Saturday, June 23, 2012

कसौटी पर कट्टरता

भाजपा की विचारधारा एक बार फिर निशाने पर है। कट्टर हिंदूवादी छवि के कारण ही वर्ष 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार समर्थन नहीं जुटा सकी थी और गिर गई थी। उसी के बाद भाजपा ने अपनी उदारवादी छवि बनाने की कवायद शुरू की थी। पार्टी ने राम जन्मभूमि, समान नागरिक संहिता तथा कश्मीर में अनुच्छेद-370 के खात्मे की विवादस्पद मांगों को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला किया था। तत्पश्चात, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) बना था। राजनीति में हुए इस अनोखे प्रयोग की बदौलत ही वह वर्ष 1998 में सत्ता में आई थी। यद्यपि 13 महीने में ही सरकार गिर गई लेकिन मध्यावधि चुनाव में वह पुन: सत्ता में आ गई थी। उस समय राजग को भानुमती का कुनबाकहने वाली कांग्रेस को भी करारा जवाब मिला था। गठबंधन राजनीति के इस सफल प्रयोग के लगभग डेढ़ दशक बाद भाजपा की विचारधारा पर पुन: सवाल उठाने लगे हैं। राजग के प्रमुख घटक जदयू के बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि राजग के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार धर्मनिरपेक्ष छवि का होना चाहिए। आगामी आम चुनाव को देखते हुए नीतीश के बयान के राजनीतिक निहितार्थ खोजे जा रहे हैं। क्या भाजपा पर संघ के बढ़ते शिकंजे तथा विचारधारा पर वापसी की कवायद से जदयू असहज है? नीतीश का बयान भाजपा की अंदरूनी राजनीति का नतीजा तो नहीं है? अभी मुंबई में हुई भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में जिस तरह से नरेंद्र मोदी की जिद पर संघ समर्थित संजय जोशी को अधिवेशन और फिर पार्टी से बाहर किया गया; उसके बावजूद संघ जिस तरह मोदी के पीछे खड़ा है, उससे जदयू परेशान है। उसे लगने लगा है कि संघ 2014 में मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में देख रहा है। इसीलिए नीतीश ने यह बयान देकर संघ को चेताने की कोशिश की है कि उन्हें कट्टर हिंदूवादी छवि वाले नेता (मतलब मोदी) मंजूर नहीं हैं। नेता गठबंधन के सभी घटकों को स्वीकार्य होना चाहिए, जिसकी छवि धर्मनिरपेक्ष हो। यह और भी दिलचस्प है कि नीतीश के बयान का तत्पर जवाब भाजपा की ओर से नहीं बल्कि संघ से आया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत का नीतीश से सवाल है कि कोई हिंदूवादी प्रधानमंत्री क्यों नहीं हो सकता? इसे मोदी के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है, जिसे लेकर जदयू आगबबूला है। इसलिए राष्ट्रपति चुनाव में उसने कांग्रेस प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर अपने इरादे का इजहार कर दिया है। उसने तो धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर राजग से बाहर जाने की बात कही है। ऐसे में क्या संघ मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाकर राजग के बड़े सहयोगी को नाराज करने का खतरा मोल लेगा, जबकि बिहार में इस गठबंधन की सरकार है? वैसे भाजपा के साथ न रहने पर भी जदयू की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मोदी से जदयू की चिढ़ पुरानी है। जदयू का मानना है कि गोधरा कांड के बाद अगर वाजपेयी जी गुजरात में मोदी सरकार को बर्खास्त कर देते तो 2004 में राजग चुनाव नहीं हारता। इतना ही नहीं लगभग दो वर्ष पूर्व पटना में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान मोदी के साथ हाथ मिलाते अपनी तस्वीर छपने से नीतीश इतने नाराज हुए थे कि भाजपा नेताओं के सम्मान में आयोजित भोज तक रद्द कर दिया था। साथ ही साथ कोसी के बाढ़ पीड़ितों के लिए गुजरात से मिली पांच करोड़ की सहायता राशि तक लौटा दी थी। यहां तक कि बिहार विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार ने मोदी को प्रचार के लिए न बुलाने की शर्त रखी थी, जिसे मजबूर होकर भाजपा को मानना पड़ा था। अब जब संघ के इशारे पर भाजपा सत्ता के लिए डग भर रही है तो वह चौकन्ने हो उठे हैं। वह बिहार की सत्ता में बने रहने के लिए अति पिछड़ों, महादलित वोट बैंक के साथ मुसलमानों के गठजोड़ में किसी तरह की दरार नहीं चाहते। इसके इतर, भाजपा जिसका 2009 के लोकसभा चुनाव में भी खराब प्रदर्शन रहा था; उससे सबक लेने की जगह आज आपस में लड़ रही है। उसके घटक दल अपनी अलग पहचान के साथ वृहत्तर स्वीकार्यता बनाने की कोशिश में है। नीतीश के बयान को उसी दिशा में बढ़ा हुआ कदम माना जा रहा है। उन्हें उम्मीद है कि 2014 में राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व होगा। इसीलिए उनकी पार्टी ने राष्ट्रपति चुनाव में गठबंधन की परवाह किए बगैर कांग्रेस प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी का समर्थन करने का फैसला किया है। वह 2014 में त्रिशंकु संसद की स्थिति में अपने विकल्प खुले रखने के लिए कांग्रेस से रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहते। इसी तरह, राजग की दूसरी महत्त्वपूर्ण सहयोगी शिवसेना पहले ही प्रणब दा के समर्थन का ऐलान कर चुकी है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार नवीन पटनायक की तरह भाजपा को झटका देंगे, जो 2009 चुनाव के ठीक पहले राजग छोड़ गए थे? यह आनेवाला समय ही बताएगा। भाजपा अपनों के बीच विचार युद्ध की लड़ाई लड़ रही है। वर्ष 2004 के चुनाव में हार और जिन्ना प्रकरण के बाद पार्टी की दूसरी पीढ़ी के नेताओं ने पार्टी को ज्यादा उदारवादी बनाने की कोशिश की। उस समय भी भाजपा का एक वर्ग पार्टी की मूल विचारधारा में लौटने की वकालत करता था। किंतु 2009 के चुनाव में हार के बाद संघ ने अब भाजपा की कमान अपने हाथ में ले ली है। संघ ने नितिन गडकरी को दूसरी बार अध्यक्ष बनाकर भविष्य का संकेत दे दिया है। ऐसे में पार्टी में उदारवादी चेहरे की वकालत करने वालों को डर सता रहा है कि क्या संघ ने अगले प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को पेश करने का मन बना लिया है? उन्हें आशंका है कि गुजरात में चंद महीनों के बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में चौथी बार भाजपा की सरकार बनाने के पश्चात मोदी दिल्ली का रुख करेंगे। उनकी नजर 2014 के चुनाव पर है। इसके पीछे संघ का तर्क है कि अकेले मोदी ही भाजपा में जनाधार वाले नेता हैं। उन्हें आगे करने से पार्टी के पक्ष में ध्रुवीकरण होगा। आम चुनाव में अधिक सीटें मिलने के बाद गठबंधन तैयार करने में आसानी होगी। क्या यह इतना आसान है? क्या मोदी के सहारे संघ भगवा लहर (हिंदुत्व की लहर) चला सकेगा? यह फिलहाल मुंगेरीलाल के हसीन सपनेजैसा ही लगता है; क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी को 2004 में चुनावी हार के बाद यह लगने लगा था कि उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि राजग के सर्वमान्य नेता बनने की राह में सबसे बड़ी बाधा है। इसी सोच के तहत उन्होंने अपनी पुरानी छवि तोड़ने और नई उदारवादी इमेज गढ़ने की पूरी कोशिश की। पाकिस्तान जाकर जिन्ना को सेक्युलर होने का प्रमाण इसी के तहत दिया गया था, जिसके चलते उन्हें संघ का कोपभाजन बनना पड़ा था। फिर भी उन्हें 2009 में संघ ने प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया था किंतु भाजपा को कोई खास सफलता नहीं मिली। ऐसे में मोदी पर संघ का दांव लगाना काफी जोखिम भरा लगता है। ऐसे में देखना होगा कि विचारधारा की कशमकश भाजपा को कहां ले जाती है? राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी चयन को लेकर अनिश्चय के भंवर में फंसी भाजपा की खूब फजीहत हो रही है। पार्टी अपने घटक दलों के साथ मिलकर इस संबंध में पहले कोई आम राय नहीं बना सकी। इसी बीच, कांग्रेस ने प्रणब दा को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाकर बाजी मार ली; क्योंकि भाजपा इस अहम सवाल पर कांग्रेस की कमजोरी में अपनी सफलता तलाश रही थी। ममता बनर्जी के साथ समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को खड़े देखकर उसे लगा कि उसका काम बन गया। किंतु मुलायम को शीघ्र ही उनका यह खेल समझ में आ गया और सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए उन्हें प्रणब दा का समर्थन करने में तनिक देर नहीं लगी। परिणामस्वरूप भाजपा के मंसूबे पर पानी फिर गया। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की उम्मीदवारी भाजपा की दूसरी उम्मीद थी। इसी बहाने, वह राजग का कुनबा बढ़ाने का भी सपना देख रही थी किंतु कलाम के इनकार से भाजपा को और बड़ा झटका लगा है। अब भाजपा पीए संगमा को समर्थन देकर हारी हुई लड़ाई लड़ने जा रही है। तो क्या संघ राष्ट्रपति चुनाव में राजग के सहयोगियों के रुख को देखते हुए अपनी भावी रणनीति (कट्टर हिंदूवादी छवि पर जोर देने वाली) पर पुनर्विचार करेगा?

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