पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में आखिरकार लोकतंत्र की जीत हुई। मतदाताओं ने आशंकाओं व संदेहों की चिंता न कर आतंक को परास्त कर दिया। छठे व अंतिम चरण में भी लोगों ने निर्भीक होकर मतदान किया, और इरादा स्पष्ट कर दिया कि वे हर हाल में अपने संवैधानिक अधिकार की पूर्ति करेंगे। इसके लिए चुनाव आयोग विशेष रूप से बधाई का पात्र है। चूंकि इस बार आयोग ने वोट देने के लिए पोस्टरों व बैनरों के माध्यम से अभियान चलाया, जिसमें कला-संस्कृति से जुड़े लोग शामिल हुए। इससे लोग वोट देने के प्रति उत्प्रेरित हुए। बंगाल के बारे में वर्षो तक विपक्ष का यह आरोप था कि यहां निष्पक्ष चुनाव नहीं होता है। माकपा वैज्ञानिक ढंग से चुनावी धांधली करती है, और जिसके चलते सत्ता में है। यदि निष्पक्ष चुनाव हो तो यहां पर सत्ता विरोधी लहर व परिवर्तन संभव है। चुनाव नतीजे चाहे जिस किसी के पक्ष में आएं, पर इतना तो जरूर है कि इस बार कम ही लोगों को यह शिकायत करने का मौका मिलेगा कि उन्होंने अपने मत का प्रयोग नहीं किया। इस बार माओवादी और असामाजिक तत्व अपने उद्देश्य में कामयाब नहीं हो सके। इसका प्रमाण यह है कि पिछले विधानसभा चुनाव तक में सत्तापक्ष व विपक्ष ने कई मतदान केन्द्रों पर पुनर्मतदान की मांग की थी, लेकिन इस बार यह शिकायत नहीं सुनी गई। ऐसा इसलिए हुआ कि लोगों ने भय की परवाह नहीं की। चुनाव के पहले तक जो हिंसा थी, वह भी छह चरणों में मतदान के दौरान बहुत कम हो गई। सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त के चलते माओवादियों की एक न चली। आयोग ने प्रत्येक चरण के चुनाव को कड़ी सुरक्षा मुहैया करायी। किंतु, यह भी सच है कि आजादी के 63 वर्षो बाद भी हमें इतनी सुरक्षा की जरूरत है कि एक राज्य के चुनाव में लगभग पचास हजार अर्द्धसैनिक बल तैनात किए जाएं। यह कहीं से उचित नहीं है, और हमें अपनी चेतना से जिम्मेदारी तय करनी होगी कि लोकतंत्र को बचाने के लिए कम से कम किसी के वोट को अन्य कोई न दे। वैसे, बंगाल में फिर साबित हुआ कि मतदाता जागरूक है।
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