केंद्र सरकार ने आखिरकार जाति और धर्म आधारित जनगणना कराने का निर्णय ले ही लिया। यह मसला काफी वक्त से राजनीतिक दलों और सामाजिक दायरों में बहस-मुबाहिसे का विषय बना हुआ था। देश में जाति आधारित जनगणना अंतिम बार 1931 में हुई थी। 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध के साए में इसके तहत महज कुछ व्यक्तिगत जानकारियां ही जुटाई गई और जब आजाद भारत में 1951 में पहली बार जनगणना हुई तो सरकार ने जातिवार जनगणना को गैर जरूरी माना। तब से अब तक हुई जनगणनाओं में जातिवार गिनती को अनावश्यक ही माना जाता रहा है लेकिन इस बार सपा-राजद सरीखे कई दलों ने संसद के भीतर और बाहर सरकार पर लगातार यह दबाव बनाया कि वह जातिगत गणना कराए। इन दलों का तर्क था कि पिछड़े और दलितों की वास्तविक संख्या मालूम पड़ने के बाद उनके लिए विकास कार्यक्रमों को बनाने और उनके अमलीकरण में आसानी होगी। मुख्य विपक्षी दल भाजपा भी इस मुद्दे पर दोनों हाथों में लड्डू रखने के प्रयास में दिखी। हालांकि सरकार ने प्रारंभ में इस मांग को ज्यादा तवज्जो नहीं दी लेकिन राजनीतिक नफा-नुकसान के आकलन के बाद कैबिनेट ने अब इसे मंजूरी दे दी है। कहा जाता है कि जाति हमारे समाज की सचाई है लेकिन नेहरू और लोहिया सरीखे परस्पर विरोधी नेताओं में इस पर मतैक्य रहा कि जातीय पहचान को बढ़ावा देना सामाजिक और राष्ट्रीय एकता के लिए स्वास्थ्यकर नहीं है। लेकिन बाद में, खासकर मंडल आंदोलन के बाद सामाजिक न्याय का मुखौटा लगाकर समाज में जातीय आग्रह, गोलबंदी का चलन तथा जाति आधारित दलों का गठन शुरू हुआ। जाति को जनगणना में शामिल करने का तर्क यह दिया गया कि जातियां हैं तो इनकी गिनती क्यों नहीं? आने वाले दिनों में पता लगेगा कि इसमें जनहित कहां तक है। इतना जरूर है कि अब टिकट बांटने के पहले दलों के पास प्रामाणिक जातिगत आंकड़े अवश्य उपलब्ध होंगे। हालांकि इस क्रम में सरकार का एक अन्य निर्णय तारीफ के काबिल है जिसके तहत वह अब गरीबों की गणना भी कराएगी। देश में अब तक गरीबों की वास्तविक संख्या को लेकर भ्रम की स्थिति रही है। इस पर केंद्र और प्रदेश सरकारों में तो मतभेद रहा ही है, सरकार द्वारा गठित विभिन्न समितियों के निष्कर्ष में भी भारी अंतर रहा है। इसका सीधा असर गरीबों के लिए बनने वाली योजनाओं के निर्माण और उनके क्रियान्वयन पर पड़ता है। सरकार निर्बलों-गरीबों की तादाद की सही जानकारी मिलने का उपयोग कल्याण योजनाओं, सब्सिडी और सबलीकरण के लिए करना चाहती है। खास बात यह भी है कि यह गणना राज्य सरकारें अपने स्तर पर कराएंगी तथा ग्राम पंचायतों को भी इसमें सहयोगी बनाया जाएगा। उम्मीद है कि इसके बाद गरीबों की वास्तविक संख्या को लेकर लंबे समय से जारी भ्रम की स्थिति समाप्त हो जाएगी। अब तक होता यह रहा है कि केंद्र अपने आंकड़ों के आधार पर पीडीएस के तहत राज्यों को गरीबों हेतु खाद्यान्न जारी करता रहा है लेकिन राज्य गरीबों की तादाद अधिक बताकर खाद्य सुरक्षा पर हाथ खड़े कर देते हैं। अंतत: खमियाजा गरीब-भूखे लोग भुगतते हैं। विश्व बैंक ने भी कहा है कि भारत सामाजिक सुरक्षा पर बड़ी धनराशि तो खर्च कर रहा है लेकिन उसके नतीजे बेहतर नहीं हैं। गरीबों को चिह्नित किए जाने के बाद शायद इस मामले में भी हमारा रिकॉर्ड बेहतर हो सके।
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