Monday, March 14, 2011

जन आंदोलनों की राह के अड़ंगे


भारत में एक कार्यकारी लोकतंत्र है और वह तमाम सीमाओं, दबावों औ र विसं गतियों के बावजूद राजनीतिक बदलाव और अभिव्यक्ति की आज़ादी की उतनी गुंजाइश छोड़ता है कि लोगों के आक्रोश को संघनित हो ने और फट पड़ने के आसार कमजोर हो जाते हैं। यह भी मानना पड़ेगा कि साख के गम्भीर संकट के बावजूद भारतीय शासक वर्ग ने अभी तक बहुत चतुराई के साथ राजनीतिक चुनौतियों और अंतर्विरोधों को मैनेज किया है
अरब जगत में जनक्रांति और जन आंदोलनों के नए उभार ने भारत में जनआंदोलनों की मौजूदा दशा-दिशा को लेकर एक नई बहस शुरू कर दी है। बहुतेरे विश्लेषक इस बात पर हैरानी जाहिर कर रहे हैं कि भारत में भी राजनीतिक-आर्थिक- सामाजिक हालात काफी हद तक अरब देशों जैसे ही हैं। भ्रष्टाचार चरम पर है, ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ का बोलबाला है, सरकार की साख लगातार गर्त में जा रही है, तमाम संस्थाओं का तेजी से क्षरण हो रहा है, अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार के बावजूद बढ़ी आबादी को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है, गैर बराबरी बढ़ रही है, महंगाई आसमान छू रही है, बेरोजगारी दर नए रिकॉर्ड बना रही है और देश के एक बड़े हिस्से में विद्रोह से हालात हैं। इसके बावजूद क्या कारण है कि भारत में मिस्र या ट्यूनीशिया जैसी जनक्रांति या जनआंदोलन नहीं हो रहे हैं?
मैनेज्ड हैं शासक वर्ग के अंतर्विरोध
पहले यह समझना जरूरी है कि अरब जगत और भारत के बीच कई समानताओं के बावजूद यह तुलना असंगत और बेमानी है। दोनों के बीच सबसे बड़ा फर्क तो यह है कि भारत में एक कार्यकारी लोकतंत्र है और वह तमाम सीमाओं, दबावों और विसंगतियों के बावजूद राजनीतिक बदलाव और अभिव्यक्ति की आज़ादी की उतनी गुंजाइश छोड़ता है कि लोगों के आक्रोश को संघनित होने और फट पड़ने के आसार कमजोर हो जाते हैं। इसके साथ ही, यह भी मानना पड़ेगा कि साख के गम्भीर संकट के बावजूद भारतीय शासक वर्ग ने अभी तक बहुत चतुराई के साथ राजनीतिक चुनौतियों और अंतर्विरोधों को मैनेज किया है। इसलिए इस प्रश्न में छिपी चिंता और बेचैनी से सहमत होते हुए भी यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जनआंदोलन न तो हवा में पैदा होते हैं और न सिर्फ बौद्धिक भावुकता और जुगाली से पैदा होते हैं। असल में, जन आंदोलन समाज की सामूहिक इच्छा, आकांक्षा, सोच और परिवर्तन की अभिव्यक्ति होते हैं। जब भी कोई समाज और देश राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक रूप से ठहराव और गतिरोध का शिकार हो जाता है, जन आंदोलन ही उसे तोड़ते और नई दिशा देते हैं।
व्यापक आंदोलन का न होना चिंतनीय
इस लिहाज से आज भारत में अनुकूल राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद किसी बड़े, व्यापक और जनतांत्रिक जन आंदोलन का न होना एक बड़ी चिंता की बात है। इससे मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक- सांस्कृतिक और वैचारिक गतिरुद्धता का पता चलता है लेकिन इसके साथ ही यह कहना भी बहुत जरूरी है कि आज भी देश के अधिकांश में स्थानीय स्तर पर बहुतेरे जन आंदोलन चल रहे हैं। इनकी सबसे खास बात यह है कि इनमें से अधिकतर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों तथा जल, जंगल और जमीन की कॉरपोरेट लूट के खिलाफ चल रहे हैं।
समन्वय व सहमति का अभाव भी है कारण
इनमें कई जन आंदोलन स्वत:स्फूर्त हैं, कई छोटे-छोटे जन संगठनों या राजनीतिक दलों की अगुवाई में चल रहे हैं, कई संवैधानिक-जनतांत्रिक दायरों में और कुछ उससे बाहर भी चल रहे हैं। तात्पर्य यह कि जमीन पर बहुत बेचैनी और हलचल है लेकिन स्थानीय और छोटे-छोटे जनआंदोलनों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत राजनीतिक समन्वय नहीं है, उनके बीच गहरे राजनीतिक मतभेद भी हैं और कई मामलों में व्यक्तिगत मतभेद और अहम की लड़ाइयां भी हैं। इसके अलावा कई आंदोलनों में किसी एक खास मद्दे से आगे देखने और उसे एक व्यापक राजनीतिक-वैचारिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ने की दृष्टि का अभाव भी दिखाई देता है।
मुखालफत वाली नीतियां ही बड़ी बाधा
लेकिन इन महत्वपूर्ण कारणों के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े, व्यापक और जनतांत्रिक जनआंदोलन की गैर-मौजूदगी के पीछे और भी कई बड़े कारण हैं। एक बड़ा कारण तो खुद नव उदारवादी अर्थनीति और नई आर्थिक नीतियां हैं। यह बहुत अंतर्विरोधी बात लग सकती है कि जिन नीतियों के खिलाफ देश में सबसे अधिक जनांदोलन चल रहे हैं, वही बड़े जन आंदोलनों को खड़े होने से रोक रही है। असल में, नव उदारवादी आर्थिक सुधारों और नई आर्थिक नीतियों के साथ देश में एक बड़े मध्य और नव धनिक वर्ग का उदय हुआ है जिसे वास्तव में, इन नीतियों का फायदा मिला है। नतीजा, ये वर्ग न सिर्फ इन नीतियों के खुले समर्थक के रूप में सामने आया है बल्कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण से निकली समृद्धि ने उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी है।
झटके के लिए कुशन भी है
दूसरे, विश्व बैंक के निर्देश पर राष्ट्रीय सरकारों ने भारत समेत तमाम विकासशील देशों में गैर सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ) का जाल सा बिछा दिया है जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मदद और केंद्रीय-स्थानीय सरकारों के समर्थन से ग्रासरूट स्तर पर लोगों के गुस्से और नाराजगी को समेटने और उन्हें कुछ राहत देने तथा सीमित और क्रमिक सुधारों की दिशा में मोड़ना शुरू कर दिया है। इससे व्यवस्था को जन आंदोलनों का झटका झेलने के लिए एक तरह कुशन मिल गया है। जाहिर है कि अन्य कई कारणों के साथ इन दोनों कारणों ने भी फिलहाल देश में जनांदोलनों की अग्रगति को रोक दिया है। जनांदोलनों की शक्तियों के लिए यह समय परीक्षा का है। उन्हें जनांदोलनो को न सिर्फ एन.जी.ओ के कब्जे से बाहर निकलना होगा बल्कि अपना एजेंडा व्यापक, खुला और जनतांत्रिक करना होगा और अपनी धार भी तेज करनी होगी।



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