आखिरकार केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जाति आधारित जनगणना को मंज़ूरी दे ही दी। आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका होगा, जब भारत में जाति आधारित जनगणना होगी। इससे पहले 1931 में जाति आधारित जनगणना हुई थी। इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की गणना भी कराई जाएगी। 3,500 करोड़ की लागत से जून में जनगणना शुरू होगी और दिसंबर में पूरी होगी। इसके आंकड़े भी मार्च 2012 तक प्राप्त हो जाएंगे। यह पहली बार है, जब गरीबों की उनके धर्म और उनकी जाति के आधार पर पहचान की जा रही है। पिछली बीपीएल जनगणना वर्ष 2002 में हुई थी। इससे यह पता चल सकेगा कि मुसलामानों, ईसाइयों, सिखों और हिंदुओं में कितने प्रतिशत लोग बीपीएल की श्रेणी में आते हैं। वैसे जाति आधारित जनगणना में जाति और धर्म से संबंधित आंकड़े समूह के रूप में विभिन्न एजेंसियों को उपलब्ध कराए जाएंगे और इनकी व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी। कई लोगों और समाज सुधारकों को लगता है कि जातिगत जनगणना के कारण समाज में विघटन आएगा और लोगों में दूरियां बढेंगी। चूंकि भारत में जातिवाद को नाकारा नहीं जा सकता, इसलिए कई राजनीतिक संगठनों ने जाति आधारित जनगणना की पुरजोर वकालत की है। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव, राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव आदि ने जाति आधारित जनगणना को उचित ठहराते हुए कहा है कि इससे देश में जातियों की स्थिति के बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध होगी। इससे सरकारी योजनाओं में उचित वर्ग को प्रतिनिधित्व मिल पाएगा। वैसे देखा जाए तो भारत की बड़ी आबादी इस बात से सहमत है कि जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए ताकि जाति और धर्म को लेकर होने वाली वैमनस्य की राजनीति का अंत हो सके। इसके पीछे भी कई तर्क दिए जा रहे हैं। मसलन, जाति आधारित जनगणना होने से सभी जातियों और वर्गो की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, जिससे वास्तव में शोषित और पिछड़ी जातियों को सही प्रतिनिधित्व मिल पाएगा तथा इससे राजनीतिक दलों के उन दावों की पोल भी खुल जाएगी, जिसमें वे दावा करते हैं कि फलां जाति का प्रतिशत इतना है और यह हमारा परंपरागत वोट बैंक है। जाति आधारित जनगणना का एक फायदा यह भी होगा कि धर्म के आधार पर देश को बांटने का कार्य करने वाले कथित सेक्युलर दलों की राजनीति ही खतरे में पड़ जाएगी। यदि धर्म के आधार पर देखा जाए तो 2001 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की संख्या 80.5 प्रतिशत थी, जबकि मुस्लिम 13.4 प्रतिशत थे। वहीं ईसाइयों का प्रतिशत 2.3 था तो सिख 1.9 प्रतिशत थे। बाकी अन्य धर्मो को मानने वाले थे। 9 साल बाद यकीनन इनके प्रतिशत में अंतर आना चाहिए। जाति आधारित जनगणना से राजनीतिक और सामाजिक बदलाव आना निश्चित है। राजनीतिक दल इस संभावना पर गौर करेंगे कि उनके लिए किस प्रदेश में क्या समीकरण बन रहे हैं। जातियों की वास्तविक स्थिति का पता लगने से नए सामजिक न्याय का उपयुक्त सामजिक आधार बनेगा। मिटने की कगार पर खड़ी जातियों के लिए विकासोन्मुख योजनाएं चला कर उनका पुनरुत्थान किया जा सकेगा। इसी तरह अति गरीब एवं पिछड़ी जातियों के उठान हेतु प्रयास किया जा सकता है। जाति आधारित जनगणना होने से आम व्यक्ति को यह पता चल सकता है कि अमुक जाति की सरकारी एवं निजी क्षेत्र में कितनी भागीदारी है? इससे जाति और धर्म के आधार पर धमकी भरे अंदाज में आरक्षण मांगने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगेगा। जाति आधारित जनगणना की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी और तीन प्रमुख केंद्रीय एजेंसियां इस जनगणना की निगरानी करेंगी। यदि गणना निष्पक्ष और सटीक हुई तो निश्चित ही यह भारत के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामजिक परिवेश के लिए बदलाव का सूचक होगी। जाति और धर्म के नाम पर देश को दिग्भ्रमित करने की प्रवृत्ति पर भी इससे रोक लगेगी और पिछड़े वर्ग का सही अर्थो में पुनरुत्थान होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Showing posts with label पृ. सं. ९. Show all posts
Showing posts with label पृ. सं. ९. Show all posts
Wednesday, May 25, 2011
Tuesday, April 12, 2011
लोकपाल को लेकर सरकार की नीयत पर सवाल
समाज सुधारक अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार को लेकर शुरू किए आंदोलन और उसको मिले जनसमर्थन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अगर हमारे इरादे मजबूत और नीयत साफ हो तो देश की जनता सरकार की चूलें हिलाने के लिए एकजुट हो सकती है। अन्ना के अनशन और भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों की बुलंद होती आवाज के आगे भले ही सरकार लोकपाल विधेयक मामले पर घुटने टेकती नजर आ रही हो, लेकिन इस पूरे मामले में चली कवायद और हाल ही में कपिल सिब्बल के बयान ने इस पूरे मामले में सरकार की नीयत पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। लोकपाल बिल पर सरकार की तरफ से बनी सहमति के बाद जब अन्ना हजारे ने अनशन तोड़ा तो उस वक्त इस पूरे मसले पर सरकार की तरफ से वार्ताकार रहे कपिल सिब्बल को यह लोकतंत्र की जीत नजर आ रही थी, लेकिन अब खुद कपिल सिब्बल लोकपाल संस्था की अहमियत पर सवाल खड़े कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल का कहना है कि अगर गरीब बच्चों को स्कूल भेजे जाने की कोई व्यवस्था नहीं है या फिर गरीब के पास अस्पताल में दाखिल होने के लिए पैसे नहीं हैं तो इसमें लोकपाल क्या करेगा। मंत्री जी का यह भी कहना है कि अगर बात पीने के पानी या फिर शौचालय की व्यवस्था की हो तो इसमें लोकपाल के होने या नहीं होने से क्या फर्क पड़ेगा। देश की जनता केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल से यह जानना चाहती है कि आजादी के बाद से अब तक देश में 80 आम बजट पेश हो चुके हैं, लेकिन क्या इतने बरसों के बाद भी देश का चौमुखी विकास हो सका? खुद राजीव गांधी यह दोहराते रहे कि केंद्र से एक रुपया चलता है और जरूरतमंदों तक केवल पंद्रह पैसे ही पहुंच पाता है। क्या केंद्र सरकार या कपिल सिब्बल यह बताने को तैयार हैं कि जरूरतमंदों की 75 फीसदी रकम कौन डकार जाता है? नरेगा जैसी योजना पर अब तक हजारों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, क्या वाकई गांवों की तस्वीर बदल गई है? कपिल सिब्बल देश के मानव संसाधन विकास मंत्री भी हैं और उनका कहना है कि गरीब बच्चों के लिए अगर कोई स्कूल की व्यवस्था नहीं है तो इसमें लोकपाल क्या करेगा। मानव संसाधन विकास मंत्री यह जानते होंगे कि मौजूदा बजट में सरकार द्वारा प्रारंभिक शिक्षा के लिए 21 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है और शिक्षा के लिए हजारों करोड़ रुपये के प्रावधान पहले भी किए गए, लेकिन इतनी भारी-भरकम रकम खर्च करने के बाद भी अगर गरीब बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल नहीं हैं या फिर उन्हें बेहतर शिक्षा उपलब्ध नहीं है तो इसमें किसकी जिम्मेदारी बनती है? सामाजिक योजनाओं और विकास पर खर्च की जाने वाली रकम अगर भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़े तो क्या देश की तस्वीर पूरी तरह बदली नजर नहीं आएगी? सवाल लोकपाल का नहीं, देश की तरक्की में बड़ा रोड़ा बन चुके भ्रष्टाचार को हटाने और सरकार की नीयत का है। जन लोकपाल विधेयक पर सहमति बन जाने के बाद कपिल सिब्बल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की दरियादिली की सराहना करने में जुटे थे, लेकिन क्या यूपीए सरकार या उसमें शामिल मंत्री यह बताएंगे कि सरकार ने अन्ना हजारे के पत्रों को क्यों नजरअंदाज किया? केंद्रीय विधि मंत्री को भी जन लोकपाल विधेयक का मसौदा दिया गया था, उस वक्त इस पूरे मसले पर सरकार की नींद क्यों नहीं खुली? सरकार के एक और केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल अन्ना हजारे की जीत को कांग्रेस पार्टी की भ्रष्टाचार के खिलाफ जीत बता रहे हैं और उनका कहना है कि कांग्रेस खुद चाहती थी कि कठोर लोकपाल बिल लाया जाए, लेकिन क्या जायसवाल साहब कांग्रेस की प्रवक्ता जयंती नटराजन के उस बयान को भूल गए, जिसमें उन्होंने अन्ना के आमरण अनशन को जल्दबाजी में उठाया गया कदम बताया था? जयंती नटराजन का कहना था कि लोकतंत्र में नीति बनने से पहले उस पर बहस होनी चाहिए थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही भ्रष्टाचार के मसले पर गठबंधन राजनीति को कोसते नजर आते हों, लेकिन इस गठबंधन का फायदा कांग्रेस अपनी सुविधा से उठा लेती है। दरअसल, यों तो संप्रग सरकार कांग्रेस की अगुवाई वाली ही सरकार है, लेकिन अगर पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए हों तो कांग्रेस इस फैसले पर सवाल खड़े करके खुद को पाक-साफ बताने की कोशिश करती है और अगर बात सरकार की किसी सकारात्मक पहल की हो तो वह अपनी पीठ थपथपाना भी नहीं भूलती। अन्ना हजारे के अनशन को शुरुआत में संप्रग सरकार या फिर कांग्रेस पार्टी ने गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन जब जन लोकपाल विधेयक को लेकर अन्ना हजारे की सभी मांग मानने के लिए सरकार तैयार हो गई तो चापलूस कांग्रेसी इसे अपनी ही जीत बताने में जुट गए। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए राजा भले ही अभी सलाखों के पीछे हों, लेकिन इस घोटाले के सामने आने के बाद कई दिनों तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनका बचाव करते नजर आ रहे थे तो दूसरी तरफ कपिल सिब्बल जैसे मंत्री सीएजी की रिपोर्ट पर ही सवालिया निशान लगा रहे थे। क्या ऐसी हरकतें सरकार में बैठे लोगों की नीयत पर सवाल खड़े नहीं करती? देश में संप्रग की सरकार रही हो या फिर किसी और दल की सरकार, अगर संसद में सांसदों के वेतन और उनकी सुविधाओं की बढ़ोतरी का कोई मसला हो तो इसके लेकर सभी दल के सांसद एकजुट नजर आते हैं और ऐसे बिल पूरी खामोशी के साथ पास हो जाते हैं, लेकिन यही संसद 40 से भी ज्यादा बरसों में लोकपाल विधेयक को अब तक पारित नहीं करा सकी। इसमें कोई दो मत नहीं कि संविधान में कानून बनाने के लिए संसद सर्वोच्च है, लेकिन जब जनता की नुमाइंदगी करने वाले अपने मकसद से भटक गए हों तो यह जनता की जिम्मेदारी बनती है कि उन्हें सही रास्ते पर लाया जाए। आज जरूरत इस बात की है कि जन लोकपाल विधेयक के मसौदे को लेकर सरकार सकारात्मक रवैया अपनाए और यह सुनिश्चित करे कि भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्ति फिर चाहे वह देश का प्रधानमंत्री ही क्यों न हो, तिहाड़ जेल में नजर आए। यह सुनिश्चित करना होगा कि देश में मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक और छोटे बाबू (क्लर्क) से लेकर बड़े बाबू (आइएएस) तक भ्रष्टाचार का पूरी तरह खात्मा हो। जनलोकपाल विधयेक में यह प्रावधान है कि अगर किसी नागरिक का काम तय समय-सीमा में नहीं होता है तो लोकपाल जिम्मेदार अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा और वह जुर्माना शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगा। अन्ना हजारे का यह कहना ठीक है कि देश का कानून कमजोर है और भ्रष्टाचार करने वालों को बिल्कुल डर नहीं लगता। इसके साथ ही सरकार चलाने वाले बहुत से लोग भ्रष्टाचारियों का साथ देते हैं। अन्ना की इस पहल को देशभर में युवाओं का जबर्दस्त समर्थन मिला है और अगर जनता भ्रष्टाचार को लेकर ऐसे ही जागरूक रही तो सरकारी दफ्तरों में भ्रष्ट नौकरशाह दुम दबाते नजर आएंगे। आज आवश्यकता इस बात की है कि भ्रष्टाचार के मसले को लेकर सरकार गंभीरता से विचार करे और ठोस कदम उठाए। देश में तमाम बड़े घोटालों के सरगना अब भी सलाखों के बाहर हैं। सरकार को अपनी करनी से यह साबित करना होगा कि उसकी नीयत में कोई खोट नहीं है। वरना, जनता एक बार फिर आंदोलन के लिए तैयार है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
इस कानून के अंतर्गत केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा। द्य संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीमकोर्ट की तरह सरकार से स्वायत्त होगी। कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पाएगा। द्य भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कई सालों तक मुकदमे लंबित नहीं रहेंगे। किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी। ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा और भ्रष्ट नेता, अधिकारी या न्यायाधीश को दो साल के भीतर जेल भेजा जाएगा। द्य अपराध सिद्ध होने पर भ्रष्टाचारियों से सरकार को हुए घाटे को वसूल किया जाएगा। क्या सरकार भ्रष्ट लोगों को लोकपाल का सदस्य नहीं बनाना चाहेगी यह मुमकिन नहीं है। क्योंकि लोकपाल के सदस्यों का चयन न्यायाधीशों, नागरिकों और संवैधानिक संस्थानों द्वारा किया जाएगा, न कि नेताओं द्वारा। इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से और जनता की भागीदारी से होगी। यह आम नागरिक की कैसे मदद करेगा द्य यदि किसी नागरिक का काम तय समय सीमा में नहीं होता तो लोकपाल जिम्मेदार अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा और वह जुर्माना शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगा। द्य अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय सीमा के भीतर नहीं बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती तो आप इसकी शिकायत लोकपाल/लोकायुक्त से कर सकते हैं और उसे यह काम एक महीने के भीतर कराना होगा। आप किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं। जैसे, सरकारी राशन की कालाबाजारी, सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी, पंचायत निधि का दुरुपयोग। लोकपाल को इसकी जांच एक साल के भीतर पूरी करनी होगी। सुनवाई अगले एक साल में पूरी होगी और दोषी को दो साल के भीतर जेल भेजा जाएगा। लोकपाल में काम करने वाले अधिकारी भ्रष्ट पाए गए तो.. लोकपाल-लोकायुक्तों का कामकाज पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच अधिकतम दो महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा। मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधक संस्थानों का क्या होगा सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (एंटी कारप्शन डिपार्टमेंट) का लोकपाल में विलय कर दिया जाएगा। लोकपाल को किसी न्यायाधीश, नेता या अधिकारी के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिए पूर्ण शक्ति और व्यवस्था भी होगी|
Tuesday, March 29, 2011
लोकतंत्र में तानाशाही क्यों
उत्पाद शुल्क के दायरे में लाए जाने के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे व्यापारियों पर जो लाठीचार्ज किया गया, वह संवेदनहीनता की एक वीभत्स मिसाल है। इस बात पर तो बहस की गुंजाइश हो सकती है कि व्यापारियों की मांग सही है या गलत। इस बात पर भी मतभेद की पूरी गुंजाइश है कि अपनी मांगें मनवाने के लिए रास्ता जाम करना कितना सही है। कोई यह सवाल उठा सकता है कि सरकार शांतिपूर्ण ढंग से बात उठाए जाने पर कोई मांग मानती ही नहीं, फिर करें क्या? और कोई यह भी कह सकता है कि मांगें मनवाने का यह कौन-सा तरीका है? सरकार भी कह सकती है कि अगर ऐसे दबावों के सामने सरकार झुकती रहे तो व्यवस्था कितने दिन चलेगी? लेकिन तब सवाल यह भी उठता है कि सरकार आसानी से कोई मांग मानती ही कहां है? यह भी कि क्या सरकारें जो काम करती हैं, वे सब सिर्फ जनता के हित के लिए ही होते हैं? आखिर इस बात का ठीक-ठीक आकलन कैसे किया जा सकता है कि कौन से काम जनहित के हैं और कौन से सिर्फ निजी हित के? अगर यह तय करने का कोई ठोस आधार नहीं है तो सरकार को इस बात का क्या अधिकार है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसी भी वर्ग पर लाठीचार्ज करा दे? क्या यह हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है? इस बात पर खासतौर से गौर किया जाना चाहिए कि गारमेंट्स उद्योग को उत्पाद शुल्क के दायरे में लाए जाने के विरोध में आंदोलन केवल दिल्ली के व्यापारी ही नहीं कर रहे हैं। दिल्ली के साथ-साथ लुधियाना के उद्यमियों ने भी इसके खिलाफ अपने-अपने उद्योगों पर ताले लगाकर काम बंद रखा और रैली निकाल कर केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। यह बात भी नजरअंदाज नहीं की जानी चाहिए कि इसके पहले भी उद्यमी इस पर अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं। यह विरोध दर्ज कराने वालों में केवल दिल्ली और पंजाब के व्यापारी ही शामिल नहीं हैं, देश के दूसरे भागों के व्यापारी और उद्यमी भी उनके साथ हैं। इनमें खासतौर से कर्नाटक और महाराष्ट्र के व्यवसायी शामिल हैं। अपने देश में रेडीमेड गारमेंट्स के व्यवसाय की स्थिति अगर देखी जाए तो इनके बाद किसी और राज्य की कोई खास स्थिति नजर नहीं आती है। सच पूछिए तो गारमेंट व्यवसाय का कुल अर्थ केवल पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक और महाराष्ट्र ही है और इन सभी राज्यों के व्यापारी सरकार के फैसले के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं। अभी दिल्ली और पंजाब के अलावा अन्य किन प्रदेशों के उद्यमियों तथा व्यापारियों ने दोबारा अपना विरोध दर्ज कराया, इस बारे में कोई सूचना नहीं है, लेकिन दिल्ली में व्यापारियों के साथ जो दुर्व्यवहार हुआ है, क्या उसे किसी भी कीमत पर सही कहा जा सकता है? वास्तविक प्रश्न अब व्यापारियों की मांग के सही या गलत होने तथा सरकार के फैसले के भी सही या गलत होने का उतना नहीं रह गया है, जितना कि इस पर नियंत्रण के सरकारी तरीके की शुचिता का है। फिलहाल केंद्र और दिल्ली प्रदेश में भी कांगे्रस के नेतृत्व वाली सरकार है और कांग्रेस की परंपरा में ही गांधीवाद है। गांधीवाद के बगैर कांग्रेस की कोई पहचान होने के बारे में सोचना भी गलत होगा। हैरत होती है कि क्या कांग्रेस के पढ़े-लिखे मंत्रियों को अब यह बताना जरूरी है कि आज के संदर्भ में भारत में गांधीवाद का वास्तविक अर्थ ग्राम स्वराज्य है? यह बताने की जरूरत दुनिया भर में किसी को भी नहीं होनी चाहिए कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी समाज की अंतिम पंक्ति में अंतिम व्यक्ति तक के विवेक पर पूरा भरोसा करते थे और न केवल शासन, बल्कि संपूर्ण व्यवस्था के संचालन में उसकी राय की अहमियत में पूरा विश्र्वास करते थे। क्या देश के नागरिकों में विश्वास जताने का नया कांग्रेसी तरीका यही है कि उनकी जुबान काट ली जाए? यह गौर किया जाना चाहिए कि यह तरीका देश के उस वर्ग के खिलाफ इस्तेमाल किया गया है, जिसे सबसे ज्यादा शांतिपूर्ण समझा जाता है। यही नहीं, इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है। देश की जीडीपी और ग्रोथ रेट चाहे कहीं से कहीं पहुंच जाएं, पर यह सच है कि रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन के मामले में सरकार और उसकी एजेंसियों की गति वही नहीं है। इस समस्या के समाधान में अगर कोई वर्ग सबसे बड़ा योगदान कर रहा है तो वह उद्यमी ही है। क्या सरकार ऐसा मानने लगी है कि इस वर्ग की अपनी कोई समस्या नहीं है और अगर है भी तो उसके समाधान की कोई जरूरत तक नहीं है? अगर ऐसा नहीं है तो यह कैसे हुआ कि उनकी बात सुनने से पहले ही उन पर लाठीचार्ज कर दिया गया? सरकार का यह कदम उसके तानाशाही रवैये की ओर इशारा करता है। क्या यह रवैया दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए सही ठहराया जा सकता है? सरकार की यह कार्रवाई केवल व्यापारियों और आम जनता के प्रति उसकी संवेदनहीनता को ही बयान नहीं करती है, बल्कि देश में बढ़ती अराजकता का रहस्य भी खोलती है। सरकार व पुलिस की ऐसी ही कार्रवाइयों से अहिंसा और अपनी वाजिब मांगें मनवाने के लिए शांतिपूर्ण तरीकों से आम जनता अपना विश्वास खोती चली जाती है। नतीजा एक न एक दिन अराजकता और कई बार तो हिंसक कार्रवाइयों तक के रूप में सामने आता है। क्या तब केवल उन लोगों को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना सही होगा, जो अपनी मांगें मनवाने के लिए हिंसक प्रदर्शनों या माध्यमों का सहारा लेते हैं? अगर जनता को अपनी पीड़ा को स्वर देने का अधिकार भी न रह जाए तो फिर लोकतंत्र का अर्थ क्या रह जाएगा? समझ में नहीं आता कि सरकार यह क्यों भूल जाती है कि लोकतंत्र में उसकी हैसियत शासक की नहीं, बल्कि जनता के प्रतिनिधि और इस रूप में वस्तुत: सेवक की होती है? सच तो यह भी है कि किसी भी उद्योग को किसी भी नए या पुराने कर के दायरे में लाए जाने के सरकार के किसी फैसले को पूरी तरह गलत किसी भी तरह नहीं ठहराया जा सकता है। क्योंकि सरकार देश की व्यवस्था चलाने के लिए अंतिम रूप से जिम्मेदार होती है और उसके लिए व्यवस्था पर कुल खर्च का मुख्य आधार कर एवं शुल्क ही होते हैं। अगर सरकार को कर और शुल्क ही नहीं मिलेंगे तो फिर देश के तमाम विकास कार्य कैसे होंगे? लेकिन बात केवल यहीं तक नहीं सीमित नहीं है। भारत की सरकारें यह बात बार-बार क्यों भूल जाती हैं कि जनता की मुश्किलों के प्रति भी वे जवाबदेह हैं। चाहे कुछ भी हो, पर उन्हें उद्यमियों और व्यापारियों की बात सुननी तो चाहिए ही। वह मांग न माने, इसके मूल में तो उसकी मजबूरियां समझी जा सकती हैं, लेकिन सुने ही नहीं इस बात का क्या मतलब है? बेहतर होगा कि सरकार अबसे गारमेंट उद्यमियों और व्यवसायियों से वार्ता करे, उनकी बातें सुने और समस्याएं सुलझाने के प्रयास करे। तानाशाही रवैया किसी भी व्यवस्था के लिए लोकतंत्र में सही नहीं कहा जा सकता है। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)
Saturday, December 18, 2010
लोकतंत्र की लीक
भारत से अमेरिका तक लीक की महिमा फैली हुई है। वाटरगेट के टेपों से पता चला था कि चुनाव में अपनी उम्मीदवारी को मजबूत और विरोधी दल की उम्मीदवारी को कमजोर करने के लिए क्या-क्या करामात की जा सकती है। जब ये रहस्योद्घाटन हुए, तब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन ने कहा था, मैं घपलेबाज नहीं हूं। हालांकि लीक हुए कागजों ने साबित किया कि उन्होंने घपलेबाजी की थी। वह थे तो निर्लज्ज ही पर हमारे नेताओं जितना नहीं इसलिए आखिर में उन्होंने इस्तीफा दे ही दिया। हमारे एक नेता ने कहा था कि मैं जान दे दूंगा पर इस्तीफा नहीं दूंगा। जनतंत्र नैतिकता की लीक पर चलने का नाम है। इस लीक से हटकर कोई भी लोकतंत्र नहीं चल सकता। इसकी कोशिश की जाएगी तो लीक पर लीक होंगे। जिस देश में जितने ज्यादा लीक होते हैं, वहां का लोकतंत्र उतना ही स्वस्थ होता चलता है। क्या यह खेद की बात नहीं है कि अमेरिका में दूसरा वाटरगेट नहीं हुआ? क्या चुनाव प्रक्रिया को भ्रष्ट करने में निक्सन को कोई खास महारत हासिल थी और उनके बाद के दूसरे उम्मीदवार पाक-साफ रहे? अगर ऐसा लगता है तो इसका मतलब है कि निक्सन के उत्तराधिकारी अपने-अपने वाटरगेट से बचे रहे। अब तो ऐसा लगता है कि हर नेता और हर मंत्री के साथ कम से कम एक वाटरगेट होना ही चाहिए। सच बाहर आने के लिए कसमसाता रहता है। बस उसे सेंधमार चाहिए जो उसे गोपनीयता के कंटीले तारों से मुक्त कर सके। भारत सरकार बहुत उदार और सहिष्णु है। नीरा राडिया के सनसनीखेज टेप सामने आए तो वह न शरमाई न घबराई। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह में यह एक बड़ी समानता है। राव भी किसी रहस्योद्घाटन से न शरमाते थे न घबराते थे। उनका मौन बड़ी से बड़ी घटना से भी नहीं टूटता था। मनमोहन सिंह ने भी वैसी ही स्थितिप्रज्ञता साधी हुई है। उन्हें इस बात पर भी गुस्सा नहीं आया कि नाडिया की बातचीत वाले टेप लीक कैसे हुए? हर स्त्री-पुरुष की तरह हर सरकार भी अपनी गोपनीयता को बचाए रखना चाहती है। यह गोपनीयता भंग होती है तो वह दुर्वासा की तरह क्रुद्ध हो उठती है, लेकिन भारत सरकार खामोश रही। अंत में, उद्योगपति रतन टाटा को अदालत में पेश होकर यह दरख्वास्त करनी पड़ी कि इस लीक कांड की जांच की जाए। सरकार को अपनी इज्जत की परवाह नहीं है, लेकिन रतन टाटा को अपनी इज्जत की फिक्र है। मजेदार बात यह है कि उन्होंने इन टेपों की प्रामाणिकता को चुनौती नहीं दी है। कुछ पत्रकारों ने जरूर कहा है कि उनकी बातचीत को संदर्भ से काट कर पेश किया गया है, लेकिन इन्होंने भी अपने शब्दों को झुठलाया नहीं है। वह सिर्फ यह निवेदन कर रहे हैं कि इन शब्दों का अर्थ वह नहीं है जो और लोग समझ रहे हैं। ऐसे लगता है कि जिनकी बातचीत टेप हो जाती है, उनके लिए एक अलग शब्दकोश बनाना होगा। संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार दुनिया भर में अनोखी है। उसे शर्म नहीं आती, सिर्फ गुस्सा आता है। टेपों से जो सूचनाएं सामने आई हैं उनकी प्रामाणिकता के बारे में एक क्षण के लिए फिर भी संदेह हो सकता है, पर विकिलीक्स ने अपने वेबसाइट पर जो दस्तावेज लीक किए हैं, उनकी सत्यता के बारे में किसी को शक नहीं है। क्या इसीलिए अमेरिकी सरकार बौखलाई हुई है और किसी भी कीमत पर अपने तथाकथित लोकतंत्र की कीमत पर भी विकीलीक्स के संचालक जूलियन असांगे को जेल में देखना चाहती है? यह उसका दबंगपन है। वैसा ही दबंगपन, जैसा उसने पहले वियतनाम में दिखलाया था बाद में इराक और इफगानिस्तान में। मुन्ना बदनाम हो चुका है पर वह इस बदनामी को धोने के लिए यह प्रतिज्ञा तक नहीं करना चाहता कि अब मैं शरीफों की तरह आचरण करुंगा। भारत सरकार खुद को शरीफ नहीं मानती। वह जानती है कि उसके मंत्री भ्रष्ट हैं, उसके नौकरशाह बेईमान हैं। दरअसल, इन्हीं के बल पर हमारी सरकारें चल रही हैं, सभी राजनीतिक दल चल रहे हैं लगभग पूरा उच्च और उच्च-मध्य वर्ग चल रहा है। इसलिए जब भी भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने आता है तो जनता के सिवाय कोई भी विचलित नहीं होता। जिस औरत के साथ रोज दो-चार बलात्कार होते हैं वह किसी भी नए बलात्कार से विचलित होना छोड़ देती है। यह नहीं कह सकते कि वह बलात्कार की आदी हो चुकी है। सच यह है कि वह पूरी तरह निराश हो चुकी है। जब उसके रखवाले ही बलात्कारी हों, तब वह किससे फरियाद करे? भारत में टाटा और उनको छोड़ कर जिनकी प्रतिष्ठा धूमिल हुई है, राडिया से बातचीत लीक हो जाने से किसी को अप्रन्नता नहीं है। सब ताली बजा रहे हैं। पर अमेरिका में अनेक महानुभाव चिंतित हैं कि सरकार के गोपनीय दस्तावेज लीक होते रहें तो शासन कैसे चलेगा? खुशी की बात यह है कि पूरा अमेरिका इससे सहमत नहीं है। यह वही वर्ग है जो अमेरिकी सरकार की लोकतंत्र-विरोधी गतिविधियों से आहत है और अपने समाज को निरोग देखना चाहता है। हम सभी को इनसे सहमत होना चाहिए। यह समझना कठिन है कि लोकतांत्रिक सरकारों को इतनी गोपनीयता की जरूरत क्यों पड़ती है। सुरक्षा मामलों को छोड़कर कोई ऐसा काम नहीं होना चाहिए जिसके बारे में जनता को बताया नहीं जा सके। अगर आप लीक पर चलेंगे, तो ऐसा कुछ होगा ही नहीं जिसके लीक हो जाने का डर हो।
Subscribe to:
Posts (Atom)