उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं को अविरल एवं निर्मल गंगा के मार्ग में बाधक मानते हुए इनका प्रबल विरोध हो रहा है। उत्तराखंड के बाद प्रति दिन गंगा में लाखों टन कचरा उड़ेला जा रहा है। साथ ही गंगा की अविरलता भी बार-बार टूट रही है। गंगा के तिल-तिल मरने के इस पक्ष को दरकिनार कर देना इस आंदोलन के औचित्य और वस्तुनिष्ठा पर सवाल खड़े करता है। यदि मानकों के अनुसार जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण किया जाए तो न तो इससे जल प्रदूषित होता है और न ही जल की मात्रा कम होती है। जहां तक नदी के पर्यावरणीय प्रवाह का सवाल है, उच्च स्तरीय विशेषज्ञ ग्रुप ने नदी की मूल धारा में छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा पर अपनी रिपोर्ट दे दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरणीय प्रवाह के लिए नदी की मूल धारा में एक क्यूमेक (35 क्यूसेक) पानी छोड़ा जाना पर्याप्त होगा। गु्रप ने विशेष तौर पर भागीरथी के धार्मिक महत्व को देखते हुए मूल धारा में चार क्यूमेक (140 क्यूसेक) पानी छोड़ने की सिफारिश की है। केंद्र सरकार ने गु्रप की इस रिपोर्ट पर विचार तक नहीं किया और परियोजना हमेशा के लिए बंद कर दी। उससे पहले भागीरथी पर पाला मनेरी और भैरोघाटी परियोजनाओं को बंद करने का निर्णय लिया जा चुका था। दरअसल, गंगा पर परियोजना बनाने का छिटपुट विरोध पहले भी होता रहा है। 2008 के बाद गंगा पर परियोजनाओं का जो विरोध हुआ, वह एक तरह से राजनीति से प्रेरित लगता है। उत्तराखंड के कुछ एनजीओ के आमंत्रण पर प्रो. जीडी अग्रवाल ने जब अनशन शुरू किया तो, भाजपा हाइकमान के निर्देश पर तत्कालीन राज्य सरकार ने भागीरथी में निर्माणाधीन उत्तराखंड जल विद्युत निगम की पाला मनेरी और भैरोघाटी परियोजनाओं को स्थगित कर दिया। 2009 के आम चुनाव से ठीक पहले भाजपा को गंगा के रूप में एक नया हिंदूवादी मुद्दा मिल गया था। गंगा भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने के लिए अयोध्या की तरह मुद्दा न बन जाए, कांग्रेस की चिंता की यह सबसे बड़ी वजह थी। कांग्रेस की केंद्र सरकार ने बिना अधिक माथापच्ची के उत्तराखंड की दोनों परियोजनाओं को हमेशा के लिए बंद करने का निर्णय ले लिया। इस सफलता के बाद आंदोलन करने वालों का जोर बंध गया और हरिद्वार कुंभ से पहले भागीरथी पर एनटीपीसी की लोहारीनाग पाला परियोजना को भी बंद करने का निर्णय लेना पड़ा। यहां सवाल एक संसाधनहीन राज्य के बड़े संसाधन जल का है, जो जलकर के रूप में उत्तराखंड को सालाना बीस हजार करोड़ रुपये से अधिक की आय दिला सकता है, लेकिन उत्तराखंड तो दिल्ली में बैठे नेताओं और वीआइपी के लिए आज भी एक उपनिवेश है। यही वजह है कि ग्यारह साल बाद भी उत्तराखंड के जल संसाधनों के एक बड़े हिस्से पर आज भी उत्तर प्रदेश काबिज है। उत्तराखंड की एक पूरी घाटी को रौंदकर बनाई गई टिहरी परियोजना के मालिक दिल्ली और लखनऊ हैं। टिहरी परियोजना पर उत्तराखंड का मालिकाना हक शून्य है। कहते हैं पहाड़ की जवानी और पानी कभी उसके काम नहीं आते। अब यदि परियोजनाओं के जरिये पानी उत्तराखंड के लिए एक बेहतर संसाधन बनने जा रहा है तो गंगा की अविरलता के नाम पर उसकी राह रोकी जा रही है। अविरलता सिर्फ बहाना है। गंगा तो हरिद्वार के बाद मर रही है। हरिद्वार में गंग नहर में गंगा का 90 प्रतिशत जल प्रवाहित हो जाता है। हरिद्वार के बाद बची-खुची गंगा में बह रहे कचरे ने गंगा को गंदे नाले में परिवर्तित कर दिया है। हरिद्वार के बाद गंगा की अविरलता बार-बार टूटती है। गंगा से नहरों में लिया गया जल वापस गंगा में नहीं आता। प्रदूषण ने तो गंगा को गंदा नाला बना दिया है। गंगा को बचाने के लिए हाय तौबा मचाने वाले यदि इस वास्तविकता से आंखें मूंदे हुए हैं। उन्हें सिर्फ उत्तराखंड में गंगा की अविरलता चाहिए तो उनकी मंशा पर शक होना लाजिमी है। उत्तराखंड में गंगा आंदोलन पर शंकर सिंह भाटिया की टिप्पणी
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