सत्यमेव जयते कार्यक्रम के माध्यम से आमिर खान ने एक और ज्वलंत मुद्दे पर बहस छेड़ दी है। जी हां, जिसे हम धरती का भगवान मानते हैं, वही चिकित्सकक आज हमें लूट रहा है। वह एक मोहरा बन गया है दवा कंपनियों का। इसलिए वह विशेष कंपनी की दवा लिखता है, जिससे रोगी का स्वास्थ्य ठीक हो या न हो, पर उसकी सेहत जरूर ठीक हो जाती है। दवा कंपनियों से विभिन्न रूपों में उपहार लेकर डॉक्टरों ने अपनी सेहत बुरी तरह से बिगाड़ ली है। उनका लालच इस रूप में समाज के सामने आया है, जिससे धरती के इस भगवान को लुटेरा कहने में भी अब संकोच नहीं होता। बिना बात के विभिन्न जांच, ऑपरेशन आदि कर वे गरीबों को लूटते रहते हैं। इस समय उन्हें वह शपथ भी याद नहीं होती, जिसे वे डॉक्टर बनने के पहले लेते हैं। ऐसा भी नहीं है कि सभी डॉक्टर इस तरह की लूट-खसोट में शामिल हैं, बल्कि कई चिकित्सक तो गरीब मरीजों का इलाज अपने पैसे से करते हैं। वास्तव में धरती के सही भगवान की भूमिका वही निभा रहे हैं। धरती के इस भगवान को देशवासियों का सलाम, लेकिन गरीबों को लूटने वाले चिकित्सकों का क्या करें? अपने धारावाहिक के माध्यम से आमिर खान ने एक मुद्दा उठाया है, जो यह सोचने पर विवश करता है कि क्या ऐसे डॉक्टरों को सजा नहीं हो सकती? क्या इनका लाइसेंस हमेशा हमेशा के लिए रद नहीं हो सकता? क्या वास्तव में सरकार इन्हें संरक्षण दे रही है? विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेषज्ञ लोगों को अच्छे स्वास्थ्य के लिए तमाम सुझाव देते हैं, लेकिन किसी ने उन डॉक्टरों की तरफ ध्यान नहीं दिया, जो दवा कंपनियों के उपहार ले-लेकर गंभीर रूप से बीमार पड़ रहे हैं। डॉक्टरों में यह बीमारी बढ़ती ही जा रही है। इस बीमारी को बढ़ाने में दवा कंपनियों की वे प्रयोगवादी दवाओं का विशेष रूप से हाथ है, जो वे मरीजों को लेने के लिए सलाह देते हैं। दवा कंपनियां उन्हें बतौर उपहार सपरिवार विदेश भी भेजती हैं। कई बार तो बच्चे के जन्मदिन पर होने वाली पार्टी का खर्चा भी उठाती है। पत्नी के लिए हीरों का हार भी यही दवा कंपनियां देती हैं। इसके बदले में डॉक्टर उन दवाओं का प्रचार-प्रसार करते हैं, जिसे ये कंपनियां बतौर प्रयोग हमारे देश में भेजती हैं। इससे दवाओं से होने वाले हानिकारक कारणों का पता चल जाता है और डॉक्टर का कर्तव्य भी पूरा हो जाता है। वास्तव में आज इन बीमार डॉक्टरों के इलाज की आवश्यकता है, जो उपहारों से लदकर अपने कर्तव्य को भूलने लगे हैं। डॉक्टर के इस अपराध को उनका परिवार ही नहीं, बल्कि वह समाज भी भुगत रहा है, जिसे लोग ईश्वर के बाद का ईश्वर मानते हैं। कैसा हो गया है पृथ्वी का भगवान! आज के ये भगवान बिक गए हैं दवा कंपनियों के हाथों। इसीलिए कुछ मरीज इस दिशा में जागरूक हुए हैं। डॉक्टरों के खिलाफ अब शिकायतें बढ़ने लगी हैं। दवा कंपनियों से डॉक्टर जो लाभ प्राप्त करते हैं, बदले में वे उक्त कंपनियों की दवा मरीजों को खरीदने के लिए कहते हैं। इसके बाद अगर मरीज को किसी प्रकार की परेशानी होती है तो उसका जवाबदार कौन होगा? आज यही स्थिति हर किसी को सोचने के लिए बाध्य कर रही है। मेडिकल काउंसिल की स्वीकारोक्ति मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआइ) ने स्वीकार किया है कि विदेशी दवा कंपनियां अपनी दवाएं बेचने के लिए चिकित्सकों को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। वह इन्हें लुभावने उपहार देती हैं, ताकि वे उनकी दवा बेचने का सशक्त माध्यम बन जाएं। निश्चित रूप से इन कंपनियों की दवाओं में हानिकारक तत्व अधिक होते हैं। इसलिए डॉक्टरों के माध्यम से वे हकीकत को छिपाते रहते हैं। इससे नुकसान तो मरीजों का ही होता है। डॉक्टरों द्वारा विभिन्न दवा कंपनियों से प्राप्त उपहारों के बारे में एमसीआइ को 2008 में 500 और 2009 में 600 शिकायतें मिली थीं। वर्ष 2010 में ये शिकायतें बढ़कर 904 हो गई। इसके पहले ये दवा कंपनियां डॉक्टरों को पेपरवेट या फिर स्टेथस्कोप जैसी उपयोगी चीजें दिया करती थीं, लेकिन अब तो डॉक्टरों को सपरिवार विदेश के दौरे पर भी ले जा रहीं हैं। कई बार मेडिकल कांफ्रेंस के नाम पर चिकित्सकों को विदेश भेजा जाता है। इस तरह से एक डॉक्टर पर यदि दो लाख रुपये खर्च भी होते हैं तो उसके बदले में दवा कंपनियां यह चाहती हैं कि डॉक्टर उक्त कंपनियों की दवाएं लिखकर दवा कंपनियों को उपकृत करें। लेकिन अब मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया इस दिशा में सख्त हो गई है। कुछ ही समय बाद डॉक्टरों द्वारा दवा कंपनियों से लिए जाने वाले उपहारों पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रही है। वैसे कई प्रतिबंध तो अब भी हैं, पर अपनी तिकड़मों डॉक्टर अपना उल्लू सीधा कर ही लेते हैं। डॉक्टरों द्वारा इस तरह से दवा कंपनियों से लिए जाने वाले उपहारों को देखते हुए इंडियन मेडिकल काउंसिल (प्रोफेशनल कंडक्ट, एटीकेट एंड एथिक्स) एमेंडमेंट रेग्युलेशन 2009 लागू किया गया। इसके अनुसार अब डॉक्टर दवा कंपनियों से एक हजार रुपये से अधिक की कीमत का कोई भी उपहार स्वीकार नहीं कर पाएंगे। आश्चर्य की बात यह है कि जब यह नियम लागू हुआ, उसके बाद काउंसिल ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) के अध्यक्ष और महामंत्री को छह महीने के लिए सस्पेंड कर दिया। आखिर उन्हें सस्पेंड क्यों किया गया, यह तो और भी हंसी की बात है। इन दोनों महानुभावों ने पेप्सिको के ट्रोपिका फ्रूट जूस और क्वेकर ओटस के लिए आइएमए का लोगो इस्तेमाल करने की अनुमति दी, जिसका लाभ उठाते हुए कंपनी ने अपनी टीवी के एक विज्ञापन में ऐसा झूठा दावा किया कि स्वयं आइएमए भी बच्चों की तंदुरुस्ती के लिए हमारे प्रोडक्ट के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। नए नियम के अनुसार चिकित्सक खुलेआम किसी भी दवा का प्रचार नहीं कर सकता और न ही बिना सोचे-समझे अपने परचे में किसी खास कंपनी की दवा लेने की सलाह दे सकता है। इसमें समझने वाली बात यह है कि डॉक्टर ने मरीज के किस रोग के लिए कौन-सी दवा लिखी है, यह मरीज किस तरह से समझेगा? दूसरी बात यह है कि डॉक्टर ने किस कंपनी से उपहार लिया है और वह किस कंपनी की दवाएं लेने की सलाह दे रहा है, इसकी जानकारी भी न तो काउंसिल और न ही मरीज को हो पाती है। मान लीजिए, डॉक्टर की शादी की सालगिरह पर कंपनी ने डॉक्टर दंपती को एक हीरा जडि़त अंगूठी या फिर आलीशान कार भेंट में दी तो क्या डॉक्टर यह बात सबको बताएगा कि अमूक चीज उसे किसी दवा कंपनी ने दी है। दोषियों को सिर्फ चेतावनी अभी यह हालत है कि अगर यह सिद्ध भी हो जाए कि डॉक्टर ने किसी दवा कंपनी से एक हजार रुपये से अधिक का उपहार स्वीकार किया है तो उसे एक चेतावनी ही दी जाती है। बस इसके अलावा और किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की जाती। हां, अगर यह सिद्ध हो जाए कि डॉक्टर ने दवा कंपनी से 5 हजार रुपये से अधिक का उपहार स्वीकार किया है तो उसे मेडिकल रजिस्टर से एक निश्चित समय तक सस्पेंड किया जाता है। वैसे भी काउंसिल की स्थिति यह है कि किसी भी बड़े डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई करने में उसके पसीने छूट जाते हैं। ऐसा इसलिए है कि संभव है दवा कंपनियों की चाल में कभी काउंसिल का ही कोई सदस्य फंस जाए तो। वर्ष 2010 में केवल 13 डॉक्टरों को हल्की सजा दी गई थी। उसके पहले तो केवल छह डॉक्टरों को ही मामूली सजा हुई थी। डॉक्टरों द्वारा उपहार लेने और न लेने के संबंध में काउंसिल के ही एक सदस्य ने कहा कि वास्तव में काउंसिल के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि वह डॉक्टरों को किसी तरह की सजा दे। वैसे भी आज भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। अन्ना हजारे ने जिस तरह राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को निशाना बनाया है, ठीक उसी तरह अगर पृथ्वी के इस भगवान के खिलाफ भी कुछ ऐसा हो, जिससे वे अपने पवित्र पेशे को कलंकित न करें। ऐसे डॉक्टरों को जो भी सजा दी जाए, वह सरेआम दी जाए, ताकि दूसरे डॉक्टर उससे सबक लें। वैसे डॉक्टरों के घर के सदस्यों को भी इस दिशा में सोचना होगा कि डॉक्टरों द्वारा दवा कंपनियों से उपहार लेकर मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाले का साथ देकर वे समाज में किस तरह का आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं! (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
No comments:
Post a Comment