राष्ट्रपति चुनावों को लेकर पिछले सप्ताह राजग में मचे घमासान को देखकर निश्चित तौर पर कांग्रेस की बांछे खिल गईं। इस हद तक कि संप्रग-3 की बातें भी होने लगी हैं। कांग्रेस की यह खुशी एक हद तक जायज भी है। कुछ समय पहले राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी और एपीजे कलाम के बीच कांटे की टक्कर की संभावना जताई जा रही थी, जो अब एकतरफा मुकाबले में बदल गई है। पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने घोषणा कर दी है कि वह राष्ट्रपति बनने की दौड़ में शामिल नहीं हैं। संप्रग को ममता बनर्जी के विद्रोह से जितना नुकसान हुआ है उससे अधिक लाभ समाजवादी पार्टी, शिवसेना, तेलगूदेशम पार्टी, माकपा और इन सबसे बढ़कर जनता दल (यू) के समर्थन से हो गया है। संप्रग उम्मीदवार को अब कितना समर्थन हासिल हो गया है, यह महज अटकलबाजी ही रह गई है। हालांकि हकीकत यह है कि अब कांग्रेस के प्रबंधक नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर जदयू और भाजपा में छिड़ने वाली जंग और परिणामस्वरूप नीतीश कुमार के राजग से बाहर आने की संभावनाओं पर उम्मीद लगा बैठे हैं। जदयू के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने आर्थिक संकट का सामना करने में संप्रग सरकार की जिस तरह सराहना की उससे इसकी अटकलें अचानक तेज हो गई हैं। नरेंद्र मोदी पर नीतीश कुमार के हमले के बाद अब ऐसी चर्चाएं शुरू हो गई हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री या तो समाजवादी पार्टी की राह पर चलने की सोच रहे हैं और खुद को कांग्रेस के सबसे बड़े सहारे के रूप में तैयार कर रहे हैं। दूसरा विकल्प यह है कि वह नवीन पटनायक का अनुसरण कर रहे हैं और खुद को स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्ति के रूप में तैयार कर रहे हैं, जिसका किसी भी राष्ट्रीय गठबंदन से जुड़ाव न हो। यह अनिश्चितता अच्छा संकेत नहीं है। पिछले दिनों नीतीश कुमार ने भाजपा नेतृत्व को स्पष्ट कर दिया था कि अगर 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया जाता है तो वह राजग से बाहर हो जाएंगे। इस मुद्दे को उन्होंने तब उठाया जब पिछले माह बिहार में जातीय राजनीति पर मोदी के मामूली से बयान पर उन्होंने हड़कंप मचा दिया। दरअसल, मोदी के निशाने पर नीतीश नहीं लालू प्रसाद यादव थे। इसके अलावा एक पत्रिका में नीतीश कुमार के खिलाफ लेख छपने पर भी मुद्दे ने तूल पकड़ा। पत्रिका के इस अंक में गुजरात सरकार का विज्ञापन छपा था। संक्षेप में, हमला बोलने में पहल नीतीश कुमार ने ही की। मोदी प्रोजेक्ट पर नीतीश कुमार द्वारा अपनी नाखुशी प्रकट करना अपनी जगह सही हो सकता है, किंतु ऐसा नहीं है कि इस कारण ही नीतीश ने राष्ट्रपति चुनाव पर राजग से अलग राह पकड़ी हो। आखिरकार, पीए संगमा को भाजपा ने एकतरफा उम्मीदवार नहीं चुना। वह अन्नाद्रमुक और बीजू जनता दल की पसंद थे। पिछले सप्ताह नवीन पटनायक ने संगमा को समर्थन देने के मुद्दे पर नीतीश कुमार से बात की थी। खबर है कि नीतीश कुमार ने पटनायक की बात पलटने का कोई ठोस कारण नहीं दिया। यह भी समझा जा सकता है कि नीतीश कुमार कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने के मुद्दे पर शरद यादव को भी पूरी तरह राजी नहीं कर पाए थे। इस अटकल में भी दम नहीं है कि नीतीश कुमार ने केंद्र को बिहार के लिए विशेष पैकेज देने पर राजी करने के बाद ही प्रणब मुखर्जी के समर्थन की घोषणा की है। बिहार को विशेष पैकेज की अटकलों में इसलिए दम नहीं है क्योंकि पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की अनदेखी करते हुए बिहार के लिए पैकेज देने में संप्रग न तो राजनीतिक रूप से सक्षम है और न ही आर्थिक रूप से। जी-20 शिखर सम्मेलन में मनमोहन सिंह के बयान से यह स्पष्ट हो जाता है कि राजकोषीय घाटे को काबू में करने के लिए सरकार अपने खर्चो पर अंकुश लगाना चाहती है। अगर केंद्र ने नीतीश कुमार से विशेष पैकेज का वादा किया भी है तो वह खुद भी जानते हैं कि उसमें कोई वजन नहीं है। इस स्थिति में कांग्रेस की तरफ से वचन दिया जाना ऐसा ही है जैसे एक लड़खड़ाते हुए बैंक के पोस्ट डेटेड चेक दे दिए जाएं। सही सोच रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस प्रकार की योजनाओं पर सहमत नहीं होगा। इसके अलावा आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बसपा के कुछ नेताओं के खिलाफ सीबीआइ के दबाव की रणनीति नीतीश कुमार के मामले में लागू नहीं हो सकती। वर्तमान हालात में कांग्रेस विरोधी ब्लॉक से नाता तोड़कर प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने में (वह भी तब जब उन पर हार का कोई खतरा नहीं है) कतई राजनीतिक समझदारी नहीं है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के खिलाफ चेतावनी जारी कर नीतीश कुमार उन भाजपा नेताओं को खुश कर रहे थे जिनके साथ उनके बेहतर संबंध हैं। उन नेताओं द्वारा नीतीश कुमार के विचारों पर ध्यान देने से मिलने वाले लाभ पर कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन देने की वजह से पानी पड़ गया। इससे न केवल नीतीश का बेदाग कांग्रेस विरोध रिकॉर्ड कलंकित हो गया, बल्कि उन्होंने जयललिता, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी और प्रकाश सिंह बादल जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के बीच अपना भरोसा भी गंवा दिया। एक समय था जब नीतीश कुमार को 2014 के आम चुनाव मेंखंडित जनादेश की स्थिति में भारतीय जनता पार्टी और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच प्रधानमंत्री पद के गंभीर दावेदार के रूप में देखा जाता था। इसमें संदेह नहीं कि उन्हें सिद्धांतवादी, भरोसेमंद और स्पष्ट छवि का राजनेता माना जाता है। समझ से परे है कि इस अकेले फैसले से उन्होंने अकारण ही खुद को मुलायम सिंह यादव की श्रेणी में क्यों ला खड़ा किया? वास्तव में राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर शेष राजग से अलग चलने के गंभीर दुष्परिणाम निकलेंगे। आधी रात को रहस्यमयी मुलाकात के बाद मुलायम सिंह की पलटी और नीतीश कुमार के इस फैसले से संघीय मोर्चे की उम्मीदों को झटका लगा है, जिस पर अगले आम चुनाव में बड़ी उम्मीदें बंधी थीं। क्षेत्रीय खिलाडि़यों की प्रासंगिकता बनी होने के बावजूद अब संप्रग और राजग में सीधे टकराव की संभावना बढ़ गई हैं। स्पष्ट जनादेश को तरस रहे भारत के लिए यह इतनी बुरी बात भी नहीं होगी। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
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