भारत में खराब खबरों की बरसात सी हो रही है। अर्थव्यवस्था संकट में है, राजनीतिक निष्कि्रयता टूटने का नाम नहीं ले रही और सरकार में लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है। राष्ट्र चौराहे पर खड़ा है और इसके नेता कुंभकर्णी नींद में सोए हुए हैं। प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी व राहुल सहित कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जनता से कटा हुआ है। वे फैसलों पर चर्चा नहीं करते, देश के लोगों से सीधे बात नहीं करते और उनका इस बात में यकीन ही नहीं है कि देश के आम लोगों से सीधे जुड़ने की जरूरत भी है। प्रधानमंत्री अपनी नीतियों के समर्थन में जनमत तैयार करने के इच्छुक नहीं हैं। इसीलिए देश के अधिकांश नागरिकों को महसूस होने लगा है कि नई दिल्ली में कोई सरकार काम नहीं कर रही है। भारत के आर्थिक संक्रमण के इस नाजुक मोड़ पर यह घटनाक्रम एक वास्तविक त्रासदी है। यह समय तो भारत का होना चाहिए था। पाश्चात्य विश्व अभूतपूर्व आर्थिक संकट से जूझ रहा है। यूरोजोन के संकट ने अधिकांश यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के विकास पर ग्रहण लगा दिया है और यह स्थिति लंबे समय तक जारी रहेगी। अमेरिका भी आर्थिक संकट से निकलने में कठिनाई महसूस कर रहा है। वाशिंगटन में राजनीतिक गतिरोध और नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव ने सरकार को कड़े फैसले लेने से रोक रखा है। परिणामस्वरूप, वैश्विक नेतृत्व में निर्वात पैदा हो गया है। चीन में भी राजनीतिक संक्रमण चल रहा है। जैसे-जैसे नेतृत्व परिवर्तन का वक्त नजदीक आ रहा है, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अधिकाधिक सतर्क होती जा रही है। इससे भी महत्वपूर्ण यह तथ्य है कि चीन का आर्थिक विकास भी कमजोर पड़ रहा है। इन परिस्थितियों में भारत के लिए आगे बढ़कर विश्व का नेतृत्व करने का सुनहरा मौका था, किंतु भारत की कहानी तो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई। रुपये का प्रदर्शन एशिया में सबसे खराब चल रहा है, घाटा बढ़ रहा है, नीति अनिश्चितता के कारण निवेशक भारत में निवेश करने से कतरा रहे हैं और आम आदमी आसमान छूती महंगाई के बोझ तले कराह रहा है। सरकार फैसले नहीं ले पा रही है। सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगियों और विपक्ष ने यह कमजोरी भांप ली है और यह सुनिश्चित करने में जुट गए हैं कि अगले दो सालों तक यह सरकार निरीह-लाचार बनी रहे। बाहरी विश्व के लिए, खासतौर पर भारत के दोस्तों और सहयोगियों के लिए यह निराशाजनक समय है। भारत में सामरिक साझेदारी में उल्लेखनीय निवेश करने वाला अमेरिका अब अपने संबंधों को अतीत के गौरव के अनुरूप लाने में संघर्ष कर रहा है। पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत के जो सहयोगी यह उम्मीद लगा बैठे थे कि भारत चीन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संतुलनकर्ता के रूप में उभरेगा, अब कहीं और देख रहे हैं। अफगानिस्तान में भारत के मित्र इस डर से अपनी वफादारी बदल रहे हैं कि 2014 में नाटो सेनाओं की वापसी के बाद वहां पाकिस्तान का प्रभुत्व हो जाएगा। इस घटाटोप अंधियारे में उम्मीद की एकमात्र किरण यह है कि घरेलू उथलपुथल के कारण चीन और पाकिस्तान भारत के हालात का फायदा उठाने की स्थिति में नहीं हैं। इतना सब होने के बावजूद भारत का राजनीतिक तंत्र ऐसे बर्ताव कर रहा है जैसे यहां कुछ भी गलत नहीं है। भारत नेतृत्व के संकट का सामना कर रहा है। सोनिया गांधी के पास शक्तियां हैं, लेकिन कोई सरकारी जवाबदेही नहीं है, मनमोहन सिंह के पास जिम्मेदारी है, किंतु कोई शक्ति नहीं है। जिस पार्टी को 2009 में लगभग निर्णायक जनादेश मिला हो उसकी यह गत समझ से परे है। आर्थिक रूप से कांग्रेस ने सरकार को दूसरी पीढ़ी के सुधारों पर आगे बढ़ने से रोक दिया है। सामाजिक रूप से भ्रष्टाचार अब बर्दाश्त से बाहर हो गया है। शासन के तमाम प्रमुख संस्थानों को अपनी साख बचानी मुश्किल हो रही है। राजनीतिक रूप से सत्तारूढ़ दल ने 2009 में कमाई अपनी सारी पूंजी गंवा दी है। सरकार के विभागों में कोई सामंजस्य नहीं है। लगता है कि वे राष्ट्रीय हितों के बजाय केवल विभागीय हितों के लिए काम कर रहे हैं। समसामयिक भारत का राजनीतिक परिदृश्य प्रभावी कार्यपालिका और कल्पनाशील नेतृत्व, दोनों से वंचित है। अपनी पवित्र नीयत के बावजूद प्रधानमंत्री देश के प्रबंधन में पूरी तरह विफल रहे हैं और न ही उनके पास देश के भविष्य की दृष्टि ही है। हालांकि इसमें उनका दोष नहीं है। पिछले चुनाव में उन्होंने राजनीतिक पूंजी नहीं कमाई। कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी के सिर चुनाव में जीत का सेहरा बंधा, किंतु बेहद कठिन परिस्थितियों में भी कांग्रेस की नैया पार लगाने वाली सोनिया गांधी भी इस पूंजी का लाभ नहीं उठा पाईं। सोनिया कांग्रेस को वह दृष्टि नहीं दे पाईं जो इस नाजुक दौर में भारत का कुशल नेतृत्व कर सके। खेद की बात यह है कि भारतीयों के पास विकल्प भी नहीं हैं। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा भी नेतृत्व के संकट से जूझ रही है। लोकप्रियता हासिल करने के बाद अनेक मुख्यमंत्री प्रदेश को अपनी जागीर समझने लगते हैं। क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों से भी गया-गुजरा है। दरअसल, आज की पूरी राजनीतिक जमात ही देश की समस्याओं का प्रभावी प्रबंधन करने में अक्षम है। भारत में राजनीतिक प्रतिभा का लोप इस बात से सिद्ध हो जाता है कि देश के बड़े राजनेताओं को उनकी वंश परंपरा से जाना जाता है, जैसे गांधी, सिंधिया, पायलट, यादव आदि। इसके अलावा नरेंद्र मोदी, ठाकरे, मुलायम सिंह, मायावती जैसे राजनेता भी मौजूद हैं, जो भय और चिंताओं से खेलते हैं। कोई हैरानी नहीं कि भारत अपने आदर्शो के लिए फिल्म उद्योग और क्रिकेट खिलाडि़यों की ओर देखता है। आज भारत को ऐसे नेताओं की सख्त आवश्यकता है जो भारत के उ”वल भविष्य का विचार और दृष्टि रखते हों और साथ ही उनमें इन्हें कार्यान्वित करने की क्षमता भी हो। नि:संदेह दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने की तरफ बढ़ रहा भारत ऐसे नेता पैदा कर सकता है जो बड़े सपने देखते हों और उन्हें पूरा करने का दम भी रखते हों। हालांकि, अंतिम जिम्मेदारी आम भारतीयों के ऊपर ही आती है, क्योंकि देश को वैसे ही नेता मिलते हैं जैसा पाने का वह हकदार है। देश के आज के हालात पर इकबाल याद आते हैं-वतन की फिक्र कर नादान, मुसीबत आने वाली है, तेरी बर्बादियों के मशविरे हैं आसमानों में, ना समझोगे तो मिट जाओगे हिंदुस्तान वालो, तेरी दास्तान तक ना रहेगी दास्तानों में। (लेखक किंग्स कॉलेज, लंदन में प्रोफेसर हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
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