Wednesday, May 25, 2011

जनहित में जातिवार जनगणना!


लंबे समय से सामाजिक न्याय की मुहिम से जुड़े लोगों की यह मांग रही है कि जनगणना में जाति को शामिल किया जाए ताकि भविष्य में किसी भी किस्म के एफर्मेटिव एक्शन कार्यक्रम के लिए हमें 1931 की तरफ न लौटना पड़े, जब आखिरी बार इस कारक को शामिल किया गया था। पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल ने समूची आबादी के आर्थिक, एवं सामाजिक-जातिगत और धार्मिक आधार पर राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण की योजना को हरी झंडी दी। बताया गया कि यह सर्वेक्षण अपने ढंग का पहला अध्ययन होगा, जिसमें अतीत के तौर-तरीकों से परे जाने की कोशिश होगी। इसमें कोई दोराय नहीं कि सामाजिक-आर्थिक वंचना को कम करने व नीति-निर्धारण के सवाल के लिए जरूरी है कि इस वंचना के उद्भव, विस्तार और दीर्घजीविता के बारे में हम विधिवत ज्ञान से लैस हों। खालिस वंचना को जानने के लिए हम पहले गरीबी को नापते हैं, जो आय या उपभोग के स्तर को जानकर तय की जा सकती है। हाल के दिनों में यह कोशिश की जाती रही है कि वंचना के पैमानों का एक आयामी नहीं, बल्कि बहुआयामी मापन किया जाए। निश्चित ही यह बहुत आसान काम नहीं रहा है। कुछ लोगों ने नोबेल पुरस्कार विजेता अम‌र्त्य सेन के विचारों को आधार बनाकर इस दिशा में कोशिश की है, जहां लोगों की क्षमताओं या उनके पास उपलब्ध पसंदगी-नापसंदगी को आधार बनाया गया है। जैसे, स्वच्छ पानी तक पहुंच, सार्वजनिक स्वास्थ्य, ऊर्जा के स्त्रोत, जिंदगी जीने के तरीके आदि। कैबिनेट की इस बैठक में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की सूची को संशोधित करने के लिए सरकार ने गरीबी की परिभाषा पर भी पुनर्विचार किया है। शहरी गरीबों की पड़ताल के लिए समावेशी पैमाने की बात चली है, जिसके तहत रिहाइश, सामाजिक असुरक्षा (निरक्षरता, विकलांगता या महिलाओं की अगुआई में चल रहे घर) और पेशागत असुरक्षा जैसे तीन पैमाने तय किए गए हैं। ग्रामीण इलाकों में गरीबों की पहचान करने के लिए भी वहां की आबादी को तीन श्रेणी में बांटा गया है। सबसे ऊपर ऐसे परिवार जिनके पास फोन, फ्रिज आदि हैं, सबसे नीचे आदिवासी समूह, हाथ से मैला ढोने वाले आदि। इसके अलावा बीच का भी एक तबका तैयार किया गया है, जिनमें से गरीबों की पहचान करने के लिए सात वंचना सूचकांक तय किए गए हैं। अगर वंचना के मापन के अंतर्गत हम दलितों-आदिवासियों के जीवन-विश्व को समझने की कोशिश करें तो नए-नए अध्ययन सामने आते रहे हंै। जो निश्चिम ही प्रस्तावित सर्वेक्षण के लिए मददगार साबित हो सकते हैं। पिछले साल चंद्रभान प्रसाद, देवेश कपूर आदि द्वारा प्रस्तुत एक अन्य रिसर्च पेपर रिथिंकिंग इनइक्वालिटी: दलित्स इन यूपी इन द मार्केट रिफार्म एरा में 1990 में सामने आई लगभग दलित क्रांति की चर्चा की गई है। आय के पैमानों पर सबसे नीचले पायदान पर स्थित होने के बावजूद अध्ययन इस हकीकत को उजागर करता है कि किस तरह आर्थिक एवं सामाजिक संदर्भो में उनकी जिंदगी में बदलाव आए हैं। उत्तर प्रदेश के सापेक्षत: विकसित इलाके (खुर्जा) और पिछड़े इलाकों में से एक अग्रणी (बिलरियागंज) पर केंद्रित इस अध्ययन में दलितों के जीवनस्तर में आ रहे बदलावों को उपभोग के सामानों के बढ़ते इस्तेमाल, उनकी रिहाइशों में पक्के मकानों, बिजली का बढ़ता इस्तेमाल आदि के जरिए नजर डालने की कोशिश की गई है। अपनी एक किताब दलित्स इन इंडिया: सर्च फॉर ए कॉमन डेस्टिनी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रोफेसर सुखदेव थोराट वर्ष 2007 के आंकड़ों की बुनियाद पर बताते हैं कि किस तरह ग्रामीण इलाके की 17 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी अब जमीन की काश्तकारी में लगी है, ग्रामीण क्षेत्रों के 12 फीसदी एवं शहरी इलाकों के 28 फीसदी लोग व्यापार में हैं, उनमें साक्षरता दर 57 फीसदी तक पहुंची है या सरकारी नौकरियों में उनका अनुपात बढ़ रहा है। बहरहाल, इन नए अध्ययनों के बरअक्स हाल ही में एक अन्य अध्ययन भी सामने आया है, जो दरअसल पुरानी प्रमेयों को ही नए सिरे से स्थापित करता है और बताता है कि किस तरह भारतीय संदर्भ में जाति और वर्ग की पहचानें आज भी परस्पर व्याप्त हैं और दलित या आदिवासी की सामाजिक पहचान ही विभिन्न किस्म की वंचनाओं को जन्म देती है, एक तरह से आर्थिक विवंचना सामाजिक पहचान पर निर्भर होती है। ध्यान देने लायक है कि गरीबी रेखा के नीचे खड़े लोगों को चिह्नित करने के लिए विभिन्न राज्यों में फैले 166 गांवों से प्रातिनिधिक सैंपल हासिल कर इस सर्वेक्षण को अंजाम दिया गया है। इस पायलट सर्वेक्षण के अंतरिम नतीजे बताते हैं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग जो कुल आबादी में भले ही 22 फीसदी हों, मगर ग्रामीण इलाकों में गरीब, वंचित घरों के आधा हैं। सर्वेक्षण बताता है कि गैर-गरीब घरों में अर्थात नॉनपूअर हाउसहोल्ड्स में दलित आदिवासियों का अनुपात महज 25 फीसदी है, जो विभिन्न स्तरों पर यानी उनकी बहुआयामी वंचना को उजागर करता है, चाहे आवास का मामला हो, निरक्षरता का, बेघरों, मुफलिसी आदि का प्रश्न हो। आबादी के 22 फीसदी हिस्से के आधे से अधिक का गरीबी की श्रेणी में आना जहां गरीबी संबंधी पहले से मौजूद आंकड़ों के साथ मेल खाता है, वहीं यह भी आश्चर्यजनक है कि यह स्थिति आज तक बनी हुई है। पता चला है कि योजना आयोग के सदस्य मिहिर शाह और ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा विकसित की गई पद्धति के आधार पर इन प्रायोगिक सर्वेक्षण के नतीजों को मद्देनजर रखते हुए एक व्यापक सर्वेक्षण को अंजाम दिया जाएगा। गरीबी रेखा के नीचे आने वाले लोगों को चिह्नित करने के लिए किया जाने वाला प्रस्तावित सर्वेक्षण अहम है, क्योंकि इसी आधार पर सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभान्वितों की सूची तय की जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


No comments:

Post a Comment