस पर अंगरेज चलते थे। अन्यथा जहां भारतीय संविधान का स्पष्ट निर्देश हो तथा जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट बार-बार कहे, उसे न लागू करने के पीछे और क्या कारण है?
संयुक्त राष्ट्र ने भी समान नागरिक कानून न बनाने के लिए भारत की छीछालेदर की। जनवरी, 2000 में वहां महिलाओं के प्रति भेदभाव के विरुद्ध हुए सम्मेलन में कहा गया कि भारत को सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून बनाना चाहिए। समान नागरिक संहिता के पक्ष में सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता, नारी-मुक्ति, मानवाधिकार, धर्मनिरपेक्षता और हिंदू-मुसलिम बराबरी जैसे तमाम तर्क हैं। इन्हीं की मौखिक दुहाई हमारे धर्मनिरपेक्षवादी रोज देते हैं, मगर जब वास्तविक कदम उठाने का समय आता है, तो बगलें झांकने लगते हैं। निरंतर ऐसा होने से एक समुदाय को अन्याय का भान होता है। सुप्रीम कोर्ट के ही शब्दों में, ‘जब अन्याय बिलकुल साफ हो, तो वह संवेदनशील लोगों की सहनशक्ति से बाहर हो जाता है।
सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही नहीं, बल्कि जनता भी यही चाहती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 84 प्रतिशत लोग समान नागरिक संहिता के पक्ष में हैं। इनमें बड़ी संख्या में मुसलिम महिलाएं और पुरुष भी हैं। मगर उनकी भावनाओं को कठमुल्लों के सामने उपेक्षित किया जाता है। जाहिर है, ऐसा केवल वोटों के लिए किया जाता है।
धार्मिक अल्पसंख्यक भारत में ही नहीं, अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, अरब देशों और चीन में भी हैं, लेकिन कहीं भी अलग मजहबी कानून नहीं है। मगर अपने यहां मुसलिमों व हिंदुओं को अलग करने वाला कानून है, जो किसी भी तरह देश के लिए हितकर नहीं है।

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