हाल ही में ब्राजील के रियो दि जिनेरियो में 20 से 22 जून तक पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन को रियो प्लस 20 नाम दिया गया। सम्मेलन में सौ से ज्यादा देशों के प्रमुख एवं 50 हजार से ज्यादा प्रतिभागियों ने स्थायी विकास, ग्रीन इकोनॉमी और पर्यावरण संबंधी विभिन्न चुनौतियों पर चर्चा की। गौरतलब है कि ग्रीन इकोनॉमी के तहत पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना सभी वगरें की तरक्की वाली अर्थव्यवस्था का निर्माण करना शामिल है। सम्मेलन के घोषणा पत्र के मसौदे में भारत की ओर से उठाए गए दो प्रमुख मुद्दों को शामिल कर लिया गया। विश्व के प्रमुख नेता जिन दो प्रमुख मुद्दों पर सहमत हुए हैं उनमें एक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण है जबकि दूसरा वित्त से जुड़ा हुआ है। हालांकि सम्मेलन में भारत ने यह भी कहा कि हरित अर्थव्यवस्था के उद्देश्यों के कार्यान्वयन के लिए विकासशील देशों को बढ़े हुए साधन उपलब्ध कराने में विकसित देशों की कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति से वह निराश है और यदि यह लागू नहीं किया गया तो वह आंखों में घूल झोंकने के बराबर होगा। इस सम्मेलन में एक बार फिर विकसित देशों की हठधर्मिता दिखाई दी। विकसित देशों की इसी हठधर्मिता की वजह से पर्यावरण के विभिन्न मुद्दों पर कोई स्पष्ट नीति नहीं बन पाती है। इस दौर में पर्यावरण की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। हमें यह मानना होगा कि जलवायु परिवर्तन की यह समस्या किसी एक शहर, राज्य या देश के सुधरने से हल होने वाली नहीं है। पर्यावरण की कोई ऐसी परिधि नहीं होती है कि एक जगह प्राकृतिक संसाधनों का दोहन या प्रदूषण होने से उसका प्रभाव दूसरी जगह न पड़े। इसीलिए इस समय सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण के प्रति चिंता देखी जा रही है। हालांकि इस चिंता में खोखले आदर्शवाद से लिपटे हुए नारे भी शामिल हैं। सवाल यह है कि क्या खोखले आदर्शवाद से जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हल हो सकता है? यह सही है कि ऐसे सम्मेलनों के माध्यम से विभिन्न बिंदुओं पर सार्थक चर्चा होती है और कई बार कुछ नई बातें भी निकलकर सामने आती हैं, लेकिन यदि विकसित देश एक ही लीक पर चलते हुए केवल अपने स्वाथरें को तरजीह देने लगें तो जलवायु परिवर्तन पर उनकी बड़ी-बड़ी बातें बेमानी लगने लगती हैं। यदि ग्रीन हाउस गैसों की वृद्धि इसी तरह जारी रही तो दुनिया को लू, सूखे, बाढ़ व तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पडे़गा। तटीय इलाकों पर अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा और अनेक पारिस्थितिक तंत्र, जंतु एवं वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी। वातावरण में कॉर्बन इाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से समुद्र के अम्लीकरण की प्रक्रिया लगातार बढ़ती चली जाएगी, जिससे खोल या कवच का निर्माण करने वाले प्रवाल या मूंगा जैसे समुद्रीय जीवों और इन पर निर्भर रहने वाले अन्य जीवों पर नकारात्मक प्रभाव पडे़गा। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि इस खतरे को कम करने के लिए 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से कम से कम आधे पर लाना होगा। ज्यादातर विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के प्रति सफलतापूर्वक अनुकूलन के लिए आर्थिक एवं प्रोद्यौगिकीय श्चोतों का अभाव है। विकसित देशों की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की 22 फीसदी है, जबकि वे 88 फीसदी प्राकृतिक संसाधनों एवं 73 फीसदी ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही विश्र्व की 85 फीसदी आय पर उनका नियंत्रण है। दूसरी ओर विकासशील देशों की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की 78 फीसदी है, जबकि वे 12 फीसदी प्राकृतिक संसाधनों एवं 27 फीसदी ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं। उनकी आय विश्व की आय की सिर्फ 15 फीसदी ही है। इन सभी आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि विकसित देश कम जनसंख्या होने के बावजूद प्राकृतिक संसाधनों का अधिक इस्तेमाल कर अधिक प्रदूषण फैला रहे हैं। इसलिए उत्सर्जन कम करने की जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) पृथ्वी सम्मेलन में हुए चिंतन पर रोहित कौशिक की टिप्पणी
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Saturday, June 30, 2012
नेतृत्व का अभूतपूर्व संकट
भारत में खराब खबरों की बरसात सी हो रही है। अर्थव्यवस्था संकट में है, राजनीतिक निष्कि्रयता टूटने का नाम नहीं ले रही और सरकार में लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है। राष्ट्र चौराहे पर खड़ा है और इसके नेता कुंभकर्णी नींद में सोए हुए हैं। प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी व राहुल सहित कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जनता से कटा हुआ है। वे फैसलों पर चर्चा नहीं करते, देश के लोगों से सीधे बात नहीं करते और उनका इस बात में यकीन ही नहीं है कि देश के आम लोगों से सीधे जुड़ने की जरूरत भी है। प्रधानमंत्री अपनी नीतियों के समर्थन में जनमत तैयार करने के इच्छुक नहीं हैं। इसीलिए देश के अधिकांश नागरिकों को महसूस होने लगा है कि नई दिल्ली में कोई सरकार काम नहीं कर रही है। भारत के आर्थिक संक्रमण के इस नाजुक मोड़ पर यह घटनाक्रम एक वास्तविक त्रासदी है। यह समय तो भारत का होना चाहिए था। पाश्चात्य विश्व अभूतपूर्व आर्थिक संकट से जूझ रहा है। यूरोजोन के संकट ने अधिकांश यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के विकास पर ग्रहण लगा दिया है और यह स्थिति लंबे समय तक जारी रहेगी। अमेरिका भी आर्थिक संकट से निकलने में कठिनाई महसूस कर रहा है। वाशिंगटन में राजनीतिक गतिरोध और नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव ने सरकार को कड़े फैसले लेने से रोक रखा है। परिणामस्वरूप, वैश्विक नेतृत्व में निर्वात पैदा हो गया है। चीन में भी राजनीतिक संक्रमण चल रहा है। जैसे-जैसे नेतृत्व परिवर्तन का वक्त नजदीक आ रहा है, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अधिकाधिक सतर्क होती जा रही है। इससे भी महत्वपूर्ण यह तथ्य है कि चीन का आर्थिक विकास भी कमजोर पड़ रहा है। इन परिस्थितियों में भारत के लिए आगे बढ़कर विश्व का नेतृत्व करने का सुनहरा मौका था, किंतु भारत की कहानी तो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई। रुपये का प्रदर्शन एशिया में सबसे खराब चल रहा है, घाटा बढ़ रहा है, नीति अनिश्चितता के कारण निवेशक भारत में निवेश करने से कतरा रहे हैं और आम आदमी आसमान छूती महंगाई के बोझ तले कराह रहा है। सरकार फैसले नहीं ले पा रही है। सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगियों और विपक्ष ने यह कमजोरी भांप ली है और यह सुनिश्चित करने में जुट गए हैं कि अगले दो सालों तक यह सरकार निरीह-लाचार बनी रहे। बाहरी विश्व के लिए, खासतौर पर भारत के दोस्तों और सहयोगियों के लिए यह निराशाजनक समय है। भारत में सामरिक साझेदारी में उल्लेखनीय निवेश करने वाला अमेरिका अब अपने संबंधों को अतीत के गौरव के अनुरूप लाने में संघर्ष कर रहा है। पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत के जो सहयोगी यह उम्मीद लगा बैठे थे कि भारत चीन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संतुलनकर्ता के रूप में उभरेगा, अब कहीं और देख रहे हैं। अफगानिस्तान में भारत के मित्र इस डर से अपनी वफादारी बदल रहे हैं कि 2014 में नाटो सेनाओं की वापसी के बाद वहां पाकिस्तान का प्रभुत्व हो जाएगा। इस घटाटोप अंधियारे में उम्मीद की एकमात्र किरण यह है कि घरेलू उथलपुथल के कारण चीन और पाकिस्तान भारत के हालात का फायदा उठाने की स्थिति में नहीं हैं। इतना सब होने के बावजूद भारत का राजनीतिक तंत्र ऐसे बर्ताव कर रहा है जैसे यहां कुछ भी गलत नहीं है। भारत नेतृत्व के संकट का सामना कर रहा है। सोनिया गांधी के पास शक्तियां हैं, लेकिन कोई सरकारी जवाबदेही नहीं है, मनमोहन सिंह के पास जिम्मेदारी है, किंतु कोई शक्ति नहीं है। जिस पार्टी को 2009 में लगभग निर्णायक जनादेश मिला हो उसकी यह गत समझ से परे है। आर्थिक रूप से कांग्रेस ने सरकार को दूसरी पीढ़ी के सुधारों पर आगे बढ़ने से रोक दिया है। सामाजिक रूप से भ्रष्टाचार अब बर्दाश्त से बाहर हो गया है। शासन के तमाम प्रमुख संस्थानों को अपनी साख बचानी मुश्किल हो रही है। राजनीतिक रूप से सत्तारूढ़ दल ने 2009 में कमाई अपनी सारी पूंजी गंवा दी है। सरकार के विभागों में कोई सामंजस्य नहीं है। लगता है कि वे राष्ट्रीय हितों के बजाय केवल विभागीय हितों के लिए काम कर रहे हैं। समसामयिक भारत का राजनीतिक परिदृश्य प्रभावी कार्यपालिका और कल्पनाशील नेतृत्व, दोनों से वंचित है। अपनी पवित्र नीयत के बावजूद प्रधानमंत्री देश के प्रबंधन में पूरी तरह विफल रहे हैं और न ही उनके पास देश के भविष्य की दृष्टि ही है। हालांकि इसमें उनका दोष नहीं है। पिछले चुनाव में उन्होंने राजनीतिक पूंजी नहीं कमाई। कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी के सिर चुनाव में जीत का सेहरा बंधा, किंतु बेहद कठिन परिस्थितियों में भी कांग्रेस की नैया पार लगाने वाली सोनिया गांधी भी इस पूंजी का लाभ नहीं उठा पाईं। सोनिया कांग्रेस को वह दृष्टि नहीं दे पाईं जो इस नाजुक दौर में भारत का कुशल नेतृत्व कर सके। खेद की बात यह है कि भारतीयों के पास विकल्प भी नहीं हैं। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा भी नेतृत्व के संकट से जूझ रही है। लोकप्रियता हासिल करने के बाद अनेक मुख्यमंत्री प्रदेश को अपनी जागीर समझने लगते हैं। क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों से भी गया-गुजरा है। दरअसल, आज की पूरी राजनीतिक जमात ही देश की समस्याओं का प्रभावी प्रबंधन करने में अक्षम है। भारत में राजनीतिक प्रतिभा का लोप इस बात से सिद्ध हो जाता है कि देश के बड़े राजनेताओं को उनकी वंश परंपरा से जाना जाता है, जैसे गांधी, सिंधिया, पायलट, यादव आदि। इसके अलावा नरेंद्र मोदी, ठाकरे, मुलायम सिंह, मायावती जैसे राजनेता भी मौजूद हैं, जो भय और चिंताओं से खेलते हैं। कोई हैरानी नहीं कि भारत अपने आदर्शो के लिए फिल्म उद्योग और क्रिकेट खिलाडि़यों की ओर देखता है। आज भारत को ऐसे नेताओं की सख्त आवश्यकता है जो भारत के उ”वल भविष्य का विचार और दृष्टि रखते हों और साथ ही उनमें इन्हें कार्यान्वित करने की क्षमता भी हो। नि:संदेह दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने की तरफ बढ़ रहा भारत ऐसे नेता पैदा कर सकता है जो बड़े सपने देखते हों और उन्हें पूरा करने का दम भी रखते हों। हालांकि, अंतिम जिम्मेदारी आम भारतीयों के ऊपर ही आती है, क्योंकि देश को वैसे ही नेता मिलते हैं जैसा पाने का वह हकदार है। देश के आज के हालात पर इकबाल याद आते हैं-वतन की फिक्र कर नादान, मुसीबत आने वाली है, तेरी बर्बादियों के मशविरे हैं आसमानों में, ना समझोगे तो मिट जाओगे हिंदुस्तान वालो, तेरी दास्तान तक ना रहेगी दास्तानों में। (लेखक किंग्स कॉलेज, लंदन में प्रोफेसर हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
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