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Saturday, June 30, 2012

अविरलता का बहाना


उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं को अविरल एवं निर्मल गंगा के मार्ग में बाधक मानते हुए इनका प्रबल विरोध हो रहा है। उत्तराखंड के बाद प्रति दिन गंगा में लाखों टन कचरा उड़ेला जा रहा है। साथ ही गंगा की अविरलता भी बार-बार टूट रही है। गंगा के तिल-तिल मरने के इस पक्ष को दरकिनार कर देना इस आंदोलन के औचित्य और वस्तुनिष्ठा पर सवाल खड़े करता है। यदि मानकों के अनुसार जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण किया जाए तो न तो इससे जल प्रदूषित होता है और न ही जल की मात्रा कम होती है। जहां तक नदी के पर्यावरणीय प्रवाह का सवाल है, उच्च स्तरीय विशेषज्ञ ग्रुप ने नदी की मूल धारा में छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा पर अपनी रिपोर्ट दे दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरणीय प्रवाह के लिए नदी की मूल धारा में एक क्यूमेक (35 क्यूसेक) पानी छोड़ा जाना पर्याप्त होगा। गु्रप ने विशेष तौर पर भागीरथी के धार्मिक महत्व को देखते हुए मूल धारा में चार क्यूमेक (140 क्यूसेक) पानी छोड़ने की सिफारिश की है। केंद्र सरकार ने गु्रप की इस रिपोर्ट पर विचार तक नहीं किया और परियोजना हमेशा के लिए बंद कर दी। उससे पहले भागीरथी पर पाला मनेरी और भैरोघाटी परियोजनाओं को बंद करने का निर्णय लिया जा चुका था। दरअसल, गंगा पर परियोजना बनाने का छिटपुट विरोध पहले भी होता रहा है। 2008 के बाद गंगा पर परियोजनाओं का जो विरोध हुआ, वह एक तरह से राजनीति से प्रेरित लगता है। उत्तराखंड के कुछ एनजीओ के आमंत्रण पर प्रो. जीडी अग्रवाल ने जब अनशन शुरू किया तो, भाजपा हाइकमान के निर्देश पर तत्कालीन राज्य सरकार ने भागीरथी में निर्माणाधीन उत्तराखंड जल विद्युत निगम की पाला मनेरी और भैरोघाटी परियोजनाओं को स्थगित कर दिया। 2009 के आम चुनाव से ठीक पहले भाजपा को गंगा के रूप में एक नया हिंदूवादी मुद्दा मिल गया था। गंगा भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने के लिए अयोध्या की तरह मुद्दा न बन जाए, कांग्रेस की चिंता की यह सबसे बड़ी वजह थी। कांग्रेस की केंद्र सरकार ने बिना अधिक माथापच्ची के उत्तराखंड की दोनों परियोजनाओं को हमेशा के लिए बंद करने का निर्णय ले लिया। इस सफलता के बाद आंदोलन करने वालों का जोर बंध गया और हरिद्वार कुंभ से पहले भागीरथी पर एनटीपीसी की लोहारीनाग पाला परियोजना को भी बंद करने का निर्णय लेना पड़ा। यहां सवाल एक संसाधनहीन राज्य के बड़े संसाधन जल का है, जो जलकर के रूप में उत्तराखंड को सालाना बीस हजार करोड़ रुपये से अधिक की आय दिला सकता है, लेकिन उत्तराखंड तो दिल्ली में बैठे नेताओं और वीआइपी के लिए आज भी एक उपनिवेश है। यही वजह है कि ग्यारह साल बाद भी उत्तराखंड के जल संसाधनों के एक बड़े हिस्से पर आज भी उत्तर प्रदेश काबिज है। उत्तराखंड की एक पूरी घाटी को रौंदकर बनाई गई टिहरी परियोजना के मालिक दिल्ली और लखनऊ हैं। टिहरी परियोजना पर उत्तराखंड का मालिकाना हक शून्य है। कहते हैं पहाड़ की जवानी और पानी कभी उसके काम नहीं आते। अब यदि परियोजनाओं के जरिये पानी उत्तराखंड के लिए एक बेहतर संसाधन बनने जा रहा है तो गंगा की अविरलता के नाम पर उसकी राह रोकी जा रही है। अविरलता सिर्फ बहाना है। गंगा तो हरिद्वार के बाद मर रही है। हरिद्वार में गंग नहर में गंगा का 90 प्रतिशत जल प्रवाहित हो जाता है। हरिद्वार के बाद बची-खुची गंगा में बह रहे कचरे ने गंगा को गंदे नाले में परिवर्तित कर दिया है। हरिद्वार के बाद गंगा की अविरलता बार-बार टूटती है। गंगा से नहरों में लिया गया जल वापस गंगा में नहीं आता। प्रदूषण ने तो गंगा को गंदा नाला बना दिया है। गंगा को बचाने के लिए हाय तौबा मचाने वाले यदि इस वास्तविकता से आंखें मूंदे हुए हैं। उन्हें सिर्फ उत्तराखंड में गंगा की अविरलता चाहिए तो उनकी मंशा पर शक होना लाजिमी है। उत्तराखंड में गंगा आंदोलन पर शंकर सिंह भाटिया की टिप्पणी 

सही उपचार का इंतजार


प्रणब मुखर्जी ने वित्त मंत्रालय का कामकाज छोड़ दिया है और इसके साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वह अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकें। स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स की खराब रेटिंग के बाद एक और रेटिंग एजेंसी फिच द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकार के कामकाम को लेकर जब नकारात्मक रेटिंग दी गई तो इसे लेकर काफी हो-हल्ला मचा और केंद्र सरकार ने यह कहकर बचाव किया कि यह तात्कालिक नजरिये का परिणाम है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधारभूत ढांचा काफी मजबूत है और भारत उच्च विकास दर की पटरी पर वापस लौट आएगा, जैसा कि वर्ष 2008 की मंदी के बाद हुआ था। कहने का आशय यही था ये रेटिंग एजेंसियां भारत को लेकर किसी न किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। इस बीच एक और रेटिंग एजेंसी मूडी के सकारात्मक रुख से भी इस बात को बल मिला है, लेकिन यहां विचार करने की आवश्यकता है कि ये रेटिंग एजेंसियां किसके लिए काम करती हैं-भारत सरकार या फिर अपने ग्राहकों के लिए। निश्चित ही इन्हें भारत सरकार से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वे जो भी रिपोर्ट तैयार करती हैं उनका एक निर्धारित अंतरराष्ट्रीय मानदंड होता है, जो पूरी दुनिया में निवेश करने वाले ऐसे निवेशकों के लिए होता है जो उनके ग्राहक होते हैं। अब यहां सवाल है कि यदि ये गलत रिपोर्ट पेश करेंगी तो इससे नुकसान किसका होगा? नुकसान उन निवेशकों का जो इनके ग्राहक हैं। इसलिए यह कतई संभव नहीं है कि ये रेटिंग एजेंसियां किसी पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर काम करें, क्योंकि ऐसा करने में खुद उसी का नुकसान है। यहां एक और पहलू पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि ये एजेंसियां एक लंबे समय से काम कर रही हैं और इनकी पूरी दुनिया में अपनी एक अलग साख है। इसलिए इन एजेंसियों को गलत बताना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं, क्योंकि इससे तो निवेशकों में भारत के प्रति अविश्वास और बढ़ेगा। यहां हमें इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि यही एजेंसियां अभी तक भारत को निवेशयोग्य बेहतर देशों की सूची में रख रही थीं? आखिर तब उन पर भरोसा क्यों किया जाता था? जाहिर है कि सरकार अपनी कमजोरियों और कमियों को दूर करने के बजाय उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली तर्ज पर चल रही है और स्थिति को संभालने के बजाय अवसरों को गंवा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी अब किसी से छिपी नहीं है। अप्रैल तिमाही में हमारी जीडीपी घटकर 5.3 प्रतिशत पर पहुंच गई तो औद्योगिक विकास दर महज 0.1 प्रतिशत है। डॉलर की तुलना में रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और बीते एक साल में यह तकरीबन 25 प्रतिशत तक कमजोर हुआ है। यदि हालात पर काबू पाने के लिए बड़े आर्थिक सुधारों की दिशा में कदम नहीं उठाए जाते तो शीघ्र ही डॉलर के सामने रुपये का विनिमय मूल्य 60 तक पहुंच जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। रुपये की गिरती कीमत को रोकने के लिए जो घोषणाएं हुईं वे नाकाफी हैं। समझ में नहीं आता कि जब सरकार के हाथ बंधे हुए हैं और उसमें ईमानदार इच्छाशक्ति का अभाव है तो उसने ऐसे संकेत देने की कोशिश ही क्यों की कि मानो अब सब कुछ बदल जाएगा? जी-20 से लौटने के बाद प्रधानमंत्री ने भी कुछ ऐसे ही संकेत दिए, लेकिन अंत में सरकार ने अपनी तरफ से कोई घोषणा करने के बजाय गेंद रिजर्व बैंक के पाले में डाल दी और तमाम उम्मीदों के बावजूद रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में न तो कटौती की और न ही इसके कोई संकेत दिए। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि वर्तमान में विकास दर की तुलना में महंगाई बढ़ने की दर कहीं ज्यादा है। महंगाई बढ़ने का मुख्य कारण आपूर्ति पक्ष से जुड़ा हुआ है इसलिए रिजर्व बैंक महज मौद्रिक नीतियों से इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता। रिजर्व बैंक आपूर्ति पक्ष में सुधार लाने के साथ-साथ बढ़ते राजकोषीय घाटे को कम करने, सरकारी खचरें में कमी लाने की बात सरकार से कह रहा है और जब तक सरकार ऐसा नहीं करती है तब तक न तो महंगाई कम होगी और न ही रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटाने वाला है। अब सरकारी बांड में विदेशी निवेशकों को 20 अरब डॉलर निवेश करने की छूट दी गई है, जो कि पहले से महज 5 अरब डॉलर ज्यादा है। मेरे विचार से इसे कम से कम 30 अरब डॉलर किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत में विकास दर धीमी होने की वजह उपभोक्ताओं की तरफ से मांग में कमी आना नहीं है और न ही ऐसा है कि यहां निवेश की मांग कम है। दरअसल निवेशकों को यह विश्वास नहीं हो पा रहा है कि उन्हें पर्याप्त लाभ मिल पाएगा। इसके लिए जरूरी है कि सरकार टैक्स सुधारों समेत लंबित आर्थिक सुधारों की दिशा में कदम उठाए, देश के प्रति बन रहे नकारात्मक माहौल को दूर करे, विदेशी निवेशकों समेत घरेलू निवेशकों को प्रोत्साहित करने वाले कदम उठाए। यहां यदि वोडाफोन मामले को ही लें तो सरकार इसकी टैक्स देनदारियों को 1962 से तय करने की बात कह रही है। इस तरह की नीतियां प्राकृतिक सिद्धांतों केखिलाफ हैं, जिस कारण विदेशी निवेशकों में भारत के प्रति अविश्वास बढ़ रहा है। इस तरह की नीतियां भारत की विकासपरक छवि को तोड़ती हैं और उसे पुराने समाजवादी प्रतिबंधों वाले युग में ले जाती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री द्वारा वित्तमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद इस नीति पर पुनर्विचार किया जाएगा। सौभाग्य से इसके संकेत भी नजर आए हैं। यदि यह नीति जारी रहती है तो विदेशी निवेशकों में भारत के प्रति एक तरह का डर बैठेगा। सवाल यही है कि क्या प्रधानमंत्री सरकार के पहले के कामकाज के तरीके में बदलाव लाएंगे या फिर सब कुछ वैसा ही चलता रहेगा? ऐसा इसलिए, क्योंकि माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री और प्रणब मुखर्जी के बीच आर्थिक नीतियों को लेकर कुछ मतभेद थे। अब यूरोजोन संकट की बात को भी बंद किया जाना चाहिए, क्योंकि भारत की समस्या उससे पहले की है। वास्तविकता यही है कि भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार की नीतियों का लाभ संप्रग-1 सरकार को मिला और संप्रग-1 सरकार की सब्सिडी और समावेशी विकास की नीतियों का दुष्परिणाम संप्रग-2 सरकार में ताजा आर्थिक संकट के रूप में दिख रहा है। इसीलिए अभी तक मनमोहन सिंह सरकार की कोई खास उपलब्धि नहीं रही है। (लेखक प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे