Showing posts with label 25 जून 2012. Show all posts
Showing posts with label 25 जून 2012. Show all posts

Saturday, June 30, 2012

मुसीबतों का पावर हाउस


नियति के देवता ने अमेरिका व यूरोप की किस्मत में शायद जब अमीरी के साथ कर्ज लिखा था या अफ्रीका को खनिजों के खजाने के साथ अराजकता की विपत्ति भी बख्शी थी, तो ठीक उसी समय भारत की किस्मत में भी उद्यमिता केसाथ ऊर्जा संकट दर्ज हो गया था। अचरज है कि पिछले दो दशक में भारत के सभी प्रमुख आर्थिक भूकंपों का केंद्र ईधन और बिजली की कमी में मिलता है। मसलन महंगाई की जड़ में महंगी ऊर्जा (पेट्रो उत्पाद व बिजली)! रुपये की तबाही के पीछे भारी ऊर्जा (पेट्रो कोयला) आयात! बजटों की मुसीबत की वजह बिजली बोर्डो के घाटे!, बैंकों के संकट का कारण बिजली कंपनियों की देनदारी! पर्यावरण के मरण के जिम्मेदार डीजल, बिजली और अंतत: ऊर्जा की किल्लत की वजह से ग्रोथ की कुर्बानी! ..ऊर्जा संकट का बड़ा व खतरनाक भंवर अर्थव्यवस्था की सभी ताकतों को एक-एक कर निगल रहा है। कारणों की छोडि़ए, हम तो अब लक्षणों का इलाज भी नहीं कर पा रहे हैं। कितने शिकार 2016 में कच्चा तेल (क्रूड) ही नहीं, बल्कि कोयले की दुनियावी कीमत बढ़ने पर भी हमारा दिल बैठने लगेगा। बारहवीं पंचवर्षीय योजना का मसौदा व ताजा आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि चार साल बाद भारत (246 अरब टन के घरेलू भंडार के बावजूद) अपनी जरूरत का 90 फीसद कोयला आयात करेगा। तब तक तेल की 80 फीसद और गैस की 28 फीसद जरूरत के लिए भी हम आयात पर निर्भर हो चुके होंगे। इस कदर आयात के बाद रुपये के मजबूत होने का मुगालता पालना बेकार है। महंगाई का ताजा जिद्दी दौर भी बिजली कमी की पीठ पर सवार है। पिछले दो साल की महंगाई में सबसे ज्यादा कीमतें बिजली, पेट्रोल की ही बढ़ी हैं। महंगाई के थोक मूल्य सूचकांक में ईधन का हिस्सा पिछले एक साल में 19 से बढ़कर 23 फीसद हो गया। इसमें पेट्रोल हीं नहीं, कोयला और बिजली की बेतहाशा महंगाई भी शामिल है। आयात पर निर्भरता के कारण ईधन व बिजली की महंगाई पर अब हमारा नियंत्रण नहीं रहा है। राज्यों के बजटों पर भी बिजली गिरी है जो पलटकर बैंकों को मार रही है। बिजली क्षेत्र पर सरकारी रिपोर्टे कहती हैं कि करीब एक लाख करोड़ रुपये के घाटे पर बैठी राज्यों की बिजली कंपनियां (ताजा आंकड़ों में) 80 हजार करोड़ रुपये के बैंक कर्ज में डूबी हैं। बिजली बोर्डो के डिफॉल्ट होने का खतरा पुख्ता है, इसलिए बैंक कर्ज देने से तौबा कर चुके हैं। डीजल से पैदा बिजली (जनरेटर) से आबो हवा को नुकसान आंकड़े का मोहताज नहीं है। एक उदाहरण काफी है कि इसी अप्रैल में तमिलनाडु में जब बिजली की कमी करीब 24 फीसद थी तो वहां डीजल की बिक्री 28 फीसद (पेट्रो प्लांनिंग सेल-पेट्रोलियम मंत्रालय) बढ़ गई। इतना सब गंवाने के बावजूद 15 से 17 हजार मेगावाट बिजली की मासिक किल्लत कायम है जो आर्थिक विकास को खा रही है। नीम अंधेरा सत्रह माह में दूसरा मौका है, जब बिजली घरों के पास चार दिन का कोयला बचा और 5 हजार मेगावाट उत्पादन ठप होने वाला है। पिछले साल फरवरी में भी 18 बिजली घरों का यही हाल था। मगर इस घोर संकट के बाद भी प्रधानमंत्री कार्यालय बीते हफ्ते की बैठक में कोल इंडिया को कोयले का उत्पादन बढ़ाने पर राजी नहीं कर पाया। नकदी में देश की सबसे अमीर कंपनी (54,980 करोड़ रुपये) कोल इंडिया 39 करोड़ टन के लक्ष्य के मुकाबले केवल 36 करोड़ टन कोयला निकाल पाती है। नतीजतन, 42 हजार मेगावाट की तैयार परियोजनाएं कोयले की कमी के कारण उत्पादन शुरू नहीं कर पातीं। कोयले की किल्लत के कारण ताप बिजली घरों की उत्पादन क्षमता (प्लांट लोड फैक्टर) 79 से घटकर 74 फीसद रह गई है। कोयला उत्पादन बढ़ाने की राह में पर्यावरण मंत्रालय तनकर खड़ा हो गया। नतीजतन, छह करोड़ टन कोयला उत्पादन की उम्मीद दफन हो गई। अब अगर कोयला आयात हो तो रुपया भुगतेगा और बिजली न बने तो जनता। इस सबकेबावजूद कोई निजी कंपनी विदेश से कोयला लाकर बिजली बनाना चाहे तो उसे निरंतर घाटे के लिए तैयार रहना होगा। बिजली कीमतें सियासतपरस्त हैं। हर बिजली कंपनी 80 पैसे से 1.93 रुपये प्रति यूनिट का नुकसान उठाती हैं। एनटीपीसी का हाल नहीं सुना आपने! देश की इस सबसे बड़ी बिजली कंपनी का मुनाफा केवल एक फीसद (2010-11) बढ़ा। बिजली क्षेत्र में पहले उत्पादन क्षमताओं में निवेश की कमी थी, कुछ निवेश आया तो कोयले की कमी पड़ गई। इसलिए देश में बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने की मंजिल कभी नहीं मिलती। इस मार्च में निपटी ग्याहरवीं योजना में 78,700 मेगावाट की उत्पादन क्षमता जुड़नी थी। बीच योजना में लक्ष्य घटाकर 62,374 मेगावाट किया गया। अंतत: केवल 46 हजार मेगावाट की क्षमता ही तैयार हो सकी। अब जिसे जरूरत होगी वह सस्ते डीजल से जनरेटर दौड़ाएगा। पिछले एक दशक की ग्रोथ का बहुत बड़ा हिस्सा इसी डीजल बिजली से आया है। और डीजल तो सस्ता ही रहेगा क्योंकि प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति भवन में विराजने के बाद भी कई चुनाव आने हैं। दरअसल, भारत में पेट्रो उत्पादों की मांग में कमी और बिजली की आपूर्ति बढ़ोतरी की जरूरत है। मगर ऊर्जा क्षेत्र में नीतियों का तमाशा तो देखिए, डीजल व डीजल की कारों की कीमत कम और बिजली की कमी बनाए रख पेट्रो उत्पादों की मांग बढ़ाई जाती है। जबकि बिजली की मांग को घटाने के लिए शाम को बाजार बंद (उत्तर प्रदेश) कराने जैसे अहमक फैसले होते हैं। कुछ नीतियां या क्षेत्र शायद बुनियादी रूप से बदकिस्मत होते हैं। भारत में बहुत कुछ बदल गया, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र शायद अकेला नमूना है जहां सब्सिडी, सियासतपरस्त नीतियां, नौकरशाही, भ्रष्टाचार, सार्वजनिक उपक्रमों का एकाधिकार आदि सभी पुराने आर्थिक धतकरम बेखटके धमाचौकड़ी करते हैं। पेट्रो कीमत और बिजली सुधारों की शुरुआत को दो दशक बीत रहे हैं, मगर सारी समस्याएं जस की तस हैं। भरोसा करना मुश्किल है कि दुनिया की आर्थिक ताकतों में शुमार होने को बेताब एक मुल्क सिर्फ ऊर्जा नीतियों की विफलता के कारण विदेशी मुद्रा की कमी और महंगाई से लेकर बैंकों के कर्ज तक, इतने बहुआयामी संकट पाल रहा है। उद्यमिता केधनी भारत को बड़ा बनने के लिए बहुत बड़े सुधारों की जरूरत नहीं है और डूबने के लिए बहुत जटिल संकट भी नहीं चाहिए। सिर्फ चौबीस घंटे की बिजली हमें तरक्की की रोशनी दे सकती है और ऊर्जा की किल्लत का नीम अंधेरा हमें किसी भी सीमा तक डुबा सकता है। कहीं इतिहास यह न लिखे कि डेढ़ अरब की आबादी के मुल्ककी आर्थिक सुरक्षा सिर्फ इसलिए जोखिम में पड़ गई कि उसके पास बिजली नहीं थी?? ड्डठ्ठह्यद्धह्वद्वड्डठ्ठह्लद्ब2ड्डह्मद्ब@स्त्रद्गद्य.द्भड्डद्दह्मड्डठ्ठ.ष्श्रद्व

मुख्यधारा से भी जोड़ना होगा


अंडमान द्वीप पर बसे दुर्लभ जनजातीय समुदायों में से एक जारवा जनजातियों के संरक्षण के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले दिनों संशोधित विधेयक को मंजूरी दे दी। विधेयक के मुताबिक जारवा आदिवासी सुरक्षित क्षेत्र के आसपास पांच किलोमीटर के दायरे में पर्यटन, अनधिकृत प्रवेश, विडियो या फोटोग्राफी, शिकार, शराब सेवन, ज्वलनशील पदार्थ आदि की पहुंच और किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि पर पूरी तरह पाबंदी होगी। विधेयक के अमल में आने के बाद इस कानून के उल्लंघन पर आरोपी को सात साल तक की कैद और दस हजार रुपये का जुर्माना भी भुगतना होगा। यानी विधेयक में जहां जारवा आदिवासियों की अस्मिता, पहचान, संस्कृति को बचाने और उनकी सुरक्षा पर जोर दिया गया है तो वहीं उनके संरक्षण के लिए कानूनी प्रावधान भी किए गए हैं। दुनिया भर की आदिम जनजातियों और मूल निवासियों की अस्मिता, पहचान, संस्कृति व भाषा वगैरह के संरक्षण और उनके स्वास्थ, शिक्षा व प्राकृतिक संपदाओं की सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने जो घोषणापत्र जारी किया है, उसके पालन के लिए प्रतिबद्ध देशों में भारत भी शामिल है। यही नहीं, भारतीय संविधान भी जनजातियों को यह जमानत देता है कि देश में न सिर्फ उनकी संस्कृति, परंपरा और भाषा सुरक्षित रहेगी, बल्कि उनके अधिकारों की भी रक्षा की जाएगी। इसके लिए सरकार ने बाकायदा कई संवैधानिक प्रावधान भी किए हैं। बावजूद इसके देश में ऐसे कई मामले सामने निकलकर आते रहते हैं, जिसमें सरकार की नाकामी साफ झलकती है। ऐसा ही एक मामला जारवा जनजाति का है। पूरे देश में जारवा आदिवासी उस वक्त चर्चा में आए, जब इस साल जनवरी में इस समुदाय की स्ति्रयों का नग्न और अर्धनग्न अवस्था में नाचते हुए दिखाने वाला एक वीडियो मीडिया में आया। वीडियो उन लोगों ने तैयार किया, जो पर्यटन के लिए अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर गए थे। इस वीडियो के सामने आने से पहले भी ऐसी कई शिकायतें आई हैं कि पर्यटक उन्हें खाने-पीने का सामान देकर उनके फोटो खींचते हैं और वीडियो बनाते हैं। इस कृत्य में उनकी मदद स्थानीय टूर ऑपरेटर करते हैं। विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए ये टूर ऑपरेटर उनके सामने जारवा आदिवासियों को अजूबे की तरह पेश करते हैं। मानो जारवा आदिवासी इंसान नहीं, महज मनोरंजन की कोई वस्तु हों। प्रोटेक्शन ऑफ ऐबओरिजिनल ट्राइब रेगुलेशन-1956 के तहत हालांकि इस तरह की हरकतें पूरी तरह निषिद्ध हैं। यही नहीं, साल 2001 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी अंडमान निकोबार प्रशासन को आदेश दिया था कि इन आदिम जनजातियों को उनके क्षेत्र में अतिक्रमण और अनावश्यक संपर्क से सुरक्षित रखा जाए, लेकिन फिर भी इन क्षेत्रों में ये गैर कानूनी और गैर इंसानी गतिविधियां बराबर चलती रहीं। क्षेत्र में नियम का उल्लंघन बढ़ता ही गया। प्रशासन की अनदेखी और लापरवाही से मानव सफारी का यह घृणित कारोबार बिना रोक-टोक जारी रहा। बेयरफुट नामक एक पर्यटक कंपनी ने तो हद ही कर दी। साल 2006 में सारे कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर उसने जारवा जनजाति के सुरक्षित क्षेत्र से महज तीन किलोमीटर दूरी पर एक रिसॉर्ट भी बना लिया। बहरहाल, जब ये सारी खबरें मीडिया में आई तो सरकार को देश-दुनिया में काफी शर्मिदगी झेलनी पड़ी। एक तरफ सरकार पर ये इल्जाम लगे कि आजादी के छह दशक बाद भी वह जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा में नहीं ला पाई है तो दूसरी तरफ कानूनी संरक्षण के बाद भी वह इन जनजातीय समुदायों का शोषण नहीं रोक पा रही है। यही वजह है कि भविष्य में जारवा समुदाय के ऐसे इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने अब सख्ती बरतने का फैसला किया है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह (आदिवासियों का संरक्षण) संशोधन नियमन-2012 इसी दिशा में उठाया गया, सरकार का एक छोटा-सा कदम है। देर से ही सही, सरकार ने एक उचित पहल की है, लेकिन सिर्फ कानून बनाने से ही सरकार की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। जनजातीय समुदाय मुख्यधारा में आएं, इसके लिए सरकार को विशेष प्रयास करने होंगे। प्रयास उनकी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने के लिए ही नहीं होने चाहिए, बल्कि आधुनिक विकास का उन्हें फायदा मिले, इसकी भी कोशिशें करनी होगी। तभी जाकर इन जनजातीय समुदायों को सही मायने में इंसाफ मिल पाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

एक कानून जारवा के संरक्षण के लिए


लुप्त होने के कगार पर खड़ी जारवा जनजाति को कानूनी संरक्षण मिलने जा रहा है। इस कानून के अमल में आने के बाद जारवा समुदाय नुमाइश और मनोरंजन के जीव नहीं रह जाएंगे। केंद्र सरकार ने इनके लिए अंडमान-निकोबार द्वीप समूह (आदिवासियों का संरक्षण) संशोधन नियमन विधेयक-2012 को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद यह कानून प्रभावशील हो जाएगा। कानून के मुताबिक जारवा आदिवासी सुरक्षित क्षेत्र के आसपास पांच किमी के दायरे में पर्यटन करना अपराध होगा। साथ ही वीडियो या फोटोग्राफी करना भी अनाधिकृत कर दिया गया है। कानून का पालन नहीं करने पर सात साल की सजा और 10 हजार रुपये तक का जुर्माना भी भरना पड़ सकता है। हालांकि निकोबार प्रशासन ने भी इस जनजाति के लिए सुरक्षित क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने वाली एक अधिसूचना जारी की थी, लेकिन कोलकाता हाईकोर्ट ने उसे खारिज कर दिया था, जिसकी अपील सुप्रीमकोर्ट में लंबित है। केंद्रीय कानून बन जाने के बाद इस अधिसूचना का अब कोई महत्व नहीं रह गया है। जारवा जनजाति के संरक्षण के लिए यह कानून बेहद जरूरी था, क्योंकि हमारे समाज की दशा और दिशा अर्थतंत्र तय करने लगे हैं। इसलिए मापदंड तय करने के तरीके बदल गए हैं। यही कारण है कि हम जिन्हें सभ्य और आधुनिक समाज का हिस्सा मानते हैं, वे लोग प्राकृतिक अवस्था में रह रहे लोगों को इंसान मानने के बजाय जंगली जानवर ही मानते हैं। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में रह रहे लुप्तप्राय जारवा जनजाति की महिलाओं को स्वादिष्ट भोजन का लालच देकर सैलानियों के सामने नचाने के कुछ मामले ब्रिटिश अखबारों में छपे थे। इनके नग्न वीडियो भी इंटरनेट का हिस्सा बनाए गए थे, जिन्हें शासन-प्रशासन ने झुठलाने की कवायद की थी। जबकि हकीकत यह थी कि अभयारण्यों में वन्यजीवों को देखने की मंशा की तरह दुर्लभ मानव प्रजातियों को भी देखने की चाह रसूखदारों में पनप रही है। एक विडंबना यह भी है कि जिस सरकारी तंत्र को आदिवासियों की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया है, वही इन्हें लालच देकर नचवाने का काम कर रहे हैं। इसी कुत्सित मानसिकता के चलते जारवाओं को इंसान की बजाए पर्यटक मनोरंजक खिलौने मानकर चलने लगे थे। एक ओर तो हम दया और करुणा जताते हुए सर्कसों और मदारियों द्वारा वन्यजीवों के करतब दिखाए जाने पर अंकुश लगाने की वकालत करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने में मगन निर्वस्त्र जनजातियों को नचाने के लिए मजबूर करते हैं। लंदन के अखबार ने मोबाइल फोन से फिल्माई गई दो फिल्में जारी की थीं। इनमें से एक फिल्म 3.19 मिनट की थी, जिसमें एक पुलिस अधिकारी के सामने नृत्य करती हुई जारवा जाति की अर्धनग्न लड़कियां दिखाई गई थीं। दूसरे वीडियो में सेना की वर्दी पहने बैठे एक व्यक्ति के सामने अन्य जारवा युवतियां नाच रही थीं। अखबार ने दावा किया था कि ये वीडियो नए हैं और इनकी सुरक्षा में लगे अधिकारियों की मिलीभगत से सामने आए हैं। इसके पहले विदेशी सैलानियों के सामने इन महिलाओं को नचाने के जो वीडियो जारी किए गए थे, उनका फिल्मांकन गोपनीय ढंग से इसी अखबार के पत्रकार ने किया था। इस कारण देश में हल्ला मचा और केंद्र सरकार को मजबूरी में इस समुदाय के संरक्षण के लिए कानून बनाना पड़ा। जंगल में अमंगल आधुनिक विकास और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए वन कानूनों में लगातार हो रहे बदलावों के चलते अंडमान में ही नहीं, देश भर की जनजातियों की संख्या लगातार घट रही हैं। आहार और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी होती जा रही है। इन्हीं वजहों के चलते अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में अलग-अलग दुर्गम टापुओं पर जंगलों में समूह बनाकर रहने वाली जनजातियों का अन्य समुदायों और प्रशासन से बहुत सीमित संपर्क है। यही वजह है कि इनकी संख्या घटकर महज 381 रह गई है। एक अन्य टापू पर रहने वाले ग्रेट अंडमानी जनजाति के लोगों की आबादी लगभग 97 है। इन लोगों में प्रतिरोधात्मक क्षमता इतनी कम होती है कि ये एक बार बीमार हुए तो इनका बचना नमुमकिन हो जाता है। एक तय परिवेश में रहने के कारण इन आदिवासियों की त्वचा बेहद संवेदनशील हो गई है। लिहाजा, अगर ये बाहरी लोगों के संपर्क में लंबे समय तक रहते हैं तो ये रोगी हो जाते हैं और उपचार के अभाव में दम तोड़ देते हैं। अब इनकी प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए टीकाकरण और पौष्टिक खुराक देने के उपाय किए जा रहे हैं। करीब एक दशक पहले तक ये लोग पूरी तरह निर्वस्त्र रहते थे, लेकिन सरकारी कोशिशों और इनकी बोली के जानकार दुभाषियों के माध्यम से समझाने पर इन्होंने थोड़े-बहुत कपडे़ पहनने या पत्ते लपेटने शुरू कर दिए हैं। इसीलिए ब्रिटिश अखबार के जरिये जिन विडियो की जानकारी सामने आई है, उनमें जारवा महिलाओं को कपड़े पहने नृत्य करते दिखाया गया था। इस कारण तय हुआ था कि ये वीडियो नए हंै। पूछताछ से खुलासा हुआ था कि ब्रिटिश अखबार के द ऑब्जर्वर के पत्रकार को पोर्टब्लेयर के राजेश व्यास और टैक्सी चालक इनके निवास स्थल तक ले गए थे। वहां इन्होंने स्वादिष्ट भोजन के चंद निवाले डालकर इनसे नृत्य कराया और फिल्मांकन किया। जबकि यह क्षेत्र सुप्रीमकोर्ट और स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार पर्यटन के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित है। इन्हें संपूर्ण संरक्षण देने की दृष्टि से अंडमान ट्रंक रोड को बंद करके समुद्र से ऐसा मार्ग बनाए जाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, जो जारवा संरक्षित क्षेत्र से होकर न गुजरे। जारवा जनजातियों को मनोरंजन के जीव मानकर चलना एक शर्मनाक पहलू था। यह शोषण और अमानवीयता का चरम है। चंद निवालों के लालच में यदि परदेसियों के सामने अर्धनग्न जारवा महिलाएं नाच रही हैं तो विकास का ढिंढोरा पीट रहे देश के लिए लज्जा में डूब मरने की बात है। क्योंकि ये भोले और मासूम जारवा नहीं जानते कि कथित रूप से सभ्य मानी जाने वाले दुनिया में नग्नता बिकती है, लेकिन इसके ठीक विपरीत जो लोग धन का लालच देकर इनकी नग्नता के दृश्य कैमरे में कैद करते हैं, वे जरूर अच्छी तरह से जानते हैं कि यह नग्नता उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान की टीआरपी बढ़ाने की सस्ती और जुगुप्सा जगाने वाली अचरज भरी विडियो क्लीपिंग है। इस लिहाज से जन्मजात अवस्था में रह रहे जारवाओं की मासूमियत को बेचने के गुनाहों पर इस कानून के अमल में आने के बाद अंकुश लगने की उम्मीद है। इसी तरह का एक मामला ओडिशा के प्राचीन आदिवासियों को लेकर भी सामने आया है। इन्हें भी एक सफारी में सैलानियों के सामने नचाया गया था। सभ्यता की परिधि से दूर हम हालांकि हमारे देश के सांस्कृतिक परिवेश में नग्नता कभी अश्लीलता का पर्याय नहीं रही। पाश्चात्य मूल्यों और भौतिकवादी आधुनिकता ने ही प्राकृतिक व स्वाभाविक नग्नता को दमित काम वासना की पृष्ठभूमि में रेखांकित किया। वरना, हमारे यहां तो खजुराहों, कोणार्क और कामसूत्र जैसे नितांत व मौलिक रचनाधर्मिता से स्पष्ट होता है कि एक राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में हम कितनी व्यापक मानसिक दृष्टि से परिपक्व लोग थे। लेकिन कालांतर में विदेशी आक्रांताओं के शासन और उनकी संकीर्ण कार्य-प्रणाली ने हमारी सोच को बदला और नैसर्गिक नग्नता फूहड़ सेक्स का उत्तेजक हिस्सा बन गई। इसीलिए कहना पड़ता है कि कथित रूप से हम आधुनिक भले ही हो गए हों, लेकिन सभ्यता की परिधि में आना अभी बाकी है। वरना, जो आदिम जातियां प्रकृति से संस्कार व आहार ग्रहण कर अपना जीवन-यापन कर रही हैं, उन्हें मानव मानने की बाजाय चिंपाजियों जैसे रसरंजक वन्य प्राणी मानकर नहीं चलते और न ही भोजन के चंद टुकडे़ डालकर उन्हें बंदर या भालुओं की तरह नाचने को बाध्य करते? और न ही इनके जीवन में बाहरी दखल को रोकने के लिए किसी कानून की जरूरत पड़ती? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

जोखिम भरी राह पर नीतीश


राष्ट्रपति चुनावों को लेकर पिछले सप्ताह राजग में मचे घमासान को देखकर निश्चित तौर पर कांग्रेस की बांछे खिल गईं। इस हद तक कि संप्रग-3 की बातें भी होने लगी हैं। कांग्रेस की यह खुशी एक हद तक जायज भी है। कुछ समय पहले राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी और एपीजे कलाम के बीच कांटे की टक्कर की संभावना जताई जा रही थी, जो अब एकतरफा मुकाबले में बदल गई है। पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने घोषणा कर दी है कि वह राष्ट्रपति बनने की दौड़ में शामिल नहीं हैं। संप्रग को ममता बनर्जी के विद्रोह से जितना नुकसान हुआ है उससे अधिक लाभ समाजवादी पार्टी, शिवसेना, तेलगूदेशम पार्टी, माकपा और इन सबसे बढ़कर जनता दल (यू) के समर्थन से हो गया है। संप्रग उम्मीदवार को अब कितना समर्थन हासिल हो गया है, यह महज अटकलबाजी ही रह गई है। हालांकि हकीकत यह है कि अब कांग्रेस के प्रबंधक नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर जदयू और भाजपा में छिड़ने वाली जंग और परिणामस्वरूप नीतीश कुमार के राजग से बाहर आने की संभावनाओं पर उम्मीद लगा बैठे हैं। जदयू के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने आर्थिक संकट का सामना करने में संप्रग सरकार की जिस तरह सराहना की उससे इसकी अटकलें अचानक तेज हो गई हैं। नरेंद्र मोदी पर नीतीश कुमार के हमले के बाद अब ऐसी चर्चाएं शुरू हो गई हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री या तो समाजवादी पार्टी की राह पर चलने की सोच रहे हैं और खुद को कांग्रेस के सबसे बड़े सहारे के रूप में तैयार कर रहे हैं। दूसरा विकल्प यह है कि वह नवीन पटनायक का अनुसरण कर रहे हैं और खुद को स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्ति के रूप में तैयार कर रहे हैं, जिसका किसी भी राष्ट्रीय गठबंदन से जुड़ाव न हो। यह अनिश्चितता अच्छा संकेत नहीं है। पिछले दिनों नीतीश कुमार ने भाजपा नेतृत्व को स्पष्ट कर दिया था कि अगर 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया जाता है तो वह राजग से बाहर हो जाएंगे। इस मुद्दे को उन्होंने तब उठाया जब पिछले माह बिहार में जातीय राजनीति पर मोदी के मामूली से बयान पर उन्होंने हड़कंप मचा दिया। दरअसल, मोदी के निशाने पर नीतीश नहीं लालू प्रसाद यादव थे। इसके अलावा एक पत्रिका में नीतीश कुमार के खिलाफ लेख छपने पर भी मुद्दे ने तूल पकड़ा। पत्रिका के इस अंक में गुजरात सरकार का विज्ञापन छपा था। संक्षेप में, हमला बोलने में पहल नीतीश कुमार ने ही की। मोदी प्रोजेक्ट पर नीतीश कुमार द्वारा अपनी नाखुशी प्रकट करना अपनी जगह सही हो सकता है, किंतु ऐसा नहीं है कि इस कारण ही नीतीश ने राष्ट्रपति चुनाव पर राजग से अलग राह पकड़ी हो। आखिरकार, पीए संगमा को भाजपा ने एकतरफा उम्मीदवार नहीं चुना। वह अन्नाद्रमुक और बीजू जनता दल की पसंद थे। पिछले सप्ताह नवीन पटनायक ने संगमा को समर्थन देने के मुद्दे पर नीतीश कुमार से बात की थी। खबर है कि नीतीश कुमार ने पटनायक की बात पलटने का कोई ठोस कारण नहीं दिया। यह भी समझा जा सकता है कि नीतीश कुमार कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने के मुद्दे पर शरद यादव को भी पूरी तरह राजी नहीं कर पाए थे। इस अटकल में भी दम नहीं है कि नीतीश कुमार ने केंद्र को बिहार के लिए विशेष पैकेज देने पर राजी करने के बाद ही प्रणब मुखर्जी के समर्थन की घोषणा की है। बिहार को विशेष पैकेज की अटकलों में इसलिए दम नहीं है क्योंकि पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की अनदेखी करते हुए बिहार के लिए पैकेज देने में संप्रग न तो राजनीतिक रूप से सक्षम है और न ही आर्थिक रूप से। जी-20 शिखर सम्मेलन में मनमोहन सिंह के बयान से यह स्पष्ट हो जाता है कि राजकोषीय घाटे को काबू में करने के लिए सरकार अपने खर्चो पर अंकुश लगाना चाहती है। अगर केंद्र ने नीतीश कुमार से विशेष पैकेज का वादा किया भी है तो वह खुद भी जानते हैं कि उसमें कोई वजन नहीं है। इस स्थिति में कांग्रेस की तरफ से वचन दिया जाना ऐसा ही है जैसे एक लड़खड़ाते हुए बैंक के पोस्ट डेटेड चेक दे दिए जाएं। सही सोच रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस प्रकार की योजनाओं पर सहमत नहीं होगा। इसके अलावा आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बसपा के कुछ नेताओं के खिलाफ सीबीआइ के दबाव की रणनीति नीतीश कुमार के मामले में लागू नहीं हो सकती। वर्तमान हालात में कांग्रेस विरोधी ब्लॉक से नाता तोड़कर प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने में (वह भी तब जब उन पर हार का कोई खतरा नहीं है) कतई राजनीतिक समझदारी नहीं है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के खिलाफ चेतावनी जारी कर नीतीश कुमार उन भाजपा नेताओं को खुश कर रहे थे जिनके साथ उनके बेहतर संबंध हैं। उन नेताओं द्वारा नीतीश कुमार के विचारों पर ध्यान देने से मिलने वाले लाभ पर कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन देने की वजह से पानी पड़ गया। इससे न केवल नीतीश का बेदाग कांग्रेस विरोध रिकॉर्ड कलंकित हो गया, बल्कि उन्होंने जयललिता, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी और प्रकाश सिंह बादल जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के बीच अपना भरोसा भी गंवा दिया। एक समय था जब नीतीश कुमार को 2014 के आम चुनाव मेंखंडित जनादेश की स्थिति में भारतीय जनता पार्टी और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच प्रधानमंत्री पद के गंभीर दावेदार के रूप में देखा जाता था। इसमें संदेह नहीं कि उन्हें सिद्धांतवादी, भरोसेमंद और स्पष्ट छवि का राजनेता माना जाता है। समझ से परे है कि इस अकेले फैसले से उन्होंने अकारण ही खुद को मुलायम सिंह यादव की श्रेणी में क्यों ला खड़ा किया? वास्तव में राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर शेष राजग से अलग चलने के गंभीर दुष्परिणाम निकलेंगे। आधी रात को रहस्यमयी मुलाकात के बाद मुलायम सिंह की पलटी और नीतीश कुमार के इस फैसले से संघीय मोर्चे की उम्मीदों को झटका लगा है, जिस पर अगले आम चुनाव में बड़ी उम्मीदें बंधी थीं। क्षेत्रीय खिलाडि़यों की प्रासंगिकता बनी होने के बावजूद अब संप्रग और राजग में सीधे टकराव की संभावना बढ़ गई हैं। स्पष्ट जनादेश को तरस रहे भारत के लिए यह इतनी बुरी बात भी नहीं होगी। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे