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Saturday, June 30, 2012

नीति-नियंताओं की नाकामी


इस साल पहली जून तक भारत में 842 लाख टन अतिरिक्त खाद्यान्न जमा था। यह इतनी भारी मात्रा है कि अगर एक के ऊपर एक बोरियां लगा दी जाएं तो आप इनसे होकर चांद तक पहुंच जाएंगे। इसके बाद भी 220 लाख टन खाद्यान्न बचा रह जाएगा। तस्वीर का दूसरा पहलू देखिए। भारत में हर रोज 32 करोड़ लोग भूखे सोते हैं और 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इस साल खाद्यान्न की बंपर पैदावार से भारत के पास देशवासियों का पेट भरने का ऐतिहासिक अवसर है। इस अतिरिक्त खाद्यान्न को जरूरतमंदों और भुखमरी के शिकार लोगों के घरों तक पहुंचाने के कार्यक्रम के जरिये हम न केवल भारत से भुखमरी का खात्मा कर देंगे, बल्कि विश्व में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या भी एक-तिहाई कम कर देंगे। आखिरकार, भारत में विश्व के कुल भूखे लोगों की एक-तिहाई आबादी रहती है। व‌र्ल्ड हंगर रिपोर्ट के अनुसार भारत 81 देशों की सूची में 67वें स्थान पर है। जहां तक भूख से जंग की बात है तो रवांडा भी भारत से आगे है। एक ऐसे समय भारत के पास खाद्यान्न का विशाल भंडार है और वह यूरोप के बचाव के लिए 57000 करोड़ रुपये की सहायता दे सकता है, तब इसका कोई कारण नजर नहीं आता कि भूख के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। मेरी समझ से भारत में खाद्यान्न का जितना भंडार है, उससे प्रत्येक भारतीय को 2200 कैलोरी प्रतिदिन मिल सकती हैं। दूसरे शब्दों में इतने खाद्यान्न से हर भारतीय का पेट भरा जा सकता है। भारतीयों का पेट भरने के बजाय खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री केवी थॉमस इस खाद्यान्न से छुटकारा पाने के उपाय तलाश रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 50 लाख टन खाद्यान्न आवंटित करने के बाद अब वह गेहूं के निर्यात की संभावना तलाश रहे हैं और वह भी घाटे पर। 778 रुपये प्रति क्विंटल के घाटे पर खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री 20 लाख टन गेहूं ईरान को निर्यात करने जा रहे हैं। निर्यात की दर किसानों को दिए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम रखी गई है। यहां तक कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों को जिस दर पर गेहूं बेचा जाता है, यह दर उससे भी कम है। वह और भी गेहूं निर्यात करते, किंतु मंत्रालय के दुर्भाग्य से फिलहाल गेहूं की अंतरराष्ट्रीय मांग ही नहीं है। भंडारण की अपनी अक्षमता को जाहिर करते हुए थॉमस पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि 66 लाख टन गेहूं के लिए कोई सही भंडारण क्षमता नहीं है, इसलिए वह खुले में पड़ा हुआ है और बारिश में सड़ रहा है। मंत्री का यह बयान सही नहीं है। असलियत यह है कि 270 लाख टन गेहूं खुले में पड़ा हुआ है और इसे पालीथीन की पन्नी से ढका हुआ है। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इस तरीके से गेहूं कितना सुरक्षित बचेगा। बारिश में गेहूं के सड़ने की जितनी भी रिपोर्ट मीडिया में आई हैं उनका इसी पद्धति से भंडारण किया गया था। अगर मंत्री के अनुसार पालीथीन से ढका गेहूं वैज्ञानिक पद्धति से भंडारण है तो इसका उनके पास क्या जवाब है कि शेष बचे हुए 66 लाख टन गेंहू के लिए सरकार पालीथीन का इंतजाम क्यों नहीं कर पाई है? हालात को और बिगाड़ने के लिए थॉमस ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर केंद्रीय पूल के लिए सरकारी खरीद की सीमा तय करने को लिखा है। उनके कहने का मतलब यह है कि सरकार को केवल 240 लाख टन गेहूं और चावल की खरीदारी करनी चाहिए और शेष निजी व्यापारियों के लिए छोड़ देना चाहिए। इससे खतरनाक दलील और हो ही नहीं सकती। गेहूं और चावल दो ही ऐसे खाद्यान्न हैं, जिन्हें सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदती है। सरकार 25 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है, लेकिन खरीदती है केवल दो। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद के कारण ही गेहूं और चावल का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। गेहूं और चावल की सरकारी खरीद भी तभी होती है जब निजी व्यापारी मनमाफिक खरीद कर चुके होते हैं। अगर सरकारी खरीद को आंशिक तौर पर भी कम किया जाता है तो निजी व्यापारी पूल बनाकर किसानों से कौडि़यों के भाव गेहूं-चावल खरीद लेंगे। केवी थॉमस जो सुझाव दे रहे हैं उसमें कुछ नया नहीं है। उद्योग जगत अरसे से यह मांग करता आ रहा है। यह प्रयोजन इसलिए किया जा रहा है ताकि देश की खाद्यान्न आत्मनिर्भरता को खत्म करके विदेश से सस्ता खाद्यान्न आयात किया जा सके, किंतु थॉमस इस पर ध्यान नहीं दे रहे कि नई व्यवस्था के कितने घातक परिणाम होंगे। ऐसी परिस्थितियों का निर्माण कर जिनमें किसान गेहूं-चावल उगाना बंद कर दें, सरकार किसानों की आजीविका पर चोट करने के साथ-साथ विदेशों से भारी मात्रा में खाद्यान्न मंगाने की कोशिश कर रही है। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि जब भारत खाद्यान्न का आयात करता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी कीमत आसमान छूने लगती हैं। इसका सीधा सा कारण यह है कि भारत को भारी मात्रा में खाद्यान्न की आवश्यकता पड़ती है। पेट्रोलियम पदार्थो के भारी आयात में विदेशी मुद्रा भंडार की बड़ी राशि गंवाने वाला भारत अगर खाद्यान्न भी आयात करने लगेगा तो इसकी क्या हालत होगी। ऐसा होने पर भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या और बढ़ जाएगी। खाद्यान्न के बढ़ते दाम गरीबों की ही नहीं, मध्यम वर्ग की भी कमर तोड़ देंगे। जिस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा वह यह है कि खाद्य सुरक्षा के साथ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता। गरीबों का पेट भरना राष्ट्रीय जिम्मेदारी है और अब भारी अतिरिक्त खाद्यान्न को देखते हुए इससे मुंह चुराने का हमारे पास कोई बहाना नहीं बचा है। (लेखक कृषि और खाद्य नीतियों के विश्लेषक हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे