आज की परिस्थितियों में यह मांग उचित ही लगती है कि अगर लोकपाल को प्रभावी होना है तो उसके पास अपना जांच तंत्र होना चाहिए जो किसी नौकरशाह या राजनीतिक पदाधिकारी के नियंतण्रमें न हो। ये मागें नई नहीं हैं। पहले भी कई विशेषज्ञ इन्हें उठाते रहे हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी सरकार के लिए अब इस मुद्दे पर अन्ना हजारे के आंदोलन की अनदेखी करना आसान नहीं होगा
यह बात समझ से परे है कि सरकार को राष्ट्रीय महत्व की नीतियों के बारे में भी पहला कदम उठाने के लिए अक्सर क्यों धकेलना पड़ता है ? बरसों पहले सरकार ने माना था कि देश में एक ऐसी संस्था होनी चाहिए जो शासन के विभिन्न पदों पर बैठे बड़े से बड़े अधिकारी को भी जवाबदेही पर मजबूर कर सके। लोकपाल विधेयक लाने का वायदा तभी से किया जाता रहा है लेकिन अभी तक संसद में विधेयक पेश करने की बात तो दूर, प्रस्तावित विधेयक का प्रारूप तक नहीं बन सका है। राष्ट्रीय दृष्टि से हानिकारक और भ्रष्ट आचरण पर रोक लगाने के लिए जवाबदेही के इस विधेयक की चर्चा आरम्भ होने के बाद से तो भ्रष्टाचार अपनी सारी सीमाएं तोड़ कर देश की सारी शासन व्यवस्था को ही नहीं, जनजीवन को भी तहस-नहस करने लगा है। हर मामले पर अपनी बेबसी का रोना रोने वाली सरकार के कदमोें में हरकत पैदा करने के लिए किसी राजनीतिक आंदोलन से अच्छा तो अन्ना हजारे और उनके साथियों का सत्याग्रह ही कारगर साबित होगा। वे अपनी छोटी सी देहाती कर्मभूमि से बाहर निकल कर दिल्ली के राजनीति के विशाल वातावरण में कूद पड़े हैं। उन्होंने पंद्रह अप्रैल तक का समय दिया है सरकार को, लोकपाल विधेयक के बारे में साफ-साफ फैसला करने के लिए। प्रधानमंत्री ने यह वायदा तो किया है कि वे जल्द ही लोकपाल विधेयक लोकसभा में रखेंगे लेकिन प्रश्न केवल विधेयक को संसद में रखने का ही नहीं है। सवाल यह भी है कि उसका प्रारूप कैसा हो। इस विधेयक का जिस तरह का प्राथमिक प्रारूप गृहमंत्री ने बनाया है, वह अन्ना हजारे को स्वीकार नहीं, क्योंकि उसे अधिकतर विशेषज्ञ ‘लीपापोती’ ही मानते हैं। उसी को यदि विधेयक का रूप दिया गया तो उससे न तो प्रशासनिक तंत्र लोकपाल के दायरे में आएगा और न ही प्रधानमंत्री। अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बातचीत का आकलन स्वयं अन्ना हजारे के ही शब्दों में मुलाकात ‘बुरी’ रही। सरकारी प्रारूप के जवाब में ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’
नामक संगठन ने भारत के नागरिक समाज की ओर से एक ‘जन लोकपाल विधेयक’ पेश किया है। इस संगठन में पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी, विधिवेत्ता प्रशांत भूषण , संतोष हेगडे और पूर्व चुनाव आयुक्त लिंगदोह आदि शामिल हैं। अन्ना हजारे की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री ने उन्हें बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया था लेकिन नागरिक समाज की ओर से प्रमुख सुझावों पर प्रधान मंत्री कोई आासन नहीं दे पाए। अन्ना हजारे मानते हैं कि लोकपाल के लिए केवल मंत्रियों की उपसमिति के ही बनाए प्रारूप में वह पारदर्शिता नहीं आ सकती है जिसकी आवश्यकता है। इसलिए इसके लिए नागरिकों और मंत्रियों की संयुक्त समिति का गठन होना चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री को यह स्वीकार नहीं था। हालांकि सरकार ने यह आासन दिया है कि मंित्रयों की उपसमिति नागरिक प्रतिनिधियों से परामर्श कर सकती है। दरअसल दोनों पक्षों में जो मतभेद हैं, वे सामान्य नहीं, मौलिक हैं और उन्हें सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री को हिम्मत जुटानी होगी। सरकार की मंशा आरम्भ से ही प्रधानमंत्री को लोकपाल के कार्यक्षेत्र से अलग रखने की रही है। दबाव के बाद सरकार में नई सोच बनी है। उसके अनुसार प्रधानमंत्री के बारे में लोकपाल जांच तो कर सकता है लेकिन ऐसा करने के लिए पहले सदन के अध्यक्ष से अनुमति लेनी होगी। सैद्धांतिक तौर पर लोकसभा के अध्यक्ष को निष्पक्ष माना जाता है लेकिन देश में जिस तरह के राजनीतिक हालात पैदा हो गए हैं, उनमें राजनीतिक स्तर पर चुने गए किसी भी अध्यक्ष के बारे में राजनीतिक आग्रहों का आरोप लगना अस्वाभाविक नहीं है। अध्यक्षों की राजनीतिक कारणों से फैसले लेने की घटनाएं हमारे देश में कम नहीं है। सरकार की दूसरी पारी भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामलों के लिए ही जानी जाएगी। अधिकतर मामलों में प्रधानमंत्री स्वयं लिप्त नहींतो मूक दर्शक की भूमिका में तो दिखाई ही दिए। उनका काफी समय तो अपने बारे में सफाई देने में ही बीता जिसमें उनकी बेबसी ही सामने आई। यह अस्वाभविक नहीं है कि कई देशों में प्रधान मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। अपने देश में भी बोफोर्स का भूत अब तक कांग्रेस का पीछा करता रहा है । इसलिए जरूरी है कि अगर कोई ऐसा तंत्र खड़ा करना है जो राजनीतिक पदाधिकारियों और अफसरशाही पर अंकुश रख सके तो उसके दायरे में प्रधानमंत्री को भी पूरी तरह लाया जाना चाहिए। विवाद का दूसरा बिंदु है कि लोकपाल को वर्तमान जांच एजेंसियों पर ही निर्भर रहना चाहिए कि नहीं। लगता है कि सरकार की नजर में केंद्रीय खुफिया ब्यूरो के अतिरिक्त केंद्रीय सतर्कता आयोग तकनीकी तौर पर सक्षम संगठन है जिसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए लेकिन आम जनता का अनुभव इस से अलग है। केंद्रीय खुफिया ब्यूरो की जांच सम्बंधी क्षमताओं पर भले ही भरोसा किया जा सकता हो लेकिन उसकी निष्पक्षता पर उसके राजनीतिक इस्तेमाल के आरोपों के कारण आंख मूंद कर भरोसा करने की स्थिति में आज आम जनता नहीं है। सबसे बड़ा कारण है कि केंद्रीय खुफिया ब्यूरो सीधे प्रधानमंत्री के अधीन काम करता है। केंद्रीय सतर्कता आयोग तो काफी दिनों से चर्चा में है ही। गनीमत है कि इस मामले में भी प्रधानमंत्री स्वयं कठघरे में खड़े हो गए है और उन्हें इसके लिए अपना दोष स्वीकार करना भी पड़ा है। इन परिस्थितियों में यह मांग उचित ही लगती है कि अगर लोकपाल को प्रभावी होना है तो उसके पास अपना जांच तंत्र होना चाहिए जो किसी नौकरशाह या राजनीतिक पदाधिकारी के नियंतण्रमें न हो। ये मागें नई नहीं हैं। पहले भी कई विशेषज्ञ इन्हें उठाते रहे हैं लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी सरकार के लिए अब इस मुद्दे पर अन्ना हजारे के आंदोलन की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। न केवल इसलिए कि वे कोई राजनीतिक नेता नहीं है, अपितु इसलिए भी कि इसका उपयोग विपक्ष सरकार को घेरने में करेगा, जो पहले ही दबाव महसूस कर रही है।
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