आंदोलनों में हिंसा होने का एक कारण यह भी है कि सरकारें शांतिपूर्ण आंदोलनों की उपेक्षा करती हैं और हिंसा की बात जल्दी और ध्यान से सुनती हैं। दरअसल, व्यवस्था का यह षड्यंत्र है कि अहिंसक आं दोलनों की उपेक्षा कर हिंसा पैदा करो, फिर हिंसा के दमन के नाम पर शक्तियां अपने हाथ में ले लो। इसलिए आंदोलनकारियों को गांधीवादी तरीकों को ही अमल में लाना चाहिए। शांतिपूर्ण आंदोलन और लोकतंत्र एक-दूसरे के पर्याय हैं और एक सिक्के के दो पहलू हैं
जन आंदोलनों को लेकर आज देश में कई प्रकार की र्चचाएं और भ्रांतियां और आकांक्षाएं हैं। एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि जन आंदोलन किसे कहा जाए ? जो दलीय आंदोलन होते हैं वे सीमित और त्योहारी होते हैं। कुछ आंदोलन व्यापक भागीदारी के हुए हैं पर उनमें से कुछ के लक्ष्य समाज के लिए हितकारी नहीं कहे जा सकते। उदाहरणार्थ-हाल के गुर्जर आंदोलन, जाट आंदोलन और इसके पूर्व संघ परिवार का रामजन्मभूमि आंदोलन तात्कालिक रूप से समाज के एक वर्ग के लिए उपयोगी भले रहे हों या जज्बात जगाने में लाभप्रद रहे हों परंतु इन्हें राष्ट्रीय जनआंदोलन नहीं माना जा सकता। 1974 में जेपी के नेतृत्व में जो संपूर्ण क्रांति का आंदोलन था। वह अपनी असफलताओं के बावजूद एक जनांदोलन था। जिसके लक्ष्य समाज बदलने वाले थे, तरीके लोकतांत्रिक और अहिंसक थे और व्यापकता लगभग सार्वदेशिक थी। आजकल कुछ स्वयंसेवी संगठन किन्हीं-किन्हीं मुद्दों को लेकर आंदोलनरत हैं और वे भी अपने आपको जनांदोलन घोषित करते हैं। एक लक्ष्यीय आंदोलन भी अगर समग्रता में देखा जाए तो जन आंदोलन नहीं कहे जा सकते। अत: जन आंदोलन के राष्ट्रीय संदर्भ में जो परिकल्पना उभरती है, वह यही हो सकती है कि एक राष्ट्रव्यापी आम मानस में प्रभावकारी और समाज में बड़े परिवर्तन करने वाली हलचल ही जन आंदोलन कही जा सकती है। आंदोलन की साख गिरी है। लोकतंत्र की व्यवस्था में जन आंदोलनों का अपना महत्व है परंतु पिछले लगभग दो दशक में बाजारवाद और सत्ता राजनीति की असफलताओं ने आंदोलनों की विश्वसनीयता को घटाया है। पहले एक ही दल आमतौर पर केंद्र और सूबों में सरकारें बनाया करता था पर अब केंद्र में भी परिवर्तन हो चुके हैं तथा राज्यों की सरकारों में भी स्थानीय मजबूत दल आ-जा रहे हैं। परंतु इन सरकारों के परिवर्तन से न तो व्यवस्थाएं बदली हैं और न जिन मुद्दों को लेकर ये सरकारें बदलीं; उन मुद्दों पर ही कोई काम हो सका है। इसलिए राजनीति और आंदोलनों की विश्वसनीयता गिरी है। अब आम आदमी यह मानता है कि दलों के आंदोलन मुद्दों को लेकर नहीं बल्कि सत्ता हथियाने के लिए हैं। 1987-88 में जब बोफोर्स का मामला सामने आया था तब भले ही सारे देश में जनता सड़कों पर न निकली हो परंतु लोगों ने राजनीतिक परिवर्तन में एक ईमानदार और ऐसी सरकार की अपेक्षा की थी जो सरकार में आते ही उस कांड के अपराधियों को कटघरे में खड़ा कर देगी। वीपी सिंह को इसी उम्मीद से लोगों ने प्रधानमंत्री मानकर वोट दिया था। हालांकि बाद में उस घटनाक्रम में भी लोगों को निराशा ही हुई। इसलिए अब लोगों में भी दलीय आंदोलन या जन आंदोलन में न केवल विश्वास की कमी आई है बल्कि अरुचि हो गई है।
स्वकेंद्रित-स्वजीवी शिक्षित वर्ग
जो युवा पीढ़ी परिवर्तन की वाहक बन सकती थी और जो शिक्षित और उच्च शिक्षित हिस्सा है, वह अब पूर्णता अजीविकापरक हो गया है। बाजारवाद और वैश्विक अर्थव्यवस्था की दौड़ ने बड़ी-बड़ी तनख्वाह और सुविधाओं के पैकेज की मृग मरीचका का सपना उनके सामने रच दिया है और इसी सपने के जाल में वे भटक रहे हैं; जिन्हें ये बड़े पैकेज हासिल हो जाते हैं वे शोषक अर्थव्यवस्था के हिस्सा बनकर उसके पैरोकार बन जाते हैं और जिन्हें हासिल नहीं हो पाती है वे सपना संजोकर अपनी किस्मत के छींका टूटने की उम्मीद में बैठे रहते हैं। कुल मिलाकर देश का शिक्षित वर्ग स्वकेंद्रित और स्वजीवी हो गया है। वह एक अर्थ में असामाजिक जैसा हो गया है जिसे अपने अलावा समाज और अब तो यह स्थिति है कि परिवार तक से कोई लेना-देना नहीं है। भारत के परिवार को विश्व के समान मानने के जो सांस्कृतिक मूल्य थे, उनका वाहक परिवार था। जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इन सामाजिक उदात्त मूल्यों को पहुंचाता था। परंतु अब वैश्वीकरण की सभ्यता का सबसे बड़ा हमला परिवार की इस संस्था को नष्ट करने का है ताकि सांस्कृतिक मूल्यों का प्रवाहित होना रुक जाए।
अदालतें तक आंदोलनों के विरुद्ध
जो आंदोलन इन दिनों हो रहे हैं, उनके बारे में बाहरी प्रतिक्रिया या शिक्षित वर्ग की प्रतिक्रिया एकदम विरोधी और प्रतिगामी होती है। कारवाले को लगता है कि ये आंदोलन सड़कों पर क्यों किए जाते हैं? देश की इस बनती हुई श्रेष्ठवर्गीय मानसिकता का प्रभाव कर्मचारी, छात्र, व्यापारी और यहां तक कि न्यायपालिका तक पर भी पड़ा है। अनेक उच्च न्यायालय ने बंद को अवैधानिक घोषित कर दिया है और बंद करने वाले दलों और संगठनों पर दंड लगाने के निर्णय दिए हैं। अनेक स्थानों पर व्यापारी संगठनों ने न्यायालयों में याचिका दायर कर मुख्य चौराहों और सड़कों पर धरना-प्रदर्शन और आंदोलनों को रोकने के आदेश चाहे हैं तथा कुछेक मामलों में वे दिए भी गए हैं। मध्य प्रदेश के सागर नगर के मुख्य चौराहे पर जिसे गौर मूर्ति तिराहा कहा जाता है, प्रदर्शनों पर उच्च न्यायालय ने रोक लगाई है।
प्रदर्शनों के लिए सीमित की गई जगहें
अभी हाल में भोपाल में जिला प्रशासन ने केवल चार पार्क प्रदर्शन के लिए निर्धारित करने का आदेश दिया है और उनमें प्रदर्शनों के लिए भी प्रदर्शनकारियों को शुल्क देना होगा। यह लोकतांत्रिक पण्राली के लिए लगाया गया जजिया कर जैसा है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पहले शास्त्री चौक पर धरना-प्रदर्शन होते थे। नया छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वहां रोक लगा दी गई। धरना-प्रदर्शन को पहले मोतीबाग स्थानांतरित किया गया और अब वहां भी प्रतिबंध लगाकर बूढ़ा तालाब नामक स्थान पर स्थानांतरित किया गया है जो एक प्रकार से कचरे का स्थान है। लखनऊ में दारूल सफा और गांधी प्रतिमा से हटाकर शहीद पार्क और अब शहर के बाहर ज्योतिबा फुले मार्ग पर स्थानांतरित किया गया है जो शहर से दूर है। ऐसे निर्णयों से एक तरफ नागरिकों के उस संवैधानिक अधिकार का हनन हो रहा है जो शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार देता है और दूसरी तरफ लोकतांत्रिक व्यवस्था का दायरा कम करता है।
इससे लोग हिंसा की ओर बढ़ेंगे
लोकतांत्रिक व्यवस्था के दायरे कम होने से लोगों का विश्वास हिंसा की ओर होगा और उन्हें हिंसा ही एकमात्र विकल्प का मार्ग बचेगा। जो सरकारें यह गलती करती हैं वे स्वत: हिंसा के रास्तों को खोलती हैं। एक प्रश्न यह है कि सारे आंदोलन सड़कों पर क्यों होते हैं और इससे जनता को तकलीफ होती है, परंतु यह आरोप लगाने वाले भूल जाते हैं कि आंदोलन का उद्देश्य सरकार को प्रभावित करना होता है और उसके लिए पहले जनमत को प्रभावित करना जरूरी होता है। अगर आबादी से दूर एकांत में धरना- प्रदर्शन किए जाएंगे तो वे प्रभावहीन होंगे और सरकारें भी उन पर कोई ध्यान नहीं देंगी। जनता को कभी- कभी कुछ तकलीफें होती हैं परन्तु लोगों को भी यह समझना होगा कि बड़े उद्देश्य के लिए कुछ तकलीफ सहनी होती है। हां, प्रदर्शनकारियों को भी यह ध्यान देना चाहिए कि वे प्रदर्शनों में हिंसा या उपद्रव न करें। उन्हें जनता से सहयोग लेना है और अगर जनता को कोई तकलीफ होती हो तो वे क्षमा याचना कर उनसे सहयोग मांगें। आजकल धरना-प्रदर्शनों में पुलिस के साथ विवाद और झगड़ा भी आम चलन हो गया है। चूंकि तोड़-फोड़ के समाचारों को समाचार पत्रों में प्रमुखता से स्थान मिलता है इसलिए नौसिखिया आंदोलनकारी हिंसा की ओर प्रवृत्त होते हैं। कई बार पत्रकार मित्र कहते हैं कि जब तक तोड़फोड़ नहीं हुई, कोई समाचार नहीं बनता है और समाचार बनवाने के लिए प्रदर्शनकारी पुलिस से झगड़ा करते हैं, पुलिस को बल प्रयोग के लिए आमंत्रित करते हैं परंतु ऐसे प्रदर्शनों से लक्ष्य से भटकाव हो जाता है। आंदोलन की जो मुख्य मांग होती है, वह दूर हो जाती है और पुलिस पर कार्रवाई या न्यायिक जांच की मांग प्रमुख हो जाती है। आंदोलनकारियों को यह समझना चाहिए कि पुलिस देश की व्यवस्था नहीं है बल्कि वे अपनी रोजी-रोटी के लिए लाचार व्यवस्था पीड़ित व्यक्ति उनमें और प्रदर्शनकारियों में सहयोग होना चाहिए।
सरकार की उपेक्षा
आंदोलनों में हिंसा होने का एक कारण यह भी है कि सरकारें शांतिपूर्ण आंदोलनों की उपेक्षा करती हैं और हिंसा की बात जल्दी और ध्यान से सुनती है। हिंदुस्तान का सबसे पुराना आदिवासियों का जमीन के पट्टे का आंदोलन छत्तीसगढ़ के नगरी सिहावा जिसे समाजवादी नेता स्वर्गीय डा. राम मनोहर लोहिया ने 50 के दशक में शुरू किया था। चार पीढ़ियां आदिवासियों की जेल जा चुकी हैं और अब भी जा रही हैं। भारत सरकार ने आदिवासी भूमि अधिकार विधेयक 2007 पारित कर दिया है, इसके बावजूद वहां के पांच गांवों के आदिवासी जमीन के पट्टे के लिए भटक रहे हैं। 1987 में राज्य सरकार के साथ आंदोलनकारियों का लिखित समझौता होने के बावजूद सरकार ने अमल नहीं किया सिर्फ इसलिए कि वे शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं, जबकि पड़ोस के बस्तर जिले में जहां आदिवासियों ने हिंसा को चुन लिया, वहां सरकारें तिजोरी खोलकर बैठी हैं। दरअसल, व्यवस्था का यह षड्यंत्र है कि अहिंसक आंदोलनों की उपेक्षा कर हिंसा पैदा करो, फिर हिंसा के दमन के नाम पर शक्तियां अपने हाथ में ले लो। इसलिए आंदोलनकारियों को गांधीवादी तरीकों को ही अमल में लाना चाहिए। आजकल कुछ ऐसे भी आंदोलन हैं, जिनके बारे में गाहे-बगाहे विदेशी पैसे के या विकास विरोधी आरोप लगाए जाते हैं परंतु विकास की परिभाषा पर कोई सरकार र्चचा नहीं करती। लाखों लोगों को उजाड़कर उद्योग की स्थापना करना, हजारों किसानों को बेरोजगार बनाकर उद्योग की स्थापना, परमाणु ऊर्जा के कारखाने लगाकर उस पट्टी की कृषि और पर्यावरण को नष्ट करना, नदियों के पानी को इंसान से छीनकर आदमी और खेत को प्यासा रखकर ऊर्जा उद्योग की प्यास बुझाना यह कौन सा विकास है?
विकास नहीं, विनाश
वास्तव में यह न केवल समूची प्रकृति को नष्ट कर देश के विनाश की प्रक्रिया है बल्कि आगामी पीढ़ियों के लिए भयंकर भूख की आग पैदा करने का तरीका है। चूंकि जिन इलाकों में बड़े बांध, भारी उद्योग, खनिज उद्योग, ऊर्जा उद्योग लगाए जा रहे हैं, वहां की आदिवासी या गांवों की आबादी लगभग मूक है, जिसकी आवाज वहीं दफन होकर रह जाती है। जंगलों में बसने वालों की मौत चर्चित नहीं हो पाती परंतु शहर के पांच सितारा होटलों में होने वाली हत्या वर्षो तक सारे देश को और प्रशासन को हिलाती रहती है। यह हमारी अमानवीय मानवता का परिचायक है। हम बड़े तबके पर हमले से पीड़ित होते हैं परंतु गरीब की मौत पर आंसू बहाना तो दूर, उसकी र्चचा भी नहीं करना चाहते हैं। अत: अब एक ऐसा समय आया है जब सभी पक्षों को विचार करना होगा। अगर आंदोलन नहीं होंगे तो लोकतंत्र नहीं बचेगा। शांतिपूर्ण आंदोलन और लोकतंत्र एक-दूसरे के पर्याय हैं और एक सिक्के दो पहलू हैं। आंदोलन चेतना पैदा करने के लिए है और लोकतांत्रिक पण्राली बेहतर व्यवस्था के निर्माण के लिए। अगर आंदोलन नहीं होंगे तो तानाशाही का गुपचुप आगमन शुरू हो जाएगा।
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