Sunday, March 27, 2011

बोझ बना आरक्षण


लेखक उच्चतम न्यायालय से आरक्षण की व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित करने की अपेक्षा कर रहे हैं

इस माह के प्रारंभ में जाट समुदाय की ओर से दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश और हरियाणा के इलाकों में रेल ट्रैक बाधित करने का जो आंदोलन छेड़ा गया था वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के उपरांत 17 दिन बाद यूपी में तो खत्म हो गया, लेकिन हरियाणा के जाट नेता करीब 21 दिन बाद तब रेल ट्रैक से हटे जब राज्य सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग बनाने के लिए तैयार हुई। जाटों के इस आंदोलन के दौरान प्रतिदिन दर्जनों ट्रेनों को रद्द करना पड़ा और लाखों यात्रियों को तरह-तरह की असुविधा उठानी पड़ी। रेलवे को करोड़ों रुपये की चपत भी लगी। हरियाणा के जाट नेता जिस तरह हुड्डा सरकार को झुकाने में सफल रहे उससे यह साफ हुआ कि उन्होंने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों की परवाह नहीं की। जाट नेताओं की दिल्ली को पानी, दूध, सब्जी आदि की आपूर्ति रोकने की धमकी को देखते हुए जब दिल्ली जल बोर्ड और इंडियन आयल ने उच्चतम न्यायालय की शरण ली तो उसने कड़ा रुख अपनाते हुए हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की ओर से जाट आंदोलन को समर्थन दिए जाने पर न केवल आपत्ति जताई, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने को कहा था कि दिल्ली को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में कोई बाधा न पहुंचने पाए। इसी दिन पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को रेल ट्रैक खाली कराने के आदेश दिए थे, लेकिन उसकी अनदेखी हुई। ध्यान रहे कि यूपी के रेल ट्रैक तभी खाली हो पाए थे जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जाट आंदोलनकारियों के प्रति सख्ती दिखाई थी। यह अचरज की बात है कि जाट आंदोलनकारी लगभग एक माह तक रेल यात्रियों को परेशान किए रहे, लेकिन यूपी और हरियाणा की सरकारों ने समय रहते कोई ठोस कदम उठाने से इंकार किया। उल्टे उनकी ओर से जाटों की आरक्षण संबंधी मांग का समर्थन किया गया। यह समझना कठिन है कि जाट आंदोलन के जिन तौर-तरीकों को न्यायपालिका ने गलत माना उन्हें कार्यपालिका क्यों सहन करती रही? अब क्या प्रथम दृष्टया अनुचित नजर आने वाले मामलों में भी उच्चतम न्यायालय को केंद्र और राज्य सरकारों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराना पड़ेगा? सवाल यह भी उठता है कि क्या कार्यपालिका को हर पेचीदे सामाजिक मामले में न्यायपालिका की आड़ चाहिए? अब यह स्पष्ट है कि न तो केंद्र में सत्तारूढ़ दल आरक्षण संबंधी मांगों का विरोध करने के लिए तैयार हैं और न ही राज्यों में सत्तारूढ़ दल। दरअसल वे किसी समुदाय को नाराज नहीं करना चाहते, भले ही वे कोई अनुचित मांग गलत तरीके से ही क्यों न कर रहे हों? यह पहली बार नहीं है जब न्यायपालिका ने केंद्र अथवा राज्य सरकारों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराया हो। ऐसे मामले सामने आते ही रहते हैं जिनमें न्यायपालिका को कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में दखल देने के लिए विवश होना पड़ता है। अब तो यह लगता है कि सत्ता में बैठे लोग इस इंतजार में रहते हैं कि न्यायपालिका का आदेश मिले तो वे अव्यवस्था को दूर करने की पहल करें। अनेक बार न्यायपालिका के दखल के चलते उसमें और कार्यपालिका में टकराव की नौबत आ जाती है। कोई मन-मुताबिक निर्णय न होने पर सरकारें न्यायपालिका पर अपने दायरे से बाहर जाकर काम करने का आरोप लगाने लगती हैं। बावजूद इसके आम आदमी की यह धारणा लगातार मजबूत हो रही है कि न्यायपालिका का चाबुक चलने पर ही सरकारें सक्रियता दिखाती हैं। ऐसी धारणा न तो कार्यपालिका के हित में है और न ही लोकतंत्र के, लेकिन समस्या यह है कि सरकारें अपनी वैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी समझने के लिए तैयार नहीं। वे अक्सर समस्याओं के समाधान की पहल तभी करती हैं जब उनसे त्रस्त लोग अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। दरअसल जब राजनीतिक दल अपने संकीर्ण स्वार्थो को महत्व देते हैं तब उनके नेतृत्व वाली सरकारें आम आदमी की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में नाकाम रहती हैं। ऐसी सरकारें तब और कमजोर साबित होती हैं जब समाज का कोई बड़ा या प्रभावशाली तबका आंदोलनरत होता है। वर्तमान में देश के विभिन्न हिस्सों से आरक्षण की मांगें उठ रही हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि आरक्षण से वंचित प्रत्येक समुदाय यह मान बैठा है कि सरकारी नौकरियों में रियायत मिलने पर ही उनके लोगों का भला होगा। कोई भी यह सोचने-समझने के लिए तैयार नहीं कि सक्षम तबकों को आरक्षण देना प्रतिभा एवं दक्षता को नजरंदाज करना और एक प्रकार से अकर्मण्यता को बढ़ावा देना है। समय की मांग है कि आरक्षण के मौजूदा स्वरूप पर नए सिरे से बहस हो, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव के लिए तैयार नहीं। चूंकि आरक्षण का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है इसलिए इस सुविधा से वंचित अनेक समुदाय खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। स्थिति इसलिए और बिगड़ रही हैं, क्योंकि अनेक समुदायों को वोटों के लालच में आरक्षण प्रदान किया जा रहा है। कोई आश्चर्य नहीं कि केंद्र सरकार जाट नेताओं के समक्ष हथियार डाल दे। यदि जाटों को केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण दे दिया जाता है तो यह तय है कि कोई अन्य समुदाय आरक्षण की मांग लेकर सामने आ जाएगा। यह भी हो सकता है कि अन्य पिछड़ा वर्गो में से कोई समुदाय खुद को अनुसूचित जाति में शामिल कराने की मांग करने लगे। अनेक समुदाय इस तरह की मांग कर भी रहे हैं। हालांकि देश के नेताओं को यह समझ में आने लगा है कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पिछड़ों के उत्थान के बजाय महज वोट बैंक की राजनीति का हथियार बन गई है, लेकिन वे उसकी खामियों पर बोलने के लिए तैयार नहीं। आज इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर संसद में कोई सार्थक बहस हो सकती है। राजनीतिज्ञों के रवैये को देखते हुए न्यायपालिका के दखल से ही आरक्षण की कोई तर्कसंगत व्यवस्था बनने की उम्मीद है। बेहतर हो कि उच्चतम न्यायालय की पूरी पीठ आरक्षण की नई व्यवस्था का निर्धारण करे। वह पहले भी आरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण आदेश जारी कर चुका है। बात चाहे अन्य पिछड़ वर्गो के आरक्षण को मान्यता देने की हो या आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा न होने की या फिर पिछड़े वर्गो में क्रीमी लेयर का निर्धारण करने की-ये सारे काम उच्चतम न्यायालय की ओर से ही किए गए। इसके पहले कि आरक्षण संबंधी मांगें देश को त्रस्त करें और सामाजिकविग्रह बढ़े,उच्चतम न्यायालय को आरक्षण को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए आगे आना चाहिए। मौजूदा स्थितियों में यही एक मात्र उम्मीद की किरण है।



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