लुप्त होने के कगार पर खड़ी जारवा जनजाति को कानूनी संरक्षण मिलने जा रहा है। इस कानून के अमल में आने के बाद जारवा समुदाय नुमाइश और मनोरंजन के जीव नहीं रह जाएंगे। केंद्र सरकार ने इनके लिए अंडमान-निकोबार द्वीप समूह (आदिवासियों का संरक्षण) संशोधन नियमन विधेयक-2012 को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद यह कानून प्रभावशील हो जाएगा। कानून के मुताबिक जारवा आदिवासी सुरक्षित क्षेत्र के आसपास पांच किमी के दायरे में पर्यटन करना अपराध होगा। साथ ही वीडियो या फोटोग्राफी करना भी अनाधिकृत कर दिया गया है। कानून का पालन नहीं करने पर सात साल की सजा और 10 हजार रुपये तक का जुर्माना भी भरना पड़ सकता है। हालांकि निकोबार प्रशासन ने भी इस जनजाति के लिए सुरक्षित क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने वाली एक अधिसूचना जारी की थी, लेकिन कोलकाता हाईकोर्ट ने उसे खारिज कर दिया था, जिसकी अपील सुप्रीमकोर्ट में लंबित है। केंद्रीय कानून बन जाने के बाद इस अधिसूचना का अब कोई महत्व नहीं रह गया है। जारवा जनजाति के संरक्षण के लिए यह कानून बेहद जरूरी था, क्योंकि हमारे समाज की दशा और दिशा अर्थतंत्र तय करने लगे हैं। इसलिए मापदंड तय करने के तरीके बदल गए हैं। यही कारण है कि हम जिन्हें सभ्य और आधुनिक समाज का हिस्सा मानते हैं, वे लोग प्राकृतिक अवस्था में रह रहे लोगों को इंसान मानने के बजाय जंगली जानवर ही मानते हैं। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में रह रहे लुप्तप्राय जारवा जनजाति की महिलाओं को स्वादिष्ट भोजन का लालच देकर सैलानियों के सामने नचाने के कुछ मामले ब्रिटिश अखबारों में छपे थे। इनके नग्न वीडियो भी इंटरनेट का हिस्सा बनाए गए थे, जिन्हें शासन-प्रशासन ने झुठलाने की कवायद की थी। जबकि हकीकत यह थी कि अभयारण्यों में वन्यजीवों को देखने की मंशा की तरह दुर्लभ मानव प्रजातियों को भी देखने की चाह रसूखदारों में पनप रही है। एक विडंबना यह भी है कि जिस सरकारी तंत्र को आदिवासियों की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया है, वही इन्हें लालच देकर नचवाने का काम कर रहे हैं। इसी कुत्सित मानसिकता के चलते जारवाओं को इंसान की बजाए पर्यटक मनोरंजक खिलौने मानकर चलने लगे थे। एक ओर तो हम दया और करुणा जताते हुए सर्कसों और मदारियों द्वारा वन्यजीवों के करतब दिखाए जाने पर अंकुश लगाने की वकालत करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने में मगन निर्वस्त्र जनजातियों को नचाने के लिए मजबूर करते हैं। लंदन के अखबार ने मोबाइल फोन से फिल्माई गई दो फिल्में जारी की थीं। इनमें से एक फिल्म 3.19 मिनट की थी, जिसमें एक पुलिस अधिकारी के सामने नृत्य करती हुई जारवा जाति की अर्धनग्न लड़कियां दिखाई गई थीं। दूसरे वीडियो में सेना की वर्दी पहने बैठे एक व्यक्ति के सामने अन्य जारवा युवतियां नाच रही थीं। अखबार ने दावा किया था कि ये वीडियो नए हैं और इनकी सुरक्षा में लगे अधिकारियों की मिलीभगत से सामने आए हैं। इसके पहले विदेशी सैलानियों के सामने इन महिलाओं को नचाने के जो वीडियो जारी किए गए थे, उनका फिल्मांकन गोपनीय ढंग से इसी अखबार के पत्रकार ने किया था। इस कारण देश में हल्ला मचा और केंद्र सरकार को मजबूरी में इस समुदाय के संरक्षण के लिए कानून बनाना पड़ा। जंगल में अमंगल आधुनिक विकास और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए वन कानूनों में लगातार हो रहे बदलावों के चलते अंडमान में ही नहीं, देश भर की जनजातियों की संख्या लगातार घट रही हैं। आहार और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी होती जा रही है। इन्हीं वजहों के चलते अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में अलग-अलग दुर्गम टापुओं पर जंगलों में समूह बनाकर रहने वाली जनजातियों का अन्य समुदायों और प्रशासन से बहुत सीमित संपर्क है। यही वजह है कि इनकी संख्या घटकर महज 381 रह गई है। एक अन्य टापू पर रहने वाले ग्रेट अंडमानी जनजाति के लोगों की आबादी लगभग 97 है। इन लोगों में प्रतिरोधात्मक क्षमता इतनी कम होती है कि ये एक बार बीमार हुए तो इनका बचना नमुमकिन हो जाता है। एक तय परिवेश में रहने के कारण इन आदिवासियों की त्वचा बेहद संवेदनशील हो गई है। लिहाजा, अगर ये बाहरी लोगों के संपर्क में लंबे समय तक रहते हैं तो ये रोगी हो जाते हैं और उपचार के अभाव में दम तोड़ देते हैं। अब इनकी प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए टीकाकरण और पौष्टिक खुराक देने के उपाय किए जा रहे हैं। करीब एक दशक पहले तक ये लोग पूरी तरह निर्वस्त्र रहते थे, लेकिन सरकारी कोशिशों और इनकी बोली के जानकार दुभाषियों के माध्यम से समझाने पर इन्होंने थोड़े-बहुत कपडे़ पहनने या पत्ते लपेटने शुरू कर दिए हैं। इसीलिए ब्रिटिश अखबार के जरिये जिन विडियो की जानकारी सामने आई है, उनमें जारवा महिलाओं को कपड़े पहने नृत्य करते दिखाया गया था। इस कारण तय हुआ था कि ये वीडियो नए हंै। पूछताछ से खुलासा हुआ था कि ब्रिटिश अखबार के द ऑब्जर्वर के पत्रकार को पोर्टब्लेयर के राजेश व्यास और टैक्सी चालक इनके निवास स्थल तक ले गए थे। वहां इन्होंने स्वादिष्ट भोजन के चंद निवाले डालकर इनसे नृत्य कराया और फिल्मांकन किया। जबकि यह क्षेत्र सुप्रीमकोर्ट और स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार पर्यटन के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित है। इन्हें संपूर्ण संरक्षण देने की दृष्टि से अंडमान ट्रंक रोड को बंद करके समुद्र से ऐसा मार्ग बनाए जाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, जो जारवा संरक्षित क्षेत्र से होकर न गुजरे। जारवा जनजातियों को मनोरंजन के जीव मानकर चलना एक शर्मनाक पहलू था। यह शोषण और अमानवीयता का चरम है। चंद निवालों के लालच में यदि परदेसियों के सामने अर्धनग्न जारवा महिलाएं नाच रही हैं तो विकास का ढिंढोरा पीट रहे देश के लिए लज्जा में डूब मरने की बात है। क्योंकि ये भोले और मासूम जारवा नहीं जानते कि कथित रूप से सभ्य मानी जाने वाले दुनिया में नग्नता बिकती है, लेकिन इसके ठीक विपरीत जो लोग धन का लालच देकर इनकी नग्नता के दृश्य कैमरे में कैद करते हैं, वे जरूर अच्छी तरह से जानते हैं कि यह नग्नता उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान की टीआरपी बढ़ाने की सस्ती और जुगुप्सा जगाने वाली अचरज भरी विडियो क्लीपिंग है। इस लिहाज से जन्मजात अवस्था में रह रहे जारवाओं की मासूमियत को बेचने के गुनाहों पर इस कानून के अमल में आने के बाद अंकुश लगने की उम्मीद है। इसी तरह का एक मामला ओडिशा के प्राचीन आदिवासियों को लेकर भी सामने आया है। इन्हें भी एक सफारी में सैलानियों के सामने नचाया गया था। सभ्यता की परिधि से दूर हम हालांकि हमारे देश के सांस्कृतिक परिवेश में नग्नता कभी अश्लीलता का पर्याय नहीं रही। पाश्चात्य मूल्यों और भौतिकवादी आधुनिकता ने ही प्राकृतिक व स्वाभाविक नग्नता को दमित काम वासना की पृष्ठभूमि में रेखांकित किया। वरना, हमारे यहां तो खजुराहों, कोणार्क और कामसूत्र जैसे नितांत व मौलिक रचनाधर्मिता से स्पष्ट होता है कि एक राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में हम कितनी व्यापक मानसिक दृष्टि से परिपक्व लोग थे। लेकिन कालांतर में विदेशी आक्रांताओं के शासन और उनकी संकीर्ण कार्य-प्रणाली ने हमारी सोच को बदला और नैसर्गिक नग्नता फूहड़ सेक्स का उत्तेजक हिस्सा बन गई। इसीलिए कहना पड़ता है कि कथित रूप से हम आधुनिक भले ही हो गए हों, लेकिन सभ्यता की परिधि में आना अभी बाकी है। वरना, जो आदिम जातियां प्रकृति से संस्कार व आहार ग्रहण कर अपना जीवन-यापन कर रही हैं, उन्हें मानव मानने की बाजाय चिंपाजियों जैसे रसरंजक वन्य प्राणी मानकर नहीं चलते और न ही भोजन के चंद टुकडे़ डालकर उन्हें बंदर या भालुओं की तरह नाचने को बाध्य करते? और न ही इनके जीवन में बाहरी दखल को रोकने के लिए किसी कानून की जरूरत पड़ती? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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