Friday, March 25, 2011

संवेदनहीन शासन


हमारे राजनेता किस तरह चेताए जाने पर भी चेतने और अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने से इंकार करते हैं, इसका एक और उदाहरण है उच्चतम न्यायालय का यह निर्देश कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान की सरकारें यह सुनिश्चित करें कि दिल्ली को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित न हो। इन राज्य सरकारों को इसके प्रति तभी चेत जाना चाहिए था जब केंद्रीय सेवाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग को लेकर जाट समुदाय के नेताओं ने रेल रोको आंदोलन की घोषणा की थी। यह शर्मनाक है कि ऐसा कुछ करने के बजाय उत्तर प्रदेश और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने न केवल जाट समुदाय की मांग का समर्थन किया, बल्कि उनके अराजक आंदोलन से आंखें भी मूंद लीं। परिणाम यह हुआ कि सैकड़ों ट्रेनें प्रभावित हुईं और लाखों रेल यात्रियों को या तो अपनी यात्रा रद्द करनी पड़ी या फिर हर तरह की परेशानी उठाकर सफर करना पड़ा। क्या सत्ता में बैठे लोगों का इससे अधिक जनविरोधी रवैया और कोई हो सकता है कि लाखों लोग परेशान होते रहें और फिर भी वे बेपरवाह बने रहें? उत्तर प्रदेश में जाट नेता 17 दिन तक रेल ट्रैक बाधित किए रहे और हरियाणा में अभी भी किए हुए हैं। यूपी के रेल ट्रैक तब खाली हुए जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सख्ती दिखाई। देखना है कि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के इस आदेश का हुड्डा सरकार और जाट नेताओं पर कोई असर पड़ता है या नहीं कि रेल ट्रैक तत्काल प्रभाव से खाली किए जाएं? यह एक ऐसा निर्देश है जिसे जारी करने की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए थी, लेकिन न्यायपालिका को इसके लिए विवश होना पड़ा। यह खेदजनक है कि एक और मामले में न्यायपालिका को इसलिए पहल करनी पड़ी, क्योंकि सत्ता में बैठे लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। ऐसे ही लोग जब-तब यह विलाप करते हैं कि न्यायपालिका कार्यपालिका के मामलों में दखल देती है। क्या वे यह चाहते हैं कि न्यायपालिका भी संवेदनहीन हो जाए? यह कहना कठिन है कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों की ओर से जाट आंदोलन को समर्थन देने पर उच्चतम न्यायालय की आपत्ति का इन दोनों नेताओं पर कोई असर पड़ेगा या नहीं? वैसे यह स्पष्ट है कि राजनेता आरक्षण संबंधी किसी भी तरह की मांग के खिलाफ मुंह खोलने के लिए तैयार नहीं।जाटों की आरक्षण की मांग का कोई उचित आधार नहीं, फिर भी वोट बैंक के लोभ में नेतागण उनके आंदोलन से खुद को जोड़ना चाहते हैं। आरक्षण के वोट बैंक की राजनीति का हथियार बन जाने के कारण अब करीब-करीब हर वह समुदाय आरक्षण चाह रहा है जो इस सुविधा से वंचित है। देश के विभिन्न हिस्सों में नित नई मांग उठ रही है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि हर समुदाय आरक्षण की मलाई खाने के लिए बेकरार है। सामाजिक उत्थान की इस व्यवस्था का जैसा दुरुपयोग हो रहा है उसे देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि आरक्षण को नए सिरे से परिभाषित करने के साथ ही उसके नए मानक भी बनाए जाएं। आजादी के 64 वर्ष बाद जातिगत आधार पर आरक्षण देने का कोई औचित्य नहीं। कुछ अपवादों को छोड़कर ऐसे जातीय समूह कम ही हैं जिन्हें आरक्षण के जरिए समाज की मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता है। इन स्थितियों में ऐसे उपाय किए ही जाने चाहिए जिससे सिर्फ पात्र लोगों को ही आरक्षण मिले। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो आरक्षण की बढ़ती मांगें देश के समक्ष नई तरह की समस्याओं को जन्म दे सकती हैं।


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