Friday, June 22, 2012

छोटे कुनबे में बड़ी दरार


अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार को 1996 में जब बहुमत जुटाने के लिए समर्थन नहीं मिला तो लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि विचारधारा पर आधारित दल के विस्तार की सीमा होती है। उनका कहने का आशय था कि विचारधारा के आधार पर भाजपा के विस्तार की अब गुंजाइश नहीं बची है। तत्कालीन सरसंघ चालक प्रोफेसर राजेंद्र सिंह और लालकृष्ण आडवाणी की संघ और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से लंबी मंत्रणा के बाद तय हुआ कि भाजपा को केंद्र में सत्ता हासिल करने के लिए अपनी विचारधारा से समझौता करना पड़ेगा। उसके बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का जन्म हुआ। इसके लिए भाजपा ने रामजन्म भूमि, समान नागरिक आचार संहिता और कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के मुद्दे छोड़ दिए और 1998 में सत्ता में आ गई। 1999 में सरकार गिरी तो मध्यावधि चुनाव में वापस आ गई। 2004 से भाजपा केंद्र की सत्ता से तो गई ही उसकी केंद्रीय सत्ता भी चली गई। सवाल है कि क्या भाजपा विचारधारा की ओर लौटेगी? क्या मोहन भागवत इसी बदलाव की ओर संकेत कर रहे हैं। उस समय विचारधारा से समझौता करने के बावजूद उसके पास चुनाव जिताने के लिए आवश्यक नेता, नीति, नीयत और संगठन साथ थे। वाजपेयी के सक्रिय राजनीति से हटने के बाद से भाजपा संभलने की बजाय गिरती ही गई। वाजपेयी के बाद स्वाभाविक रूप से नेतृत्व आडवाणी के हाथ आ गया। आडवाणी ने आडवाणी बने रहने की बजाय वाजपेयी बनने का प्रयास किया और पाकिस्तान जाकर जो किया उससे भाजपा नेता और नीति दोनों से महरूम हो गई। इसके बावजूद सत्ता की आस में पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नेता बदलने का साहस नहीं जुटा पाए। जिन्ना प्रकरण के बाद जिसे पार्टी से बाहर किया जा रहा था उन्हीं लालकृष्ण आडवाणी को 2009 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश किया गया। नतीजा यह हुआ कि 1991 के बाद भाजपा को लोकसभा की सबसे कम सीटें मिलीं। गुजरात के लोग भी इस बात से उत्साहित नहीं हुए कि उनके राज्य का प्रतिनिधि देश का प्रधानमंत्री हो सकता है। गुजरात में भी भाजपा की सीटें कम हो गईं। राष्ट्रपति चुनाव खत्म होते-होते भाजपा सहयोगी दलों की संख्या के लिहाज से 1996 की हालत में या उससे भी बुरी हालत में पहुंच जाए तो आश्चर्य नहीं। शिवसेना ने साफ कर दिया है कि वह राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन करेगी। नीतीश कुमार ने एक इंटरव्यू में कहा है कि राजग का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पंथनिरपेक्ष होना चाहिए। उन्होंने गुजरात के विकास संबंधी मोदी की उपलब्धियों पर यह कह कर सवाल उठाया है कि विकसित राज्य का विकास करने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री के रूप में नहीं चाहिए। नीतीश कुमार राष्ट्रपति चुनाव को मुद्दा बनाने की बजाय 2014 के लोकसभा चुनाव के मुद्दे उठा रहे हैं। पर भाजपा बड़ी तस्वीर देखने की बजाय छोटी-मोटी लड़ाइयों में उलझी है। नीतीश की बात का जवाब भाजपा की ओर से नहीं संघ की ओर से आया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि कोई हिंदुत्ववादी प्रधानमंत्री क्यों नहीं हो सकता। इसे नरेंद्र मोदी के लिए संघ के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। क्या संघ ने तय कर लिया है कि मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी होंगे, चाहे जनता दल (यूनाइटेड) राजग में रहे या न रहे। ऐसा निष्कर्ष निकालना शायद जल्दबाजी होगी। भागवत से पहले शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे मोदी के समर्थन में बोले पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व चुप्पी साधे हुए है। भाजपा अपने आपसे जंग लड़ती नजर आ रही है। 2004 लोकसभा चुनाव में हार और जिन्ना प्रकरण के बाद दूसरी पीढ़ी के नेताओं ने पार्टी को ज्यादा उदारवादी और आधुनिक पहचान देने की कोशिश की। 2009 के लोकसभा चुनाव की हार ने पार्टी को दोराहे पर खड़ा कर दिया- वह पुरानी जड़ों की ओर लौटे या नए रास्ते पर चले। उसे पता नहीं है कि 2009 में मतदाताओं ने आडवाणी के नेतृत्व को नकारा या दोनों को। संघ ने 2009 की हार के बाद नितिन गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवाकर भविष्य की दिशा का एक संकेत दिया था, लेकिन भाजपा ने राष्ट्रपति चुनाव पर जो रवैया अपनाया है उससे लगता है कि दोराहे पर खड़ी पार्टी अब चौराहे पर आ गई है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए उसके पास कोई अपना उम्मीदवार नहीं है। पार्टी ने अपनी ताकत बढ़ाने की बजाय कांग्रेस की कमजोरी पर दांव लगाया। ममता बनर्जी के साथ मुलायम जुड़े तो उसे लगा कि उसका खेल बन गया। किसी ने समझने की कोशिश नहीं की कि मुलायम भाजपा का खेल क्यों खेलेंगे। भाजपा के साथ जाकर उन्हें हासिल क्या होगा। मुलायम के प्रणब मुखर्जी का समर्थन करते ही भाजपा का हवाई किला ढह गया। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की उम्मीदवारी भाजपा की दूसरी उम्मीद थी। उनकी उम्मीदवारी के जरिए वह राजग के नए सहयोगी जोड़ सकती थी। उन्हें लड़ाने का राजनीतिक तर्क फिर भी समझ में आता था। कलाम के मना करने के साथ ही राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा की भूमिका खत्म हो गई। पर पार्टी यह समझने को तैयार नहीं है। जनतंत्र में चुनाव अच्छी बात है। पर कभी-कभी चुनाव के मैदान में न होना भी अच्छी रणनीति होती है। भाजपा नेताओं की यह समझ लगता है कन्नौज तक सीमित है। भाजपा में केंद्रीय नेतृत्व का अवसान हो गया है। पार्टी यह समझने को तैयार नहीं है कि उसकी ताकत की धुरी केंद्र से हटकर राज्यों में चली गई है। भाजपा कांग्रेस पर अकसर आरोप लगाती है कि वहां सब कुछ सोनिया गांधी तय करती हैं। इसके बावजूद सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय करने से पहले अपने मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों को मशविरे के लिए बुलाया। भाजपा ने अपने मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों को इस काबिल भी नहीं समझा। इसके बावजूद कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को सत्ता में लाने की जिम्मेदारी राज्यों पर ही होगी। राजग का छोटा-सा कुनबा 2009 की तुलना में ज्यादा बंटा हुआ नजर आ रहा है। नए सहयोगियों के जुड़ने की तो बात ही छोडि़ए। राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा ने अपनी ताकत दिखाने की बजाय अपना बंटा हुआ घर दिखाया है। पार्टी के ही नेता खुलेआम प्रणब मुखर्जी को समर्थन की घोषणा कर रहे हैं। जो अपना घर न संभाल सके उसे देश संभालने की जिम्मेदारी मतदाता कैसे देगा? चाहे वह हिंदुत्ववादी ही क्यों न हो! (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

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