Friday, June 1, 2012

खतरे में क्यों शिशुओं का जीवन!

हमारे देश की उन्नति विरोधाभासों से भरी है। एक ओर वि मानचित्र में उसकी पहचान आर्थिक सुदृढ़ीकरण की ओर तेजी से अपने पांवों को जमाते हुए देश की बनी है, वहीं दूसरी ओर मानव विकास के मापदंडों पर हम अत्यन्त अविकसित देशों के साथ खड़े हैं। कश्मीर के जीबी पंत अस्पताल में बीते महीनों से नन्हें शिशुओं की मौत का जो सिलसिला बना हुआ है, उसने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। प्राथमिक जांच में इसका कारण प्रबन्धन में कुशलता का अभाव माना जा रहा है परन्तु तय है कि इन मौतों के पीछे अस्पताल में चिकित्सा सुविधाओं और बुनियादी आवश्यकताओं विशेषकर शिशु वार्डको संक्रमणरहित बनाने के प्रयासों में कमी होगी। बीते वर्ष अक्टूबर में कोलकाता के बीसी राय अस्पताल में दो दिनों के भीतर अठारह बच्चों ने दम तोड़ दिया था तो अस्पताल प्रबंधन ने यह कह कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पाने की चेष्टा की थी कि वे बच्चे बहुत गंभीर हालत में लाये गये थे। दरअसल हमारे चिकित्सा प्रबन्धन ने हर कोताही का कोई न कोई ठोस कारण प्रस्तुत करने की जो परंपरा कायम की है, उसने शिशु मृत्यु दर का ग्राफ बढ़ा दिया है जो चिंता का कारण है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री ने यह स्वीकार किया है कि देश में नवजात शिशु मृत्यु दर प्रति हजार 33 है और 29 प्रतिशत नवजातों की मौत का कारण निमोनिया, सेप्टीसेमिया और गर्भकाल में संक्रमण है। समय पूर्व प्रसव के कारण 24 प्रतिशत व जन्म के तुरन्त बाद सांस लेने में अक्षमता की वजह से 19 प्रतिशत नवजातों की मौत हो जाती है। विभिन्न शोध एवं अध्ययनों से जाहिर हो चुका है कि शिशु मृत्यु दर में कमी लाने में टीकाकरण एक जरूरी भूमिका निभा सकता है। यूं खसरा, डिप्थीरिया, कालीखांसी, हेपेटाइटिस आदि रोगों को जड़ से समाप्त करने के मकसद से अरसे से टीकाकरण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इस मामले में भारत दुनिया के तमाम देशों से काफी पीछे है। दो साल पहले खुद केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने स्वीकार किया था कि देश के करीब चालीस प्रतिशत बच्चों को ये टीके नियमित नहीं लगाए जा पाते हैं। हाल में चिकित्सा विज्ञान की पत्रिका लांसेट ने खुलासा किया है कि वि भर में खसरे से होने वाली मौतों में सबसे अधिक तादाद भारत में है। रिपोर्ट के अनुसार 2010 में खसरे से दुनिया में हुई कुल मौतों में 47 फीसद केवल भारत में हुई। यह स्थिति तब है जब वि भर में विगत दस वर्षो में खसरे से होने वाली मौतों में लगातार कमी आई है। हैरानी की बात यह है कि अफ्रीका के बेहद निर्धन माने जाने वाले देशों की भी स्थिति इस संदर्भ में भारत से बेहतर है। हेपेटाइटिस, कालीखांसी, खसरा, डिप्थीरिया जैसे रोगों का इलाज संभव है, बशत्रे है इसके नियमित और निर्धारित अवधि में टीके लगवाए जाएं। सरकार ने यूं सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में इनकी मुफ्त उपलब्धता एवं स्वास्थ्यकर्मियों की सहायता से टीके लगाने की व्यवस्था का दावा किया है परन्तु ये योजनाएं लक्ष्य को पूरा नहीं कर पा रही हैं क्योंकि हकीकत में अधिसंख्य स्वास्थ्य केन्द्रों पर ये टीके उपलब्ध नहीं होते हैं और भारत के निर्धन ग्रामीण परिवारों के लिए यह संभव नहीं कि वह बाहर से टीके खरीद कर लगवा सकें। लांसेट पत्रिका की रिपोर्ट में कहा गया है कि करीब साढ़े तेरह करोड़ बच्चों को लक्ष्य बनाकर अगले तीन साल तक युद्ध स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाया जाए, तभी खसरे पर काबू पाया जा सकता है। चाहे वह टीकाकरण अभियान हो या जननी शिशु सुरक्षा अभियान, हम सबमें पिछड़े हैं और इसी के चलते अपेक्षित नतीजे सामने नहीं आ रहे हैं। यूं पोलियो उन्मूलन के बाद अब बच्चों को खसरे के उन्मूलन के उद्देश्य से इस वर्ष यानी वर्ष 2012 को नियमित टीकाकरण सुदृढ़ीकरण वर्ष घोषित किया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2010 के बाद एक अभियान के तहत देश के 21 राज्यों और केन्द्र शासित क्षेत्रों में खसरे का दूसरा टीका देने का अभियान पूरा कर लिया गया है। शेष 14 राज्यों के 197 जिलों में खसरे का पहला टीका दे दिया गया है और शेष 158 जिलों में टीके देने जा रहे हैं। भारत की बुनियादी दिक्कत यह है कि हमने आर्थिक उन्नति तो बहुत की है लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में इस तरक्की तक नहीं पहुंच पाए हैं। शिक्षा के लिए तो शिक्षा के अधिकार की बात की जा रही है लेकिन स्वास्थ्य सेवा लोगों तक पहुंच सके, इसके लिए विशेष नहीं किया जा रहा है। बुनियादी या प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाए जाने के साथ अशिक्षित एवं निर्धन जनता को, स्वास्थ्य और भावी बीमारियों से बचाव के लिए शिक्षित किए जाने की आवश्यकता है। खसरे को दैवीय प्रकोप मानने वाले ग्रामीण भारत से इसे हटाया जाना सिर्फ टीकाकरणसे संभव नहीं है क्योंकि टीके लगवाने के लिए वे तब आएंगे जब उन्हें इस सम्बन्ध में शिक्षित किया जाएगा। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है जो पूर्व में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि देश में टीकाकरण के दौरान असुरक्षित इंजेक्शनों के इस्तेमाल का खतरा शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में करीब दस प्रतिशत ज्यादा होता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के अध्ययन एसेसमेन्ट ऑफ इन्जेक्शन प्रैक्टिसेज इन इंडिया में कहा गया है कि देश में ग्रामीण समुदायों की तुलना में शहरी समुदायों के लिए टीके का परामर्श अधिक दिया जाता है। शहरों की करीब 21.6 प्रतिशत जनसंख्या की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों की 15.9 प्रतिशत जनसंख्या को ही टीके का परामर्श दिया जाता है। अध्ययन के अनुसार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में इंजेक्शनों को संक्रमण रहित करने वाले उपकरण एक समान हैं लेकिन टीकाकरण से जुड़े कचरे का निपटान सही से नहीं किया जाता है जो ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा में बड़ी चुनौती बन रहा है। हाल में योजना आयोग के, स्वास्थ्य मद पर जीडीपी के ढाई फीसद के बराबर सुझाव को सरकार ने स्वीकृति दे दी है। इससे मरीजों के अनुपात में डॉक्टर, र्नसो और कर्मचारियों की संख्या में बढ़ोत्तरी संभव होगी। साथ ही प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला अस्पतालों में दवाओं सहित चिकित्सा-साधन बढ़ाए जा सकेंगे। नौनिहालों की जीवन रक्षा के लिए ईमानदार कोशिश जरूरी है अन्यथा कमजोर नींव कभी भी विकास पथ पर नहीं बढ़ सकेगी।

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