कालेधन पर ेतपत्र लाकर कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह कालेधन की रोकथाम और वसूली के लिए गंभीर हैं। इसीलिए इस पत्र में कालेधन पर काबू पाने के लिए सुझावों और उपायों की भरमार है। पर इस ेत पत्र की विडंबना यह है कि कालेधन के आकार और विदेश में भारतीयों का कितना काला धन जमा है, इसकी कोई पुख्ता जानकारी इसमें नहीं है। सरकार के पास विदेश में कालेधन के खातेदारों की दो सूचियां हैं, लेकिन उनके नामों को पर्दे में ही रखना सरकार ने ज्यादा मुनासिब समझा। इसीलिए केंद्र सरकार का कालेधन पर बहुप्रतीक्षित ेत पत्र अपने उद्देश्यों को पूरा करने और अपनी गिरती साख को बचाने में नाकाम रहा। राजनीतिक दलों, संचार माध्यमों और इस विषय से जुड़े अर्थ विशेषज्ञों ने इसे कालेधन पर कोरा कागज कहकर सिरे से नकार दिया। यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार रोकने और अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए इच्छाशक्ति के न होने और अकर्मण्यता के आरोप लगते रहे हैं। कालेधन पर यह ेत पत्र भी इन आरोपों को पुष्ट करता है। आलम यह है कि इसमें कालेधन के आकार प्रकार पर आठवें दशक में आई एक रिपोर्ट के ब्योरे हैं, लेकिन उसके बाद कालेधन को लेकर यह ेत पत्र नितांत कोरा है। इस ेत पत्र में कालेधन और विदेशी बैंकों में जमा भारतीय कालेधन पर आधी अधूरी और मनमाफिक जानकारी देकर यह जताने की कोशिश है कि कालेधन को लेकर जो आंकड़े हैं, वे सब अप्रामाणिक और कल्पित ज्यादा हैं। मोटे शब्दों में कहें, तो ‘फर्जी’ हैं। इसलिए कालेधन पर प्रामाणिक अध्ययन और रिपोर्ट के लिए यह काम सरकार ने तीन संस्थाओं को सौंपा है, जिनकी रिपोर्ट सितम्बर तक आने की उम्मीद जताई गई है। लेकिन एक विदेशी वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के आधार पर यह बताने की कोशिश अवश्य की गई है कि यूपीए के कार्यकाल में स्विस बैंकों में जमा भारतीय कालाधन कम हुआ है। एक स्विस वेबसाइट के हवाले से ेत पत्र में बताया गया है कि 2006 में वहां भारतीयों का 23375 करोड़ रुपया जमा था, जो 2010 में घट कर 9295 करोड़ रुपये ही रह गया। लेकिन प्रश्न यह है कि 14 हजार करोड़ रुपये कहां गए? आशंका व्यक्त की गई है कि यह रकम विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और विदेशी वित्तीय संस्थाओं के जरिए सफेद बनाकर भारत में निवेश की गयी है। पिछले 12 वर्षो में भारत में होने वाले विदेशी निवेश के रूप में यह कालाधन सिंगापुर और मॉरीशस के रास्ते सर्वाधिक आया है। लेकिन इस बेवसाइट से ज्यादा शोधपरक विदेशी रिपोर्ट उपलब्ध है जिसमें विदेश में जमा देश के कालेधन का अनुमान 24 लाख करोड़ से 94 लाख करोड़ रुपये तक आंका गया है। सीबीआई के मुखिया यह आंकड़ा 500 अरब डॉलर बताते हैं लेकिन सरकार को इस पर भी यकीन नहीं है। देश में सबसे ज्यादा कालाधन कहां-कहां है, इसका ‘रहस्योद्घाटन’ इस ेत पत्र में है। रियल एस्टेट (भू-संपदा), बुलियन (सर्राफा), आभूषण, शिक्षा, चिकित्सा, शेयर बाजार, खनन आदि क्षेत्रों में सर्वाधिक कालाधन है। टेलिकॉम क्षेत्र का उल्लेख करना शायद सरकारी नुमाइंदे भूल गये। हां, देश के अंदर-बाहर भारतीयों का कितना कालाधन है, इस ेत पत्र में इसकी कोई पुष्ट जानकारी नहीं है, लेकिन कालेधन पर अंकुश लगाने के लिए ेत पत्र में सुझावों और उपायों की भरमार है। मुख्य सुझाव हैं- कालेधन पर अंकुश के लिए डेबिट और क्रेडिट काडरे के इस्तेमाल पर टैक्स राहत दी जाए। संपत्ति की खरीद-खरोख्त के समय आयकर विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य बनाया जाए। संपत्तियों के लेन-देन के स्रेत पर ही कर काटा जाए। पांच लाख रुपये से अधिक स्वर्ण आभूषण खरीदने पर पैन नंबर देना अनिवार्य हो। सभी आर्थिक अपराधों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट हो और सजा ज्यादा सख्त बनाई जाए। साथ ही इस ेत पत्र में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में तेजी लाने के लिए लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त नियुक्त किये जाने, विदेश में जमा कालाधन वापस लाने के लिए एमनेस्टी (कर छूट) स्कीम लाने, कालेधन की वसूली के लिए देश में स्वर्ण जमा योजना की संभावना तलाशने, रियल एस्टेट क्षेत्र का देश भर में कंप्यूटरीकृत डाटा-बेस तैयार करने तथा जीएसटी कानून जल्द लाकर कर चोरी पर अंकुश लगाने जैसे सुझाव दिये गए हैं। इनमें कई सुझाव और उपाय ऐसे हैं जिन्हें लागू करने की सरकार की कोशिशें नाकाम रही हैं। मसलन, संपत्ति की खरीद-फरोख्त पर स्रेत पर कर कटौती, दो लाख रुपये की स्वर्ण खरीद पर पैन कार्ड नंबर देना आदि। ेत पत्र में एमनेस्टी स्कीमों का सुझाव है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में सरकार ने शपथ पत्र दे रखा है कि वह भविष्य में कभी कोई एमनेस्टी स्कीम नहीं लाएगी। इस ेत पत्र में जिक्र है कि जून, 2011 में सीबीडीटी के पूर्व चेयरमैन डीके जोशी की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया जिसने अपनी रिपोर्ट इस जनवरी में सरकार को सौंप दी। इस रिपोर्ट से साफ जाहिर होता है कि देश में बढ़ते बेहिसाब कालेधन की जड़ कहां है और क्यों इस पर अंकुश लगाना मौजूदा राजनीतिक दलों के लिए असंभव है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश की दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां (कांग्रेस और बीजेपी) क्रमश: 500 और 200 करोड़ रुपये का आयकर रिटर्न दाखिल करती है। जबकि रिपोर्ट में गणनाओं के आधार पर बताया गया है कि इन पार्टियों का केवल चुनाव खर्च ही 10 और 15 हजार करोड़ रुपये है। इसमें इनके उम्मीदवारों का खर्च शामिल नहीं है। सब जानते हैं कि लोकसभा चुनाव में किसी भी बड़ी पार्टी (चाहे वह क्षेत्रीय हो या राष्ट्रीय) के उम्मीदवार का खर्च पांच करोड़ रुपये से कम नहीं आता है। विधानसभा चुनावों में यह खर्च प्रति सीट एक से तीन करोड़ रुपये बताया जाता है। चुनावों में यह धन आता कहां से है? जाहिर है कि यह उन्हीं सेक्टरों से सबसे ज्यादा आता है जिनका उल्लेख इस ेत पत्र में है। राजनीति में जैसे-जैसे कालेधन का दखल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे देश के कालेधन की ग्रोथ बढ़ रही है। इस गठजोड़ से सरकारी महकमा सबसे ज्यादा मलाई काट रहा है। ेत पत्र में सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए सशक्त लोकपाल और लोकायुक्त बिल की पुरजोर वकालत की गई है। लेकिन संसद में इस बिल की जो फजीहत हुई है, उससे स्पष्ट हो गया है कि राजनीतिक दल भ्रष्टाचार और कालेधन पर कितने गंभीर हैं। लोकायुक्त और एनसीटीसी कानूनों से संघीय ढांचे पर प्रहार की दुहाई देकर उनका विरोध अनेक मुख्यमंत्री करते हैं। क्या आपने कालेधन और भ्रष्टाचार पर सख्त कानून लाने के लिए किसी मुख्यमंत्री को मांग करते देखा है, जबकि कर चोरी से राज्यों को भी राजस्व का भारी नुकसान होता है। जब तक राजनीति का कालेधन और अपराधियों से संबंध रहेगा तब तक भ्रष्टाचार और कालेधन की समस्या से निदान पाने की बात बेमानी है। राजनीति में कालेधन के बढ़ते वर्चस्व की वजह से असल में कार्यपालिका ही देश की नियंता बन गई है। शायद यही वजह है कि आज देश में बाबू और बाबूनुमा नेताओं का विधायिका पर आधिपत्य है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और बाबा रामदेव विदेश से कालाधन लाने के लिए रथयात्रा करते हैं, मुहिम छेड़ते हैं लेकिन देश में जमा कालेधन के लिए नहीं। यह सोचने के लिए विवश करता है।
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