आज जब राष्ट्र अपने 14वें राष्ट्रपति को चुनने की प्रक्रिया में व्यस्त है उस समय अंतरराष्ट्रीय वित्त जगत में भारत की छवि 1991 के बाद सबसे धूमिल है। महंगाई बेलगाम है और भ्रष्टाचार के कारण लोगों का तंत्र में विश्वास समाप्त होता जा रहा है। यह कैसा लोकतंत्र है, जिसमें लोक की तंत्र में आस्था नहीं हो और यह विडंबना तब है जब देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं और वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी एक अनुभवी प्रशासक होने के साथ-साथ सरकार के मुख्य संकटमोचक रहे हैं। वास्तव में इस आर्थिक संकट की जड़ में संप्रग द्वारा लोकतंत्र के साथ किया गया एक नया प्रयोग है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार जिस व्यक्ति के पास प्रधानमंत्री का पद है उसके पास सत्ता नहीं है और जिसके पास सत्ता की चाबी है उसके ऊपर राष्ट्र के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। जनता से कर के माध्यम से सरकार के लिए धन जुटाने का भार प्रधानमंत्री और उनके वित्तमंत्री के ऊपर है, किंतु वह धन किन मदों में और कैसे खर्च होगा, उसका अंतिम निर्णय संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके द्वारा नियुक्त राष्ट्रीय सलाहकार परिषद करती है। यह विरोधाभास ही अर्थव्यवस्था को निरंतर खोखला कर रहा है जिसका खामियाजा आज आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है। इस सरकार के कार्यकाल में न केवल आर्थिक क्षेत्र, बल्कि नीतिगत मामलों के हर मोर्चे पर सरकारी नाकामी की छाप दिखती है। अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भारत की साख तेजी से गिरती जा रही है। वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स और मोर्गन स्टेनली द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था की जिस तरह ऋणात्मक रेटिंग की गई है वह हमारे लिए खतरे की घंटी है। देश के दो नामी उद्योगपतियों ने हाल में नीतिगत मामलों में सरकार की अपंगता को लेकर जो टिप्पणी की है वह संप्रग के नीतिकारों के लिए चुनौती से कम नहीं है। इंफोसिस के सहसंस्थापक एनआर नारायणमूर्ति और विप्रो के अध्यक्ष अजीम प्रेमजी ने कहा है कि पिछले कुछ समय में भारत की छवि प्रभावित हुई लगती है। एक भारतीय के रूप में हम दुखी हैं कि हम इस हालत में आ गए हैं। हम देश के अंदर बिना किसी नेतृत्व के ही काम कर रहे हैं। अगर हम बदले नहीं तो सालों पीछे चले जाएंगे। मोर्गन स्टेनली को दिए साक्षात्कार में नारायणमूर्ति ने यह भी कहा है कि भारत के सामने आई चुनौतियां उसने खुद पैदा की हैं। संप्रग सरकार की पहचान बन चुकी नीतिगत अपंगता कोई बाहरी कारणों से नहीं आई है। वास्तविकता यह है कि पिछले कुछ सालों से देश नेतृत्वहीनता और निर्णयहीनता का शिकार है। देश के अन्य नामी उद्योगपतियों-जमशेद गोदरेज, केशव महिंद्रा, बैंकर दीपक पारिख आदि ने दो बार प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर भारत में व्याप्त लालफीताशाही और भ्रष्ट नौकरशाही पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री से सुस्ती तोड़ने की अपील की थी। किंतु क्या हुआ? हमारे चारों ओर अराजकता का माहौल है। बेकाबू महंगाई, अवरुद्ध विकास दर, उत्पादकता में Oास, निर्यात में मंदी और आयात में वृद्धि-संप्रग सरकार का पिछले आठ साल का यही लेखाजोखा है। विदेशों में जमा काले धन की वापसी और एक सशक्त जनलोकपाल के लिए जब देश में व्यापक जनज्वार खड़ा हुआ और रामदेव और गांधीवादी नेता अन्ना हजारे आम जन की आवाज बन दिल्ली आ धमके तो सकते में आई संप्रग सरकार को प्रणब दा ने ही भंवर से बचाया था। तब देश से वायदा किया गया था कि सरकार एक मजबूत लोकपाल कानून बनाएगी और विदेशों में जमा धन वापस लाया जाएगा। दोनों ही वादे अधूरे हैं। रामदेव और अन्ना हजारे ने फिर से आंदोलन करने की हुंकार भर दी है, ऐसे में प्रणब मुखर्जी के रायसीना हिल्स स्थानांतरित होने पर संप्रग सरकार की क्या स्थिति होगी, सहज समझा जा सकता है। लोकपाल को लेकर तकरार कायम है। काले धन के संदर्भ में सरकार एक श्वेत पत्र लेकर सामने आई, जो आंखों में धूल झोंकने का प्रयास मात्र है। संसद में प्रस्तुत श्वेत पत्र में सरकार ने कहा है कि स्विस बैंकों में भारतीय नागरिकों के धन में सन 2006 से कमी आई है। सरकार के अनुसार 2006 से 2010 के दौरान 14,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमी आई। बैंकों की भारतीयों के प्रति देनदारी 2006 में 23,373 करोड़ रुपये थी, जो 2010 में घटकर 9,295 करोड़ रह गई। सरकार का यह सफेद झूठ अब स्वयं स्विट्जरलैंड के हाल के एक खुलासे से सामने आ गया है। स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) ने स्विस बैंकों पर हाल में प्रकाशित सालाना हैंडबुक में यह खुलासा किया है कि भारतीयों और संस्थाओं ने सीधे 2.025 अरब स्विस फ्रेंक स्विस बैंकों में जमा करा रखे हैं, जबकि उनके 15.8 करोड़ स्विस फ्रेंक वेल्थ मैनेजरों के जरिये रखे गए हैं। एसएनबी के अनुसार स्विस बैंकों में रखा भारतीयों का धन 2011 के अंत में 2.18 अरब स्विस फ्रेंक अर्थात करीब 12,740 करोड़ रुपये था। बैंक के अनुसार पिछले पांच साल में यह पहला मौका है, जब भारतीयों के जमा धन में वृद्धि हुई है। इससे पूर्व 2006 में करीब एक अरब स्विस फ्रेंक की वृद्धि हुई थी और उस वक्त यह राशि 6.5 अरब स्विस फ्रेंक (करीब 40,000 करोड़ रुपये) थी, लेकिन 2010 में यह घटकर एक तिहाई रह गई। 2011 में इसमें करीब 3,500 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा प्रस्तुत उपरोक्त श्वेत पत्र झूठ का पुलिंदा है। सरकार काले धन की वापसी को लेकर न तो गंभीर है और न ही वह उन कर चोरों के चेहरे उजागर करना चाहती है, जिनके नाम जर्मनी सरकार द्वारा भेजे गए हैं। क्यों? 14 केंद्रीय मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर मामले हैं। गृहमंत्री पी. चिदंबरम पर 2जी घोटाले से लेकर चुनाव में धांधली कर चुनाव जीतने का आरोप है। कोयला आवंटन में मची लूट के बाद प्रधानमंत्री की राजनीतिक ईमानदारी पर सवालिया निशान लगना स्वाभाविक है। इस घोटाले में जहां सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय पर प्रश्न खड़ा हुआ है, वहीं विभिन्न मंत्रालयों से जुड़े एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामलों में प्रधानमंत्री की खामोशी वस्तुत: उनकी लाचारी का द्योतक होने के साथ इस का भी प्रमाण है कि उनके पास पद भले हो, शक्तियां कहीं और केंद्रित हैं। आज भारतीय प्रतिभा अपने देश की बदहाली से कुंठित हो रही है, निवेशक दूसरे देशों में निवेश की संभावनाएं तलाश रहे हैं। देश की पूंजी, युवा शक्ति बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से हताश है। जब तक देश के शासनतंत्र में प्रधानमंत्री के पद और वास्तविक सत्ता में मौजूद विरोधाभास समाप्त नहीं हो जाता तब तक अर्थव्यवस्था में सुधार की उम्मीद निरर्थक है। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
No comments:
Post a Comment