यह अगर शुद्ध संयोग भी है, तब भी इसकी विडंबना अनदेखी नहीं रहेगी। जिस दिन सत्ताधारी यूपीए की ओर से वर्तमान वित्त मंत्री, प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया गया, उससे एक दिन पहले ही आर्थिक मोच्रे से एक और बुरी खबर आ चुकी थी। मई में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति का आंकड़ा, पिछले महीने के 7.23 फीसद से बढ़कर 7.55 फीसद पर पहुंच गया, जो जनवरी के बाद की सबसे ऊंची दर है। याद रहे कि आम मुद्रास्फीति दर में यह बढ़ोतरी सबसे बढ़कर, खाद्य मुद्रास्फीति की दो अंकों की दर से संचालित थी। खाद्य मुद्रास्फीति का आंकड़ा इन्हीं दो महीनों के बीच, 10.49 फीसद से और बढ़कर 10.74 फीसद पर पहुंच गया। बहरहाल, इसके निहिताथरे की चर्चा हम जरा बाद में करेंगे। दुर्भाग्य से प्रणब दा के इतने बड़े प्रमोशन के लिए, इससे खराब समय दूसरा शायद ही हो सकता था। अर्थव्यवस्था के सामने आज चौतरफा संकट है और मुद्रास्फीति, इस संकट का एक हिस्सा भर है। सकल घरेलू उत्पादन की वृद्धि दर घटकर 6.5 फीसद पर आ गई है, जो कि पिछले नौ साल की सबसे नीची दर है। 2012 की जनवरी-मार्च की तिमाही में तो यह दर 5.5 फीसद ही रही थी। औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर तो अप्रैल के महीने में गिरकर 0.1 फीसद पर आ ही चुकी थी। पिछले कुछ ही महीनों में रुपए की विनिमय दर में भी उल्लेखनीय गिरावट आई है और यह रिजर्व बैंक के मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के बावजूद थमी नहीं है। पश्चिमी दुनिया में मंदी के हालात से लेकर रुपए के अवमूल्यन तक, तमाम कारणों ने निर्यात के मोच्रे पर भी हालात चिंताजनक बना दिए हैं और व्यापार घाटा बढ़ता ही जा रहा है। इसी सबके बीच, विदेशी प्रत्यक्ष पूंजी निवेशों के प्रवाह की दिशा भी पलट गई है। बड़े पैमाने पर पूंजी पलायन की आशंकाओं के बीच, भारतीय शेयर बाजार अनिश्चितता से लबरेज हैं। यह दूसरी बात है कि चलताऊ टिप्पणीकारों ने प्रणब दा के प्रमोशन के इस मौके पर भी अपने लिए उम्मीद का कोना खोज लिया है। कहा जा रहा है कि प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति भवन पहुंच जाने के बाद, शायद कुछ समय तक प्रधानमंत्री खुद ही वित्त मंत्रालय संभालेंगे। उम्मीद जताई जा रही है कि मनमोहन सिंह एक बार फिर वित्त मंत्री के रूप में अपनी पहली पारी की ही तरह देश को आर्थिक संकट के जबड़ों में से निकाल कर फिर से ऊंची वृद्धि दर की पटरी पर ले आएंगे। और ऐसा वे अपने शुरू कराए गए उन कथित सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाकर करेंगे, जिन्हें ताबड़-तोड़ आगे बढ़ाने में ‘गतिरोध’
की शिकायत, कारपोरेट जगत पिछले काफी अर्से से करता रहा है। याद रहे कि इसी दबाव को आगे बढ़ाते हुए अंतरराष्ट्रीय साख एजेंसी स्टैंर्डड एंड पुअर्स ने पिछले दिनों यह धमकी दी थी कि अगर भारत आर्थिक गतिरोध को नहीं तोड़ता है, तो उसकी ऋण रेटिंग निवेश योग्य के दज्रे से नीचे धकेल दी जाएगी! एक और ऋण रेटिंग एजेंसी फिच ने भी इस हफ्ते ऋण के मामले में भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश की प्रत्याशा, स्थिर से घटाकर नकारात्मक कर दी। इसके साथ ही इस एजेंसी के निदेशक ने तथाकथित आर्थिक सुधार की मांग पेश कर दी। इतना ही नहीं, उसने यह रास्ता भी सुझाया कि चूंकि 2014 के शुरू के हिस्से में अगले आम चुनाव होने हैं, अत: अभी सरकार के पास इसका मौका है कि फटाफट इस मोच्रे पर कुछ कर दिखाए!
फिर भी आर्थिक सुधार के इस दबाव का लगभग एक संप्रभु देश की अंदरूनी राजनीतिक मामलों में दखलंदाजी के दिलचस्प किंतु खतरनाक संकेत की हद तक पहुंचाना, स्टैंर्डड एंड पुअर्स के ही हिस्से में रहा। इस ऋण साख एजेंसी ने बाकायदा राजनीतिक स्वर अपनाते हुए यह भी रेखांकित करना जरूरी समझा था कि अगर भारत की ऋण साख घटाने की नौबत आई तो भारत, ऋण रेटिंग घटकर ‘निवेश योग्य से नीचे’ खिसक जाने वाला, ब्रिक्स का पहला देश बन जाएगा और इसके लिए देश में राजनीतिक सत्ता के दो अलग-अलग केंद्रों की मौजूदगी जिम्मेदार होगी। साफ है कि उक्त एजेंसी इस मामले में लगभग वही भाषा बोल रही थी, जो देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बोलती रही है। अचरज नहीं कि वित्त मंत्री की हैसियत से प्रणब मुखर्जी ने इस ऋण साख एजेंसी के निर्णय और निष्कर्ष दोनों को ही हाथ के हाथ खारिज कर दिया। यह भी स्वाभाविक था कि सरकार की ओर से इस सिलसिले में यह भी ध्यान दिलाया गया कि इसी एजेंसी ने पिछले साल अमेरिका की ऋण साख भी घटा दी थी। लेकिन, उसके बाद के घटनाक्रम ने अमेरिकी डालर की तो मजबूती का ही सबूत दिया है। बहरहाल, इस रेटिंग के खारिज किए जाने की रस्मअदायगी अपनी जगह है पर मौजूदा सरकार पर यह दबाव बखूबी काम कर रहा है। इस सचाई का कुछ अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति चुनाव के सिलसिले में प्रणब मुखर्जी के नाम का विरोध करने के लिए ममता बनर्जी की सार्वजनिक रूप से लानत-मलामत करने के फौरन बाद, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने यह एलान करना भी जरूरी समझा कि अब सरकार जल्द ही खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देने से लेकर, बैंक व बीमा में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने तथा पेंशन फंडों में विदेशी निवेश के दरवाजे खोलने तक के सारे कदम उठाएगी। यही वे कदम हैं जो यूपीए-प्रथम के जमाने में वामपंथ के विरोध ने रोके रखे थे और यूपीएद्विती य के राज में ममता बनर्जी के दबाव से रुके हुए थे। यानी विरोध का सारा दिखावा अपनी जगह, यूपीए-द्वितीय की सरकार जहां तक उससे बन पड़ेगा, अगले करीब साल भर तक इसी रास्ते पर बढ़ने की कोशिश करती नजर आएगी। जिस रास्ते पर चलने से यह संकट पैदा हुआ है, उसी पर और आगे बढ़ना, आर्थिक मंदी के बढ़ते सायों से मुक्ति कैसे दिला सकता है? सचाई यह है कि यह संकट, विदेशी बाजारों तथा अंतरराष्ट्रीय वित्त पर बढ़ती निर्भरता के रास्ते, आयातित संकट है। लेकिन, इसके साथ ही यह संकट, खुद अपनी अर्थव्यवस्था में घरेलू मांग को नीचे से नीचे धकेले जाने के जरिए, अपने बल पर विकास के मौके कम से कम किए जाने का संकट भी है। कथित आर्थिक सुधार की नवउदारवादी नीतियां अगर घरेलू रोजगार तथा आम जनता के हाथों में क्रय शक्ति घटाने का काम कर रही हैं, तो मुद्रास्फीति की ऊंची दर प्रत्यक्ष रूप से मेहनत-मजदूरी कर रोटी खाने वालों के हाथों से छीनकर क्रय शक्ति का संपन्न वर्ग के पक्ष में पुनर्वितरण कर रही है। इस पुनर्वितरण के चलते और भी तेजी से घटती प्रभावी घरेलू मांग ही, वृद्धि दर के बैठते जाने का सबसे बड़ा कारण है। आखिरकार, पूंजीवादी व्यवस्था में वही चीज और उसी हद तक बनाई जाती है, जिसकी तथा जितनी मांग हो। इसके बावजूद, इस संकट से निपटने के लिए उद्यमियों को और मौजूदा सरकार को भी, इसके सिवा दूसरा रास्ता नहीं सूझता है कि सस्ती पूंजी समेत बढ़ती रियायतों के जरिए, निवेशकर्ताओं के लिए मुनाफे के मौके और बढ़ाए जाएं। बढ़ती आम मुद्रास्फीति और खासतौर पर दस अंकों से ऊपर की खाद्य मुद्रास्फीति की दर के संदर्भ में, रिजर्व बैंक की प्राइम ऋण दरों में कटौती न करने के ताजा फैसले पर, उद्योग व व्यापार संगठनों ही नहीं, खुद सरकार के वाणिज्य मंत्री के भी भारी निराशा जताने का ठीक यही संकेत है। लेकिन, दवा के नाम पर जहर का नुस्खा देने वालों से भला किस रोग के उपचार की उम्मीद की जा सकती है?
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