Friday, June 22, 2012

नहीं चलेगा ग्रीस संकट का बहाना


मैक्सिको के लॉस केबोस से हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दुनिया के गंभीर संकट में होने का जो बयान दिया है, उसका खंडन होना संभव नहीं है। दुनिया के प्रमुख देशों के नेताओं को इस बात का अहसास है कि वे वाकई गंभीर संकट के दौर से गुजर रहे हैं। इसलिए प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा, वह केवल उन अहसासों का सार्वजनिक प्रकटीकरण है। किंतु इसके बाद उन्होंने जो कुछ कहा, उससे सहमत होने में काफी हिचक है। उन्होंने कहा कि इसका जल्द ही कोई हल ढूंढ़ना होगा और प्रमुख विकासशील एवं विकसित देशों से उम्मीद जाहिर की कि वह आर्थिक संकट का हल ढूंढ़ लेगा। आर्थिक संकट की गहराई, अब तक के प्रयासों की विफलताओं तथा नेताओं की सोच को आधार बनाएं तो यह मानने का कोई कारण नहीं है कि इसका कोई जल्दी में हल निकल सकता है और वाकई ऐसा हो जाएगा। प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य विदेश की धरती से उस समय आया है, जब अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने अपनी नई रेटिंग यानी आकलन में साफ कर दिया है कि भारत की साख पर बट्टा लग चुका है। हालांकि फिच ने पहले भी भारत को बीबीबी नकारात्मक रेटिंग दी थी, जिसका अर्थ होता है कर्ज चुकता करने में विपरीत समस्याओं का सामना करना। यह बाहरी निवेश की उपयुक्तता की दृष्टि से न्यूनतम स्तर है। ध्यान रखिए, कुछ ही दिनों पहले स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) ने भी कहा था कि अगर यही स्थिति रही तो वह भारत की रेटिंग घटाकर सीसी यानी जंक या कबाड़ कर देगी। सीसी का अर्थ है अत्यंत कमजोर अर्थव्यवस्था। यही बात फिच ने दूसरे शब्दों में कही है। रेटिंग पर सवाल सरकार ने दोनों रेटिंग एवं आकलनों को खारिज कर दिया है। हालांकि रेटिंग एजेंसियों की प्रासंगिकता, उनके आकलन के तरीकों से व्यापक असहमति की गुंजाइश है, पर वर्तमान आर्थिक ढांचे में उन्होंने जो कुछ कहा है, उसका अर्थ यह है कि संकट समझते हुए भी आप समाधान नहीं कर पा रहे और इससे यह ज्यादा गंभीर हो रहा है। एसएंडपी और फिच दोनों ने ऐसा करने के लिए धीमी विकास गति, बढ़ती महंगाई, खजाने का बढ़ता घाटा तथा फैसले लेने में राजनीतिक प्रतिष्ठान की सुस्ती को आधार बनाया है। सरकारी आंकड़ों के आधार पर आप इसके आकलन पर प्रश्न उठा सकते हैं, पर इनमें ऐसी कौन-सी बात है, जिसे आप पूरी तरह गलत बता देंगे? जरा इनके आकलनों के आधार को जो प्रधानमंत्री कह रहे हैं, उसके आलोक में विचार करिए। चूंकि जी-20 या इसके पहले ब्रिक्स बैठक का आयाम पूरी दुनिया है, इसलिए वहां जो कुछ कहा जाएगा, वह किसी एक देश के संदर्भ में नहीं होगा। प्रधानमंत्री एवं वित्तमंत्री दोनों कई बार कह चुके हैं कि देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है और इसके लिए कठोर फैसला लेना जरूरी है। हां, वे इसके पीछे वैश्विक संकट विशेषकर यूरोजोन संकट को भी प्रमुख कारण मानते हैं। मैक्सिको में भी योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि अगर यूरो जोन का संकट दूर नहीं हुआ तो भारत उससे गहरे प्रभावित होगा। प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने भी रेटिंग एजेंसियों से असहमति जाहिर की, पर यह भी कहा कि अगले छह महीने अर्थव्यवस्था के लिए अहम हैं और इस बीच पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। यह बात केवल भारत के संदर्भ में हो, ऐसा नहीं है। दुनिया के प्रमुख देशों की यही स्थिति है। आखिर नई सदी में यूरो के आविर्भाव के बाद माना गया था कि सामूहिक रूप से विश्व की सबसे ज्यादा शक्तिशाली अर्थव्यवस्था की प्रतिनिधि मुद्रा होने के कारण यह डॉलर को चुनौती देगी। खुद अमेरिका भी यूरोपीय संघ की आर्थिक मांसपेशी के सामने कमजोर दिखेगा। स्थिति उसके उलट क्यों हो गई? अगर आप रेटिंग सहित दूसरी एजेंसियों के आकलनों को देखेंगे तो उनमें भी संकट की चुनौतियों के अनुरूप राजनीतिक नेतृत्व द्वारा उपयुक्त कदम न उठाए जाने या उठाए जाने में हिचक की बात कही गई है। इस संकट के दावानल में यूरोप की 11 सरकारें चलीं गई। कुछ जाने वाली हैं। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी की पराजय हुई और अब ओबामा की लोकप्रियता गिर रही है। आर्थिक संकट के दावानल ने दुनिया भर की राजनीति को झुलसा दिया, लेकिन समाधान नहीं निकला। आज इस बात पर आम सहमति है कि 2008 में उभरे संकट को जितना बड़ा माना गया, उससे आज का संकट कहीं बड़ा है। इसका अर्थ यह हुआ कि उस दौरान अर्थव्यवस्थाओं को संकट की अग्नि से बचाने के लिए राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर जो भी कदम उठाए गए, वे सफल नहीं हुए। भारत में हालांकि कहा गया कि संकट हमारे यहां नहीं है, पर इसके लिए सरकार ने अक्टूबर 2008 से मार्च 2009 तक कई आर्थिक पैकेज दिए। यानी इनमें भारत भी शामिल था। अगर वे सफल होते तो आज भारत सहित दुनिया के सभी प्रमुख देशों के नेतृत्व वर्ग के चेहरे पर हवाइयां नहीं उड़ रही होतीं। जिस किसी घटना या कदम से इसके समाधान की ओर बढ़ने की संभावना बताई जाती है, वह या तो उस अनुरूप घटित नहीं होता या फिर बेअसर हो जाती है। ग्रीस में दोबारा मतदान होने के बाद एंटोनियो समाराज की न्यू डेमोक्रेसी पार्टी भी पर्याप्त बहुमत से पीछे रह गई। यह पार्टी ग्रीस के कर्ज संकट के लिए यूरोपीय संघ के साथ बहुत हद तक सहमति बनाने का विचार रखती है। इसे जितनी भी बढ़त मिली, उससे जो सकारात्मक संदेश जाना चाहिए था, नहीं गया। दुनिया भर के शेयर बाजार लुढ़कते चले गए। यह ऐसा कोई पहला उदाहरण नहीं है। परेदस में माथापच्ची हमारे प्रधानमंत्री अर्थशास्त्र के मर्मज्ञ हैं और कहा जाता है कि दुनिया इससे संबंधित उनकी बातों को ध्यान से सुनती है। सवाल है कि क्या उन्होंने स्वयं अपने देश में उठाए गए कदमों और बाहर दिए गए सुझावों के जरिये ऐसे उपायों की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है, जो वाकई गंभीर संकट का अंत कर सके या इसे कम करने में सहायक हो सके? नए वित्तीय वर्ष की तिमाही में भारत का औद्योगिक विकास 0.1 प्रतिशत रहा और इसके पूर्व वह नकारात्मक हो गया। इस वर्ष की विकास दर 6 प्रतिशत के आसपास ही रह सकता है। घाटा आसमान पर है और आपका मुद्रा डॉलर के सामने लगातार कमजोर बना हुआ है। जब आप अपने घर में लगी आग को बुझाने या इसकी ताप कम करने में कामयाब नहीं हुए तो फिर दुनिया को रास्ता कैसे दिखा सकते हैं। किंतु मौजूदा दुनिया ऐसी है, जहां आप यह कारनामा कर सकते हैं। भारत की ओर से मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, अहलूवालिया, कौशिक बसु आदि की मंडली ने संकट की गंभीरता का तो अहसास कराया, लेकिन रास्ता सुझाया तो विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के पास निवेश राशि में वृद्धि का, उसकी निर्णय लेने की प्रणाली में और सुधार का, डॉलर या यूरो की जगह आपस में स्थानीय मुद्राओं में कारोबार का। ये बातें हम लंबे समय से सुन रहे हैं और जी-20 व ब्रिक्स दोनों में यही विचार गूंज रहे हैं। ब्रिक्स ने आपसी मुद्रा में कारोबार का निश्चय किया, लेकिन इससे यूरो संकट या समग्र आर्थिक संकट के समाधान में क्या योगदान होगा? यह विचार आपसी लाभ के लिए ठीक है, क्योंकि विदेशी मुद्रा के मुकाबले आपके मुद्रा के मूल्यों की अस्थिरता इससे प्रभावित नहीं होगी, लेकिन यह एक प्रकार का आक्रामक आर्थिक क्षेत्रीयतावाद भी है। बेशक, डॉलर एवं यूरो ही लेन-देन की मुद्रा क्यों होनी चाहिए? यह अनुचित नहीं, पर अगर भूमंडलीकरण के सिद्धंातों के आलोक में विचार करें तो यह संरक्षणवाद है। यूरोपीय संघ बैकिंग संघ बनाने, बैंकों की कार्यप्रणाली का बेहतर पर्यवेक्षण विकसित करने, जमा पूंजी को गारंटी के तहत लाने तथा यूरो प्रबंधन को बेहतर करने आदि का सुझाव दे रहा है। इसका असर कितना होगा अभी कहना कठिन है, लेकिन डूबते बैंकों को बचाने भर से यूरो संकट का समाधान नहीं हो सकता है। आखिर यूरोप ही नहीं, दुनिया भर की वित्तीय प्रणाली ध्वस्त क्यों हुई इसका कोई सर्वमान्य विश्लेषण जब तक नहीं रखा जाएगा, संकट का मूल समझ में कहां आएगा। सरंक्षणवाद केवल कहने से नहीं रुकेगा, जब अपने घर में आग लगी हो तो कोई पड़ोसी की चिंता नहीं करता। वह भी उस हालत में, जब स्वयं आग कैसे बुझाए यही जानकारी नहीं हो। तो संकट दिनोंदिन ज्यादा गंभीर हो रहा है, पर समाधान के रास्ते नदारद हैं और यह संकट मूल अर्थव्यवस्था के संकट से ज्यादा गंभीर है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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