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Saturday, June 30, 2012

मुख्यधारा से भी जोड़ना होगा


अंडमान द्वीप पर बसे दुर्लभ जनजातीय समुदायों में से एक जारवा जनजातियों के संरक्षण के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले दिनों संशोधित विधेयक को मंजूरी दे दी। विधेयक के मुताबिक जारवा आदिवासी सुरक्षित क्षेत्र के आसपास पांच किलोमीटर के दायरे में पर्यटन, अनधिकृत प्रवेश, विडियो या फोटोग्राफी, शिकार, शराब सेवन, ज्वलनशील पदार्थ आदि की पहुंच और किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि पर पूरी तरह पाबंदी होगी। विधेयक के अमल में आने के बाद इस कानून के उल्लंघन पर आरोपी को सात साल तक की कैद और दस हजार रुपये का जुर्माना भी भुगतना होगा। यानी विधेयक में जहां जारवा आदिवासियों की अस्मिता, पहचान, संस्कृति को बचाने और उनकी सुरक्षा पर जोर दिया गया है तो वहीं उनके संरक्षण के लिए कानूनी प्रावधान भी किए गए हैं। दुनिया भर की आदिम जनजातियों और मूल निवासियों की अस्मिता, पहचान, संस्कृति व भाषा वगैरह के संरक्षण और उनके स्वास्थ, शिक्षा व प्राकृतिक संपदाओं की सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने जो घोषणापत्र जारी किया है, उसके पालन के लिए प्रतिबद्ध देशों में भारत भी शामिल है। यही नहीं, भारतीय संविधान भी जनजातियों को यह जमानत देता है कि देश में न सिर्फ उनकी संस्कृति, परंपरा और भाषा सुरक्षित रहेगी, बल्कि उनके अधिकारों की भी रक्षा की जाएगी। इसके लिए सरकार ने बाकायदा कई संवैधानिक प्रावधान भी किए हैं। बावजूद इसके देश में ऐसे कई मामले सामने निकलकर आते रहते हैं, जिसमें सरकार की नाकामी साफ झलकती है। ऐसा ही एक मामला जारवा जनजाति का है। पूरे देश में जारवा आदिवासी उस वक्त चर्चा में आए, जब इस साल जनवरी में इस समुदाय की स्ति्रयों का नग्न और अर्धनग्न अवस्था में नाचते हुए दिखाने वाला एक वीडियो मीडिया में आया। वीडियो उन लोगों ने तैयार किया, जो पर्यटन के लिए अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर गए थे। इस वीडियो के सामने आने से पहले भी ऐसी कई शिकायतें आई हैं कि पर्यटक उन्हें खाने-पीने का सामान देकर उनके फोटो खींचते हैं और वीडियो बनाते हैं। इस कृत्य में उनकी मदद स्थानीय टूर ऑपरेटर करते हैं। विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए ये टूर ऑपरेटर उनके सामने जारवा आदिवासियों को अजूबे की तरह पेश करते हैं। मानो जारवा आदिवासी इंसान नहीं, महज मनोरंजन की कोई वस्तु हों। प्रोटेक्शन ऑफ ऐबओरिजिनल ट्राइब रेगुलेशन-1956 के तहत हालांकि इस तरह की हरकतें पूरी तरह निषिद्ध हैं। यही नहीं, साल 2001 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी अंडमान निकोबार प्रशासन को आदेश दिया था कि इन आदिम जनजातियों को उनके क्षेत्र में अतिक्रमण और अनावश्यक संपर्क से सुरक्षित रखा जाए, लेकिन फिर भी इन क्षेत्रों में ये गैर कानूनी और गैर इंसानी गतिविधियां बराबर चलती रहीं। क्षेत्र में नियम का उल्लंघन बढ़ता ही गया। प्रशासन की अनदेखी और लापरवाही से मानव सफारी का यह घृणित कारोबार बिना रोक-टोक जारी रहा। बेयरफुट नामक एक पर्यटक कंपनी ने तो हद ही कर दी। साल 2006 में सारे कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर उसने जारवा जनजाति के सुरक्षित क्षेत्र से महज तीन किलोमीटर दूरी पर एक रिसॉर्ट भी बना लिया। बहरहाल, जब ये सारी खबरें मीडिया में आई तो सरकार को देश-दुनिया में काफी शर्मिदगी झेलनी पड़ी। एक तरफ सरकार पर ये इल्जाम लगे कि आजादी के छह दशक बाद भी वह जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा में नहीं ला पाई है तो दूसरी तरफ कानूनी संरक्षण के बाद भी वह इन जनजातीय समुदायों का शोषण नहीं रोक पा रही है। यही वजह है कि भविष्य में जारवा समुदाय के ऐसे इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने अब सख्ती बरतने का फैसला किया है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह (आदिवासियों का संरक्षण) संशोधन नियमन-2012 इसी दिशा में उठाया गया, सरकार का एक छोटा-सा कदम है। देर से ही सही, सरकार ने एक उचित पहल की है, लेकिन सिर्फ कानून बनाने से ही सरकार की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। जनजातीय समुदाय मुख्यधारा में आएं, इसके लिए सरकार को विशेष प्रयास करने होंगे। प्रयास उनकी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने के लिए ही नहीं होने चाहिए, बल्कि आधुनिक विकास का उन्हें फायदा मिले, इसकी भी कोशिशें करनी होगी। तभी जाकर इन जनजातीय समुदायों को सही मायने में इंसाफ मिल पाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Sunday, May 15, 2011

जब रक्षक ही बन जाएं भक्षक


पुलिस बल प्रशिक्षित, शिक्षित और अनुशासन का पाठ पढ़ाए गए कुछ विशिष्ट शासकीय सेवकों का वह बल होता है, जो विधि और व्यवस्था के पहरेदार होते हैं। यह पुलिस बल की परिभाषा है। पुलिस बल की इस सुपरिभाषित भूमिका के बावजूद मुल्क में आए दिन ऐसे मामले सामने आते रहते हैं, जिसमें भारतीय पुलिस का एक दूसरा ही रूप उजागर होता है। विधि और व्यवस्था के पहरेदार खुद कानून को तोड़ते हैं और खुलकर मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं। गोया कि, जिनके हाथों में अवाम की हिफाजत का जिम्मा है, वे ही उन पर जुल्म ढाते हैं। भारतीय पुलिस की अमानवीयता और दरिंदगी का एक ऐसा ही मामला हाल ही में सामने निकलकर आया। पिछले दिनों 18 साल पहले हुई एक वारदात के मुकदमे का फैसला सुनाते हुए हमारे मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीमकोर्ट ने एक बार फिर भारतीय पुलिस बल के कामकाज पर सवालिया निशान लगाया है। अदालत ने अपने फैसले में पुलिसकर्मियों को साफ-साफ चेतावनी देते हुए कहा है कि वे अपने तौर-तरीके को बदलें, अवाम की जानिब संवेदनशील बनें। भक्षक की बजाय रक्षक बनें। तमिलनाडु के अन्नामलाई नगर में एक औरत को थाने में निर्वस्त्र कर सरेआम घुमाने, उसके पति के सामने ही बलात्कार करने और बाद में पति को पीट-पीटकर मार डालने जैसे हैवानियत से भरे मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत की जस्टिस मार्कडेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा की पीठ ने आरोपी पांचों पुलिसवालों की हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखते हुए इस बात पर भी अपना अफसोस जताया कि इतने जघन्यतम अपराध के लिए इन अपराधियों पर आइपीसी की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया? अदालत न सिर्फ पुलिसवालों की करतूतों से खफा थी, बल्कि उसने निचली अदालत के कामकाज पर भी अंगुली उठाते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट दोनों ने ही वहशी पुलिसवालों के खिलाफ हत्या का मुकदमा न चलाकर फरियादी के साथ घोर नाइंसाफी की है। पीठ ने अपने फैसले में मजबूरी जताते हुए आगे कहा कि अब सजा बढ़ाने के लिए सरकार को नोटिस देने का भी कोई औचित्य नहीं, क्योंकि गुनाहगारों के खिलाफ निचली अदालतों में हत्या का अभियोग तक निर्धारित नहीं हुआ। यह मामला इतना दरिंदगी भरा और शर्मनाक था कि लोगों के सिर शर्म से झुक जाएं। पुलिसवाले पहले तो नंदगोपाल नाम के शख्स को महज चोरी के शक में पकड़कर थाने ले गए। बाद में उन पुलिसवालों ने उसकी पत्नी को भी थाने बुला लिया और उसके बाद टूटा इन दोनों मजलूमों पर पुलिसिया कहर। पुलिसवालों ने न सिर्फ मुल्जिम की पत्नी को चार दिन तक अपनी हवस का शिकार बनाया, बल्कि उसकी आंखों के सामने ही उसके पति को पीट-पीटकर मार डाला। तिस पर इंसाफ की अजब तस्वीर देखिए कि इस खौफनाक अपराध के लिए ट्रायल कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट में अपराधियों पर सिर्फ आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा चला, जबकि मामला साफ-साफ दफा-302 का था। गुनाहगारों के खिलाफ कायदे से हत्या का अभियोग निर्धारित होना था। जाहिर है, निचली अदालतों में जिस तरह से पहले ही केस को कमजोर कर दिया गया, उसमें सुप्रीमकोर्ट के लिए गुंजाइश ही कहां बची थी कि वह फरियादी को वाजिब इंसाफ दे सके? बावजूद इसके अदालत ने इस पूरे मामले में फरियादी के जानिब संवेदनशील और पुलिस व निचली अदालतों के खिलाफ जो कठोर रुख दिखलाया, वह काबिले तारीफ है। सर्वोच्च अदालत की दो सदस्यीय इस खंडपीठ ने भारतीय पुलिस बल को डीके बसु केस में पुलिसकर्मियों के लिए जारी दिशा-निर्देर्शो को याद दिलाते हुए कहा कि यह दिशा-निर्देश मुल्क के हर थाने में पट्टी पर लिखे रहते हैं, फिर भी इनका जानते-बूझते उल्लंघन होता है। दरअसल, यह कोई पहली बार नहीं है, जब हमारी सर्वोच्च अदालत ने पुलिस बल और निचली अदालतों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हों। अभी बमुश्किल कुछ ही दिन बीते हैं, जब अदालत ने इलाहाबाद, जबलपुर और पटना हाईकोर्ट के कुछ फैसलों पर अंगुली उठाई थी। शीर्ष अदालत ने अपराध के समय गैरहाजिर रहे व्यक्ति को भी आरोपी बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए उस वक्त कहा था कि कुछ अदालतों में फौजदारी मामलों की सुनवाई में उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है। बहरहाल, जहां अदालतें अपना काम जिम्मेदारी से नहीं निभा रही हैं, वहीं हमारा पुलिस बल मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलें में तो जैसे कुख्यात ही हो गया है। विधि व व्यवस्था की पहरेदारी के अलावा पुलिस बल का काम मानव अधिकारों की हिफाजत करना भी है, लेकिन बीते कुछ सालों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिससे मालूम चलता है कि वह अपनी जिम्मेदारियों को ठीक तरह से निभाने में पूरी तरह से नाकाम रहा है। बेकसूरों की जबरन धरपकड़ और उन पर झूठे मुकदमें लादना, हिरासत में भयानक उत्पीड़न, फर्जी मुठभेड़ व भ्रष्टाचार तो जैसे पुलिस के लिए रोज-ब-रोज की बात हो गई है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ लगातार मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतें आती रहती हैं, लेकिन फिर भी सरकार के सिर जरा-सी भी जूं नहीं रेंगती। लाख घटनाएं होती रहें, मगर मजाल है कि पुलिस ढांचे में कोई सुधार हो? सत्ता में बैठे लोगों की दिलचस्पी इस बात में जरा-सी भी नहीं दिखाई देती कि कैसे पुलिस महकमे को अवाम के जानिब संवेदनशील और जबावदेह बनाया जाए। जैसा कि सब जानते हैं, एक लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण व्यवस्था में सजा देने का काम अदालत का है, न कि पुलिस का। लिहाजा, फर्जी मुठभेड़ और हिरासत में हुई मौतों के मामले में जवाबदेही तय की जाना बेहद जरूरी है और यह जवाबदेही दोषी पुलिसवालों को सजा देने से लेकर पीडि़तों को मुआवजा दिलवाने तक हो। तभी जाकर हालात सुधरेंगे। कुल मिलाकर हमारी सर्वोच्च अदालत ने अपने कई फैसलों में भारतीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं और हर बार पुलिस ढांचे में व्यापक सुधार की जरूरत को रेखांकित किया है। यही नहीं, पुलिस सुधार के लिए गठित कई समितियों ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस की कार्यप्रणाली को सुधारने के लिए कई तजवीजें पेश की हैं, लेकिन सरकार ने अभी तक इन पर कोई सार्थक कदम नहीं उठाया है। पुलिस सुधार के लिए उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को पांच साल होने को आए, लेकिन इस बाबत अभी तक कुछ भी नहीं हुआ है। सोराबजी समिति ने भारतीय पुलिस के अंदर बुनियादी सुधार के लिए अपनी रिपोर्ट में सरकार को कई महत्वपूर्ण सिफारिशें दी थीं, लेकिन अफसोस कि ज्यादातर सूबाई सरकारें इन सिफारिशों को अपने यहां लागू करने के लिए रजामंद नहीं हैं। मानवाधिकारों की बढ़-चढ़कर बात करने वाली संप्रग सरकार को अब तो इन सिफारिशों पर गंभीर होना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


Sunday, January 16, 2011

बेरुखी का शिकार बेघर

हमारा संविधान हर नागरिक को जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इसके अंतर्गत हर नागरिक को खाने के अलावा रहने के लिए सिर पर छत होनी चाहिए। घर के अभाव में गरीब, बेघर और फुटपाथ पर जिंदगी बसर करने वालों के लिए रात गुजारने के लिए कम से कम रैन बसेरा तो होना ही चाहिए। मई 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में बाकायदा सभी सूबों के मुख्य सचिवों को आदेश जारी किए थे कि जनसंख्या के आधार पर विभिन्न शहरों में रात्रिकालीन आश्रय स्थलों का निर्माण किया जाए। और इन स्थलों पर कंबल, दवाइयां, पानी, शौचालय और बिजली आदि भी नि:शुल्क मुहैया कराई जाए। लेकिन हमारी लोकतांत्रिक और कथित कल्याणकारी सरकारें इस दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठातीं। बेघर लोगों की जरूरतों की प्रति वे हमेशा उदासीन ही बनी रहती हैं। ऐसी ही उदासीनता का एक मामला अभी हाल ही में महाराष्ट्र में सामने आया है। बेघरों को आश्रय मुहैया कराने के लिए जब एक गैर सरकारी संगठन पीयूसीएल के कार्यकर्ता महाराष्ट्र के पूर्व सचिव जेज़े. डांगे के पास पहुंचे तो उन्होंने बड़ी ही बेरूखी से यह कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया कि बेघर लोग बाहर के हैं, वे महाराष्ट्र के नहीं हैं। लिहाजा उन्हें अपने सूबों में वापस लौट जाना चाहिए। नागरिकों के प्रति यह संवेदनहीनता उस वक्त सामने आई, जब सुप्रीम कोर्ट बेघरों को आश्रय मुहैया कराने के एक मामले में सुनवाई कर रहा था। अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए न सिर्फ अपनी नाराजगी जताई, बल्कि इस बाबत राज्य सरकार से जबाव-तलब करते हुए कहा कि कोई सरकार किसी नागरिक को बाहरी कैसे कह सकती है। यह मुल्क सभी का है और हर एक को मुल्क में समान अधिकार हैं। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में घरेलू और बाहरी के नाम पर विवाद नया नहीं है। लेकिन यह शायद पहला मौका है जब किसी शीर्ष ओहदे पर बैठे अफसर ने बाहरी लोगों पर इस तरह की गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी की है। यह हमारे सर्वोच्च अदालत के आदेश की अवमानना है। जिसे किसी भी हाल में माफ नहीं किया जाना चाहिए। जब हमारे प्रशासनिक अधिकारी भी लीडरों की तरह बर्ताव करने लगेगें तो आम अवाम अपनी गुहार लेकर कहां जाएगा। आधुनिक समाज में कोई भी संवेदनशील सरकार नागरिकों के साथ इस तरह का बर्ताव नहीं कर सकती। सरकारों के इस गैर जिम्मेदाराना रवैये के खिलाफ हालांकि हमारी अदालतें सख्त रहीं हैं फिर भी मुल्क में आए दिन इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं। हर साल अदालत सरकारों को फटकार सुनाती है। पर फिर भी बेघर-बेबस लोगों को ठंड से बचाने के लिए कोई माकूल इंतजाम नहीं हो पाते। कभी राजनीतिक तो कभी प्रशासनिक उदासीनता के चलते जरूरतमंदों को फायदा नहीं मिल पाता। नियमों के मुताबिक हर एक लाख की आबादी पर एक रैन बसेरा होना चाहिए। लेकिन जमीनी स्तर पर देखें तो मुल्क में कहीं भी आबादी के हिसाब से रैन बसेरे नहीं हैं। कुल मिलाकर लोकतंत्र में यह स्थिति किसी भी हाल ठीक नहीं। लोकतंत्र तभी जिंदा रह सकता है, जब उसके नागरिकों के मौलिक अधिकार बहाल हों। साथ ही कहीं भी नागरिकों के बीच आपस में भेद न हो।