Sunday, May 1, 2011

क्यों उभरता है युवाओं में आक्रोश


भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन से युवाओं में आक्रोश का उभरना स्वाभाविक है। यह उम्मीद जगाता है कि देश अभी मुर्दा नहीं हुआ है। फिल्म रंग दे बसंती की मेरी कहानी भी मेरे पिछले 50 सालों के आक्रोश का नतीजा है। 1959-60 के दौरान जब मैं स्कूल में था तो हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक दिन घोषणा की कि देश में जो भी भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी पाया जाएगा, उसे नजदीक के टेलीफोन के खंभे से लटका दिया जाएगा। हम उन पर इतना भरोसा करते थे कि अगले दिन स्कूल जाते वक्त रास्ते के सारे टेलीफोन के खंभे देखते हुए गए कि किस खंबे से कौन लटका है, क्योंकि हमें पता था कि हमारे शहर में कौन भ्रष्टाचारी है। मगर सारे खंभे खाली थे और वे आज तक उसी तरह खाली पड़े हैं। दरअसल, इसकी मुख्य वजह है हमारा सिस्टम। इस सिस्टम को मैंने गौर से देखा है, समझा है। यह इतना चालाक है कि वह कई अन्ना हजारे को हजम कर जाएगा और डकार भी नहीं लेगा। हरेक राजनीतिक पार्टी में आजकल वकीलों की भरमार का यदि कारण खोजा जाए तो इनकी उपस्थिति इसीलिए होती है ताकि अन्ना जैसों के आंदोलन को दबाया और मिटाया जा सके। यह सिस्टम इतना चालाक है कि उसने अपने अंदर एक सेफ्टी वॉल्व बना रखा है जिसके रास्ते लोकतंत्र के नाम पर कभी-कभी वह हमें अपने गुस्से की भाप निकालने का मौका दे देता है ताकि हमें यह वहम बना रहे कि हम एक लोकतांत्रिक देश और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं और हमें अपनी आवाज बुलंद करने का और आक्रोश व्यक्त करने का पूरा-पूरा हक है। मगर एक बार यदि भाप निकल जाए तो सिस्टम वापस फिर से हावी हो जाता है। कांग्रेस ने करीब 60 साल के अपने शासन में इसका अच्छी तरह अभ्यास कर लिया है, लेकिन दूसरे दलों को अभी इसमें पारंगत होना बाकी है। मैं डरता हूं कि कहीं अन्ना हजारे का यह आंदोलन भी सेफ्टी वॉल्व बनकर न रह जाए। अन्ना के आंदोलन को बदनाम करने की सरकार की जो साजिश है उसके पीछे मंशा कुछ और नहीं, बल्कि यही चाल है। इसके अलावा नेता के मनोविज्ञान को अगर समझें तो पता चल जाएगा कि वह क्यों नहीं चाहते कि इस समस्या का समाधान हो। विचारणीय प्रश्न है कि आखिर हमें नेता की जरूरत पड़ती ही क्यों है? जाहिर है अपनी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए। समस्याएं न हों तो हमें नेता की जरूरत क्यों पड़ेगी और जो खुश है वह नेता के पास क्यों जाएगा? सुखी आदमी को नेता की जरूरत नहीं होती। सिर्फ दुखी आदमी को इसकी जरूरत होती है अपने दुख से छुटकारा पाने के लिए। नेता यह बात बखूबी समझता है। सीधे शब्दों में कहें तो उसका भविष्य हमारे दुखों से बंधा होता है। इसलिए ऊपर से वह यह दिखाने की कोशिश करता रहता है कि वह हमारे दुख दूर करना चाहता है मगर उसकी सारी कोशिश यह होती है कि हमारे दुख किसी न किसी रूप में बने रहें तकि हमें उसकी जरूरत भी बनी रहे। रंग दे बसंती के अंत में भ्रष्ट मंत्री की हत्या को लेकर यह प्रश्न मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि क्या इसका हिंसक होना जरूरी था? इसका जवाब मैं हमेशा गीता के उद्धरण से देता रहा हूं कि समय और परिस्थितियों के अनुसार जो भी उचित हो उसका उपयोग करना चाहिए। हमें सिद्धांतों के किताबी आचरण की बजाय व्यावहारिक आचर-व्यवहार को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए जो कि समय, काल और परिस्थिति पर निर्भर होता है। उदाहरण के तौर पर आज पाकिस्तान या चीन यदि भारत पर अचानक हमला कर दें तो अन्ना हजारे के नारा लगाने या उपवास करने के तरीके से वे वापस नहीं भाग जाएंगे। उनसे निपटने की रणनीति हमें उन्हीं की शैली में अपनानी होगी और उनसे सशस्त्र युद्धकरना होगा। भगवान श्रीराम ने रावण के हाथों कैद सीता माता को छुड़ाने के लिए उपवास का सहारा नहीं लिया और न ही भगवान कृष्ण ने कौरवों के खिलाफ जनांदोलन किया था। उस काल में समय और परिस्थिति का तकाजा थी हिंसा। जब सारे रास्ते बंद हो गए तो हिंसा का ही रास्ता बचा। गांधीजी अंग्रेजों के खिलाफ हिंसा का सहारा नहीं ले सकते थे, क्योंकि अंग्रेज उस भाषा को समझते थे और उसका उत्तर देना बखूबी जानते थे। मगर गांधीजी के अहिंसा के हथियार ने अंग्रेजों को निहत्था कर दिया, क्योंकि इसका अंग्रेजों के पास कोई जवाब नहीं था। 1948 में जब कश्मीर पर पाकिस्तानी कबायलियों ने अचानक हमला कर दिया तो गांधीजी उनके खिलाफ उपवास पर नहीं बैठे, बल्कि वह भारतीय सेना को जीत का आशीर्वाद देने पहुंचे। सोचिए अगर हिटलर से गांधीजी का पाला पड़ा होता तो क्या गांधीजी सफल होते? शायद हिटलर गांधीजी को उपवास पर ही गोली मरवा देता। ब्रिटेन में लोकतंत्र था, इसलिए अंग्रेजों को वहां की जनता का भी डर था। यही वजह थी कि उन्हें गांधीजी के सामने झुकना पड़ा। हिटलर तानाशाह था, उसे किसी का डर नहीं था। इसलिए हिंसा या अहिंसा कोई सनातन मूल्य नहीं है, समय और परिस्थिति के अनुसार उसका उपयोग जायज है। मेरा मानना है कि दौर कोई भी हो जो भी भगत सिंह बनने की जुर्रत करेगा वह मारा जाएगा। पिछले 63 सालों में न जाने कितने युवा अपने ही देश की पुलिस के हाथों मारे गए हैं और न जाने कितने मासूम और निरपराध प्रताडि़त किए गए। मेरी बात तो छोडि़ए, मैं तो एक मामूली सा फिल्म लेखक हूं, विजय तेंदुलकर जैसे बुद्धिजीवी कहते थे कि जब वह किसी नेता को स्टेज पर देखते हैं तो उनका मन करता है कि अगर उनकी जेब में पिस्तौल होती तो वह उसे गोली मार देते। मिस्त्र में लोग हिंसा पर उतर आए आखिर उन्होंने उपवास का सहारा क्यों नहीं लिया? आज लीबिया में क्या हो रहा है? साहिर लुधियानवी की ही पंक्तियां हैं-तुमने जिस खून को मक्ताल में दबाना चाहा, आज वो कूचा-ए-बाजार में आ निकला है,, कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर ..। जैसा कि भगत सिंह ने असेंबली में बम फोड़ने से पहले कहा था, सत्ता जब बहरी हो जाए तो उसके कान खोलने के लिए सिर्फ चिल्लाना काफी नहीं होता, उसके लिए कभी-कभी एक धमाका भी जरूरी होता है। यह सरकार भी इस वहम में नींद ले रही थी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं के आक्र ोश की भाप (अन्ना का आंदोलन) भी हमेशा की तरह थोड़े समय में ही सेफ्टी वॉल्व से बाहर निकल जाएगी, लेकिन जब उसने देखा कि पूरा प्रेशर कूकर ही फटने वाला है तब जाकर उसकी नींद टूटी। हालांकि आशंका अभी भी बरकरार है। दरअसल, सत्ता भ्रष्ट नहीं करती, बल्कि जो भ्रष्ट हैं अक्सर वही सत्ता की तरफ आकर्षित होते हैं। सत्ता अगर भ्रष्ट करती होती तो लाल बहादुर शास्त्री भी भ्रष्ट हो गए होते और सरदार पटेल भी। मगर ऐसा नहीं हुआ। सत्ता इतनी कीमती चीज है कि उसे राजनीतिज्ञों के हाथ में देना ही खतरनाक है। इसे उनके हाथ में देना चाहिए जो उस विषय के जानकार हों, तभी भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं का कोई हल संभव है। (ऋतुराज गुप्ता से बातचीत पर आधारित) (लेखक जानेमाने पटकथा लेखक हैं)


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