डॉ. अंबेडकर ने दलित होने की एक ही कसौटी बनाई थी और वह है-अछूत होना। हिन्दू समाज में जिन जातियों को अछूत माना जाता है, वे ही दलित माने जाते हैं। इस परिभाषा के अनुसार सफाई कामगार सबसे ज्यादा दलित हैं। ऐतिहासिक रूप से उनका काम मल को शौचालय से निकाल कर दूसरी जगह ले जाना रहा है। जहां-जहां पानी बहाने वाले शौचालय नहीं हैं। वहां-वहां अब भी सफाई का यह काम सफाई कामगार ही करते हैं। नगरपालिकाओं में भी सफाई का काम इन्हीं के जिम्मे हैं। अस्पतालों तथा बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों में शौचालयों को साफ रखने की जिम्मेदारी इन्हीं पर है। इस वर्ग की स्थिति इतनी दयनीय रही है कि दलितों के दूसरे वर्गों को, जो अपेक्षाकृत कम बुरी स्थिति में हैं, सबसे पहले इन्हीं के लिए लड़ना चाहिए था। दलित नेतृत्व ने सफाई कामगारों को अपने साथ जोड़ा ही नहीं। अत: इन्हें अपना संगठन अलग से बनाना पड़ा। सफाई कामगार समुदाय के तेजस्वी नेता दर्शन ‘रत्न’ रावण आम दलित नेताओं से अलग हैं। रावण जी का काम मुख्य रूप से पंजाब के जालंधर जिले में है पर देश के अधिकांश भागों में उनका नेटवर्क है। रावण जी को कई साल पहले दिल्ली में आयोजित सफाई कामगार सम्मेलन में सिर्फ एक बार सुना है। तब मैंने सोचा था कि नाम रावण है तो विचार भी उतने ही उग्र होंगे लेकिन उनका व्याख्यान एकदम अलग तरह का था। वे न किसी नेता की तरह बोल रहे थे, न किसी लेखक की तरह। पेशेवर वक्ता की तर्ज पर तो कतई नहीं थी। जो कुछ सुनाई पड़ रहा था, वह सीधे उनके हृदय से आ रहा था। इस हृदय में दर्द था, अकुलाहट थी। लेकिन वैसे ही जैसे किसी संत की वाणी में होती है। दर्द सख्त हो कर चट्टान बन गया था। तब भी हृदय करु णा से ओतप्रोत था। दिनों के बाद मुझे सच्ची धार्मिंकता के दर्शन हुए। रावण जी जैसे-जैसे बोलते गए, मेरा सिर उनके चरणों में झुकता गया। नाम रावण है पर बोल वे राम की तरह रहे थे। हाल में मेरे मित्र योगेद्र यादव ने मुझे रावण जी की किताब दी ‘अंबेडकर से विमुख सफाई कामगार समाज : उपेक्षित, कारण और मुक्ति’। सफाई कामगार समुदाय की पीड़ा को समझने के लिए हर एक को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। यह पुस्तक रावण जी ने ‘उन तमाम मांओं को’ समर्पित की है ‘जिन्होंने अपने सिरों पर मल-मूत्र ढोया।’ वे अपनी मां के बारे में लिखते हैं,‘मेरी मां ! नाम कान्ता। शब्दकोश में अर्थ देखा। लिखा है, सुंदर औरत। मां..हर किसी को अपनी मां ही सबसे सुंदर लगती है। मगर कैसे बयान करूं, उस मां की सुंदरता ? उसके रंग-रूप, नयन-नक्श के बारे में लिखूं या सुबह चार बजे उठती उस मां के बारे में कहूं जो पहले जानवरों (गाय-भैंस) का गंद (गोबर) उठा कर घर लाती और उसके बाद इनसानों का मल-मूत्र अपने सिर पर ढोने चल पड़ती, उसके किस रूप को उतारूं इन बेजान कागजों पर? किन आंखों के आगे रखूं? जिन्हें न तो मां का जबरी मुस्कराता चेहरा दिखाई देता है, न मां के सिर पर रखी टोकरी तिरस्कार लगती है।
रावण जी के विवेचन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि सफाई कामगार समुदाय की दुर्दशा के लिए वे जहां कांग्रेस नेतृत्व और सफाई कामगारों के स्वयंभू नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हैं, वहीं सफाई कामगार समुदाय की कमियों और बुराइयों को भी नहीं बख्शते। कोई भी सच्चा शुभचिंतक सबसे पहले हमारा चरित्र निर्माण करना चाहता है, ताकि हम अपनी लड़ाई पूरी सामथ्र्य से लड़ सकें। इसीलिए सफाई कामगारों की मुक्ति के लिए रावण जी उन्हें अपनी रूढ़ियों, व्यसनों तथा फिजूलखर्चियों से मुक्त होने की प्रेरणा बराबर देते रहते हैं। उनके प्रयत्नों से सैकड़ों लोगों के जीवन में परिवर्तन भी आया है। कुछ उदाहरण विचार करने लायक हैं। रावण जी बताते हैं, ‘कश्मीर में आतंकियों की गोली से इतने जवान शहीद नहीं होते जितने सीवर में घुट कर या उसकी बीमारियों को ले कर सफाईकर्मी मर जाते हैं। 22,327 सीवरमेन हर साल सीवर में दम घुटने से मर जाते हैं। अकेले मुंबई में हर साल 350 लोग सीवर में दम घुटने से मर जाते हैं।’ इसके बाद करवा चौथ जैसी रूढ़ियों पर फटकार ‘इसके बावजूद ब्राह्मण के फैलाए ढोंग में फंस कर सफाई कामगार समाज की औरतें निरंतर करवा चौथ व आहोई का व्रत रख रही हैं ताकि उनके पतियों की उम्र लंबी हो जाए जबकि इन बेचारों के कदम लगातार मृत्युपर्यंत (गंदा नाला) की तरफ बढ़ते हैं। कोई देवी-देवता या पीर इनके नरक को नहीं रोक पाया।
दलितों के अन्य समूहों में शिक्षा के प्रति लगन बढ़ी है। फलस्वरूप उनके बच्चे अच्छी नौकरियों में जगह पा रहे हैं। लेकिन सफाई कामगार समुदाय ने अभी तक शिक्षा के महत्त्व के नहीं समझा है। रावण लिखते हैं, ‘दूसरा हिस्सा जिसने गांवों से उठ कर शहरों में सफाई कर्मचारी की पक्की नौकरी पा ली। उसका खाना-पीना, पहनावा, रहन- सहन शहरों जैसा हो गया। इसी ने पूरे सफाई कामगार समाज की सूरते- ए-हाल बदलनी थी मगर वह सुविधाओं का गुलाम हो गया। पैसा मिला, तो नए शौक पाल लिए।’ सफाई कामगारों की नई पीढ़ी की आलोचना करते हुए रावण जी ने चार ‘एम’ का जिक्र किया है-मोटरसाइकिल, मोबाइल, मसल और मस्टंडा, जो उन्हें बिगाड़ रहे हैं। जो भी समाज आगे बढ़ना चाहता है तो सबसे पहले वह अपना शुद्धिकरण करता है। इससे उसमें आंतरिक ताकत आती है। यह ताकत लाना उसके बौद्धिक नेतृत्व का काम है। रावण जी यह काम बड़ी तड़प के साथ कर रहे हैं लेकिन दलित नेतृत्व में इसका अभाव दिखाई देता है। दूसरों को कोसते रहने से अच्छा है, अपनी ओर नजर दौड़ाई जाए। इससे दलित समुदाय कमजोर नहीं होगा, मजबूत ही होगा।
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