अभी जाट आंदोलन की गर्मी दिख रही है। आरक्षण की मांग को लेकर इस महीने की प्राय: शुरुआत से ही जाट समुदाय के लोगों ने कई जगह रेलगाड़ियों का रास्ता रोका। फिर उन्होंने दिल्ली को पानी और दूध की आपूर्ति ठप करने की धमकी दी है। अनेक बार इनका विरोध हिंसक स्वरूप भी ले लेता है। कहा जा रहा है कि अभी इसमें और गर्मी आएगी। इस आंदोलन में शरीक लोग इसे जन आंदोलन बता रहे हैं। पर हकीकत यह है कि यह जन आंदोलन नहीं, जाति का आंदोलन है। जन आंदोलन और जाति आंदोलन में बुनियादी स्तर पर कई फर्क होते हैं। जाति आंदोलन और साम्प्रदायिक आंदोलन का चरित्र संकुचित और स्वार्थपरक होता है और इनमें भीड़ का इस्तेमाल एक निश्चित स्वार्थ के लिए होता है। हमें यह समझना होगा कि यह वास्तविक जन आंदोलन नहीं है। हकीकत तो यह है कि आज देश में कहीं भी वास्तविक जन आंदोलन नहीं हो रहा है। वास्तविक जन आंदोलन तो ट्यूनीशिया में हुआ, मिस्र में हुआ और अब लीबिया में हो रहा है। वहां जन की ताकत बड़े और बुनियादी बदलावों के खिलाफ आंदोलन कर रही है। अपने यहां कहीं-कहीं विरोध-प्रदर्शन कुछ मुद्दों पर हो तो रहे हैं लेकिन इन्हें जन आंदोलन नहीं कहा जा सकता है। दरअसल, अपने देश में जन आंदोलन राह भटक गए हैं। आजादी के लिए महात्मा गांधी ने बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। उन्होंने इसे समाज और संस्कृति से जोड़ा था। जब देश आजाद हुआ तो 1970 तक देश के जन आंदोलनों ने गांधी जी के रास्ते पर चलते हुए लोगों के हक और हित की बात की। '70 के दशक में युवाशक्ति का उभार दिखा। बिहार आंदोलन से बात शुरू हुई और यह फिर पूरे देश में फैली और सम्पूर्ण क्रांति बन गई। इसने सत्ता भी बदल दी। आंदोलन करने वाले सत्ता में आ गए पर जनता को यह पता चल गया कि समाज परिवर्तन सत्ता परिवर्तन से नहीं होता। इसके बाद कुछ लोग छोटी-छोटी जगहों पर जाकर बदलाव के लिए काम करने लगे तो कुछ नक्सल आंदोलन में शामिल हो गए। '80 के दशक में किसानों, मजदूरों, मछुआरों और अन्य ऐसे वगरें की एकजुटता शुरू हुई। इन्होंने अपने हक और हित की बात एकजुट होकर उठाई और जन आंदोलन को नई परिभाषा देने का काम किया। इसी दौरान कुछ आंदोलनों ने राजनीति का हिस्सा बनने की भी कोशिश की। राममनोहर लोहिया कहते थे कि सत्ता के प्रति आग्रह और सम्पत्ति के प्रति मोह से दिक्कतें पैदा होंगी। जन आंदोलनों के भटकाव की वजह यही बना। '90 के दशक में उदारीकरण और भूमंडलीकरण भारत पहुंचा। विदेशी पैसा भारत पहुंचा और पूरे देश में एनजीओ संस्कृति का प्रसार होने लगा। इनका चरित्र सामाजिक आंदोलन का कम और संस्था व प्रबंधन का अधिक होता है। इससे जन आंदोलनों की सामाजिक स्वीकार्यता को झटका लगा। पहले ये जनता के प्रति जवाबदेह होते थे लेकिन अब ये अनुदान देने वालों के प्रति हो गए। पश्चिमी तौर-तरीके अपनाए गए और 2000 आते-आते तो पूरी शब्दावली भी पश्चिमी हो गई। कहा जा सकता है कि 2010 से एनजीओ के जरिए जन आंदोलन चलाने वालों का चरित्र अंतरराष्ट्रीय हो गया। वेबसाइट, मीडिया और रिपोर्ट में इनका काम तो ज्यादा दिखता है लेकिन जमीन पर कम। अहम सवाल यह है कि वास्तविक जन आंदोलन और एनजीओ के जन आंदोलन के फर्क से जो सामाजिक स्वीकार्यता घटी है और खाई बढ़ी है, उसे कैसे पाटा जाए? इस बात पर विचार करना होगा कि जिनके लिए आंदोलन चल रहा है, उनका हित कैसे सधे?
Monday, March 28, 2011
जाट आंदोलन जन का नहीं जाति का आंदोलन है
अभी जाट आंदोलन की गर्मी दिख रही है। आरक्षण की मांग को लेकर इस महीने की प्राय: शुरुआत से ही जाट समुदाय के लोगों ने कई जगह रेलगाड़ियों का रास्ता रोका। फिर उन्होंने दिल्ली को पानी और दूध की आपूर्ति ठप करने की धमकी दी है। अनेक बार इनका विरोध हिंसक स्वरूप भी ले लेता है। कहा जा रहा है कि अभी इसमें और गर्मी आएगी। इस आंदोलन में शरीक लोग इसे जन आंदोलन बता रहे हैं। पर हकीकत यह है कि यह जन आंदोलन नहीं, जाति का आंदोलन है। जन आंदोलन और जाति आंदोलन में बुनियादी स्तर पर कई फर्क होते हैं। जाति आंदोलन और साम्प्रदायिक आंदोलन का चरित्र संकुचित और स्वार्थपरक होता है और इनमें भीड़ का इस्तेमाल एक निश्चित स्वार्थ के लिए होता है। हमें यह समझना होगा कि यह वास्तविक जन आंदोलन नहीं है। हकीकत तो यह है कि आज देश में कहीं भी वास्तविक जन आंदोलन नहीं हो रहा है। वास्तविक जन आंदोलन तो ट्यूनीशिया में हुआ, मिस्र में हुआ और अब लीबिया में हो रहा है। वहां जन की ताकत बड़े और बुनियादी बदलावों के खिलाफ आंदोलन कर रही है। अपने यहां कहीं-कहीं विरोध-प्रदर्शन कुछ मुद्दों पर हो तो रहे हैं लेकिन इन्हें जन आंदोलन नहीं कहा जा सकता है। दरअसल, अपने देश में जन आंदोलन राह भटक गए हैं। आजादी के लिए महात्मा गांधी ने बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। उन्होंने इसे समाज और संस्कृति से जोड़ा था। जब देश आजाद हुआ तो 1970 तक देश के जन आंदोलनों ने गांधी जी के रास्ते पर चलते हुए लोगों के हक और हित की बात की। '70 के दशक में युवाशक्ति का उभार दिखा। बिहार आंदोलन से बात शुरू हुई और यह फिर पूरे देश में फैली और सम्पूर्ण क्रांति बन गई। इसने सत्ता भी बदल दी। आंदोलन करने वाले सत्ता में आ गए पर जनता को यह पता चल गया कि समाज परिवर्तन सत्ता परिवर्तन से नहीं होता। इसके बाद कुछ लोग छोटी-छोटी जगहों पर जाकर बदलाव के लिए काम करने लगे तो कुछ नक्सल आंदोलन में शामिल हो गए। '80 के दशक में किसानों, मजदूरों, मछुआरों और अन्य ऐसे वगरें की एकजुटता शुरू हुई। इन्होंने अपने हक और हित की बात एकजुट होकर उठाई और जन आंदोलन को नई परिभाषा देने का काम किया। इसी दौरान कुछ आंदोलनों ने राजनीति का हिस्सा बनने की भी कोशिश की। राममनोहर लोहिया कहते थे कि सत्ता के प्रति आग्रह और सम्पत्ति के प्रति मोह से दिक्कतें पैदा होंगी। जन आंदोलनों के भटकाव की वजह यही बना। '90 के दशक में उदारीकरण और भूमंडलीकरण भारत पहुंचा। विदेशी पैसा भारत पहुंचा और पूरे देश में एनजीओ संस्कृति का प्रसार होने लगा। इनका चरित्र सामाजिक आंदोलन का कम और संस्था व प्रबंधन का अधिक होता है। इससे जन आंदोलनों की सामाजिक स्वीकार्यता को झटका लगा। पहले ये जनता के प्रति जवाबदेह होते थे लेकिन अब ये अनुदान देने वालों के प्रति हो गए। पश्चिमी तौर-तरीके अपनाए गए और 2000 आते-आते तो पूरी शब्दावली भी पश्चिमी हो गई। कहा जा सकता है कि 2010 से एनजीओ के जरिए जन आंदोलन चलाने वालों का चरित्र अंतरराष्ट्रीय हो गया। वेबसाइट, मीडिया और रिपोर्ट में इनका काम तो ज्यादा दिखता है लेकिन जमीन पर कम। अहम सवाल यह है कि वास्तविक जन आंदोलन और एनजीओ के जन आंदोलन के फर्क से जो सामाजिक स्वीकार्यता घटी है और खाई बढ़ी है, उसे कैसे पाटा जाए? इस बात पर विचार करना होगा कि जिनके लिए आंदोलन चल रहा है, उनका हित कैसे सधे?
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