Friday, June 1, 2012

दवा कंपनियों पर कसनी होगी नकेल


दवा कितनी जरूरी और महत्वपूर्ण है, इसे बताने की जरूरत नहीं है। विश्व स्तर पर आंकड़ों को देखें तो भारत पर बीमारियों का बोझ अन्य देशों की तुलना में कहीं ज्यादा है। उदाहरण के तौर दुनिया के कुल मधुमेह मरीजों में सबसे ज्यादा भारतीय हैं। उच्च रक्तचाप के रोगी 17 से 20 फीसद, हृदय रोगी 31.7 फीसद। कैंसर के मरीजों की संख्या तो तेजी से बढ़ रही है। लेकिन विडंबना यह है कि भारत में अभी तक कोई मुकम्मल औषधि नीति नहीं है। एक तरफ अनावश्यक दवाओं का बढ़ता प्रचलन और एंटी बॉयोटिक्स दवाओं का दुरुपयोग तो दूसरी ओर सस्ती और प्रमाणिक जेनेरिक दवाओं की अनुपलब्धता आदि ऐसे मसले हैं, जो भारत में इलाज के नाम पर चल रहे गोरखधंधे की हकीकत बयां कर रहे हैं। जाने-माने पत्रकार पी साईनाथ ने वर्ष 2004 में प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि आंध्र प्रदेश के निजामाबाद जिले में एक किसान जनरेड्डी का परिवार अपनी सारी फसल चौपट हो जाने को तो झेल गया, लेकिन इलाज के लिए उसके द्वारा लिए गए तीन लाख रुपये के कर्ज ने उसके पूरे परिवार की बलि ले ली। इस कर्ज से तंग आकर जनरेड्डी ने खुदकुशी कर ली थी। सवाल है कि दवाएं आखिर इतनी महंगी क्यों होती हैं? बताते हैं कि भारत में कोई 20 हजार छोटी-बड़ी दवा उत्पादन की इकाइयां हैं, लेकिन वास्तव में सरकार द्वारा थोक दवा बनाने के लिए 1333, नुस्खे बनाने के लिए 4534 और टीके बनाने के लिए 56 कंपनियों को ही लाइसेंस मिला है। इस तरह कुल लाइसेंस धारक कंपनियों की संख्या हुई 5923। ऐसे में जाहिर है कि जिस कंपनी को सिर्फ टीके बनाने का लाइसेंस मिला हो, वह दूसरी दवाएं भी बना रही हो। थोक दवा बनाने के लिए अधिकृत कंपनियां टीके भी बना रही हों। कुल मिलाकर यहां भी गोरखधंधा चल रहा है। वर्ष 1977 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक विशेषज्ञ समिति ने जरूरी दवाओं की सूची बनाई थी। इन दवाओं को उनके मूल नाम यानी जेनेरिक से पहचाना जाना था। वर्ष 2005 तक यह सूची बढ़कर 306 हो गई। इसके अलावा इस सूची में 405 नुस्खे भी शामिल कर लिए गए। मार्च 2011 में एक और मॉडल सूची जारी हुई, लेकिन आवश्यक, सस्ती और प्रामाणिक दवा (जेनेरिक) का संकट तो आज भी बना हुआ है। जेनेरिक दवा का मतलब होता है इंटरनेशनल नॉन प्रोप्रायटरी नेम यानी आइएनएन। यह नाम किसी भी दवा का आधिकारिक और गैर-मालिकाना नाम है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन निर्धारित करता है। ये दवाएं प्रामाणिक और सस्ती होती हैं। मुनाफे की लालच में लिप्त बड़ी दवा कंपनियां अपने एकाधिकार और ज्यादा मुनाफे वाली दवाओं की बिक्री और अपने ब्रांड के विस्तार में ज्यादा रुचि लेती है, क्योंकि इसमें मुनाफा अकूत होता है। उदाहरण के तौर पर एनीमिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली दवाओं के कुल 300 ब्रांड हैं, लेकिन इसमें एक भी वह दवा नहीं है, जो राष्ट्रीय दवा सूची में दर्ज है। जाहिर है, दवा कंपनियां नियम-कानून और जिम्मेवारी की परवाह न कर केवल अपने मुनाफे के लिए अपने गैरजरूरी ब्रांडों को ही बाजार में भर देती हैं। दवा कंपनियों के इस ब्रांड दवा कांड में हमारे चिकित्सक भाई भी सहयोग करते हैं। जेनेरिक यानी मूल दवा मिलती ही नहीं, ऐसा बहाना बनाकर चिकित्सक भी कंपनियों की ब्रांडेड दवा ही लिखते हैं, जो अपेक्षाकृत बेहद महंगी और कभी-कभी तो कम प्रभावी भी होती है। अगर कंपनियां जेनेरिक दवाओं को बनाने-बेचने में रुचि लें तो आम मरीजों को बेहद सस्ती और प्रामाणिक दवाएं मिल सकती हैं। जैसे, अब तक लीवर और किडनी के कैंसर की दवा सोराफेनिब टोसायलेट पर एक बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी बायर का एकाअधिकार था। यह कंपनी अपनी उक्त दवा 2 लाख 80 हजार 428 रुपये में बेच रही थी। लेकिन यही दवा जेनेरिक रूप में मात्र 8 हजार 800 रुपये में उपलब्ध है। अभी हाल ही में हैदराबाद की एक दवा कंपनी नैटको ने विश्व व्यापार संगठन के वैश्विक संपदा कानून की स्पेशल धारा 301 के तहत उक्त दवा को बनाने का लाइसेंस हासिल किया है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां जेनेरिक दवाओं से क्यों बचती रहती हैं। (लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित जनस्वास्थ्य वैज्ञानिक हैं)

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