बजट सत्र के आखिरी दिन लोकसभा से कॉपीराइट कानून में संशोधन के बाद जब गीतकार, लेखक और राज्यसभा सदस्य जावेद अख्तर गैलरी में बैठे विजय भाव व्यक्त कर रहे थे और बाकी सांसद बिल के पक्ष में ध्वनिमत से समर्थन जता रहे थे तो लगा कि हमारे सांसद लेखकों और पत्रकारों के हक के लिए कितने संवेदनशील हैं। संभव है वे कार्टून विवाद से अपनी रचनात्मक छवि में लगे बट्टे को पूरा करने में लगे हों। यानी अब किसी रचना का पहला स्वामित्व लेखक, गीतकार और संगीतकार का होगा और उसे उसकी रायल्टी आजीवन मिलेगी। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने इस कानून का महत्व बताते हुए कहा कि शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खान और संगीतकार रवि ने जिस तरह जीवन के आखिरी दिन गुरबत में बिताए, वैसा अन्य कलाकारों के साथ नहीं होना चाहिए। लेकिन उसी समय हिंदी के मूर्धन्य पत्रकार प्रभाष जोशी की टिप्पणी याद आ गई कि किसी को ज्यादा धन देने से इस बात की गारंटी नहीं है कि वह अच्छी रचना तैयार ही कर देगा। उसके परिणाम देखे भी जा सकते हैं। जगह-जगह बड़ा पैकज अच्छी रचनात्मकता के बजाय कुशल प्रबंधन की गारंटी बन कर रह गया है। रचना अच्छी हो जाए और उसका उसे पुरस्कार मिले और मिलता रहे, यह तो अच्छा है लेकिन रॉयल्टी और ज्यादा पारिश्रमिक से प्रेरित होकर रचनात्मकता बढ़ने की उम्मीद नहीं है। इसी के साथ यह संदेह भी होता था कि उनकी इस टिप्पणी में लेखक का पारिश्रमिक खा जाने की चालाकी छुपी हुई है। यह एक प्रकार से शोषण की दलील लगती थी लेकिन यह दलील उन तमाम लोगों की है जो रचनात्मक कामों को महज व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए नहीं करते बल्कि उनका मकसद एक तरफ स्वान्त: सुखाय होता है तो दूसरी तरफ समाज से संवाद बनाना होता है। वे उसे ‘त्वदीयं वस्तु गोविंदम..’ मानकर करते हैं। यही वजह है कि महान लेखक और उपन्यासकार लियो टॉलस्टॉय ने अपनी रचनाओं पर कॉपीराइट लेने से मना कर दिया। महात्मा गांधी भी इसी सोच के थे और दिचलस्प बात है कि उनसे प्रभावित पर्यावरण संबंधी लेखक अनुपम मिश्र या उनके जैसे मित्रों की किताबों पर साफ लिखा होता है इस किताब की सामग्री का प्रयोग करने से पूर्व अनुमित लेने की जरूरत नहीं है। प्रयोग करने पर स्रेत का उल्लेख करें तो अच्छा लगेगा। तमाम किताबों पर लिखी कॉपीराइट की डरावनी भाषा को पढ़कर यह निर्देश बेहद अपनत्व देता है। जाहिर है, एक तरफ दुनिया में बौद्धिक कृतियों को वस्तु बनाकर उनके स्वामित्व को पुख्ता किया जा रहा है और उन्हें फिर से प्रकाशित और प्रसारित किए जाने को चोरी-डकैती जैसा अपराध बनाया जा रहा है तो दूसरी तरफ अब भी ऐसे लोग हैं जो कॉपीराइट को ज्ञान और सूचना की आजादी के लिए घातक मानते हैं। उनकी दलील है कि कॉपीराइट का उल्लंघन न चोरी है और न डकैती, क्योंकि इसके तहत मूल वस्तु तो स्वामी के ही पास रहती है और उसका किसी प्रकार का क्षरण नहीं होता। फ्रांस, स्वीडन, अमेरिका, ग्रीक और ब्रिटेन में तमाम ऐसे संगठन हैं जो कॉपीराइट कानून तोड़ने के लिए इलेक्ट्रॉनिक सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाते हैं। वे अपनी फाइलें शेयर करते हैं। स्वीडन की मॉर्डन पार्टी के कुछ सांसदों ने तो फाइल शेयरिंग को अपराध की सूची से हटाने का अभियान भी चला रखा है। उनका कहना है कि यह कानून लेखक की संकीर्ण परिभाषा पर आधारित है जिसमें कानून का लाभ लेखक कम और कॉपीराइट उद्योग ज्यादा उठाता है। कापीराइट कानून के अराजक विरोधियों के इस यूटोपिया के बावजूद हकीकत यह है कि दुनिया में 18वीं सदी से ही इस तरह के कानून बनने लगे और उरुग्वे दौर के बाद जब 1995 में डब्ल्यूटीओ यानी वि व्यापार संगठन बना तो बौद्धिक संपदा के संरक्षण के लिए इस तरह के कानून की आवश्यकता बढ़ने लगी। आजाद भारत में 1957 में पास हुआ कॉपीराइट कानून 1958 में लागू हुआ। वह कानून लेखक के निधन के बाद उसकी कृति पर उत्तराधिकारियों को पचास साल तक का कॉपीराइट देता था। तब कॉपीराइट उद्योग किताबों, फिल्मों और ऑडियो कैसेटों तक सीमित था लेकिन प्रौद्योगिकी के विस्फोट और उसी के साथ मानवीय रचनाओं की बाढ़ के साथ यह आज एक बड़ा उद्योग बन चुका है। उद्योग जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उस पर चोरी और डकैती के आरोप भी उतनी ही तेजी से लग रहे हैं क्योंकि उसके व्यावसायिक हित उतनी ही तेजी से बढ़ रहे हैं इसीलिए उसमें बार- बार संशोधन की जरूरत पड़ रही है। इस कानून में 1983, 84, 1994 में भी संशोधन हुए थे। लेकिन 2012 का संशोधन बड़ा बताया जा रहा है। अब लेखक को रचना के मालिकाना हक के साथ निधन के बाद कॉपीराइट की अवधि साठ साल कर दी गई है। अच्छी बात है कि संसद ने नये कानून में लेखकों को ज्यादा अहमियत दी है लेकिन उसके पीछे उद्योग का दबाव नहीं है, कहना कठिन है। आज कॉपीराइट उद्योग के दायरे में प्रिंट, प्रकाशन उद्योग ऑडियो कैसेट, सीडी उद्योग, फिल्म वीडियो और कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर जैसे कारोबार आ चुके हैं। भारत का प्रकाशन उद्योग दुनिया में सातवें नंबर पर है। यहां सालाना सैकड़ों फिल्में बनती हैं और 11000 प्रकाशक सालाना करीब 57000 नए शीषर्कों वाली किताबें छापते हैं। इसमें अंग्रेजी में लिखी सामग्री का 22 प्रतिशत प्रकाशन होता है। शेष अन्य भारतीय भाषाएं हैं। यहां सॉफ्टवेयर उद्योग सालाना 50 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। लेकिन कॉपीराइट कानून के संसद से पास होने और उस पर लेखकों और सासंदों की खुशी के बावजूद भारत का रचनात्मक उद्योग अब भी टालस्टाय और गांधी के दर्शन को जी रहा है। इसमें शोषण भी है और व्यावसायिक दुनिया से अलग रहने का रचनात्मक आग्रह भी। यह बात कई बार सामने आई है कि जिन महान लोगों की रचनाओं पर कॉपीराइट कानून सख्ती से लागू किया गया, उनसे दुनिया कम परिचित हो पाई और समाज उसका कम लाभ उठा पाया। रवींद्रनाथ टैगोर के साथ ऐसा ही हुआ। उनकी रचनाओं पर विभारती कुंडली मार कर बैठा रहा और गुरु देव के खजाने से कम लोग परिचित हो सके। इस पर शंख घोष जैसे कवि आपत्ति भी जताते रहे हैं। यानी सख्त कॉपीराइट कानून में रचनात्मकता बढ़ने के बजाए सिकुड़ जाती है। अगर इन दलीलों को भूल भी जाएं तो भारत में कॉपीराइट कानून की हकीकत अन्य विकसित देशों से काफी अलग है। यहां कोई भी ग्राहक न तो कॉपीराइट का मार्क देखकर वस्तु खरीदता है और न कानून को याद रखता है। यही स्थिति देश की पुलिस की भी है। उसे कॉपीराइट कानून की विधिवत जानकारी तक नहीं है। इसलिए नया कानून लागू कैसे होगा, इसका सरकार के पास सीधा जवाब नहीं है। यही संदेह लता मंगेशकर ने भी जताया है जो इस तरह के कानून की वर्षो से मांग कर रही थीं कि जब भी उनका कोई गीत प्रसारित हो, उन्हें रॉयल्टी मिले। मानव संसाधन मंत्रालय ने रपट तैयार करने के दौरान महसूस किया है कि उसे आंकड़े जुटाने में कितनी परेशानी हुई। इस लिहाज से अगर डब्ल्यूटीओ व्यवस्था के दायरे में संशोधित कॉपीराइट कानून के तहत मौजूदा अफरा-तफरी और अराजकता दूर होती है तो उसका स्वागत होना चाहिए। उस व्यवस्था का आर्थिक पक्ष भी है जो कॉपीराइट उद्योग को ज्यादा प्रेरित कर रहा है। यूरोपीय संघ में अगर यह उद्योग जीडीपी का पांच प्रतिशत से ज्यादा है तो अमेरिका में कुल कॉपीराइट उद्योग का योगदान 12 प्रतिशत तक है। उसी तर्ज पर आज भारत में बौद्धिक संपदा से जुड़ी आर्थिक गतिविधियां तेज करने के लिए कॉपीराइट उद्योग लालायित है। लेकिन वह यह नहीं सोच पा रहा है कि कॉपीराइट कानून का सख्ती से पालन हुआ होता तो भारत शायद ही कंप्यूटर साक्षर हो पाता। मीडिया उद्योग की वृद्धि भी ठहरी होती। इसलिए इस कानून का उपयोग रचनात्मकता बढ़ाने के लिए होना चाहिए, उसका गला घोंटने के लिए नहीं।
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