देश में भूख व कुपोषण से हो रही मौतों से चिंतित सुप्रीमकोर्ट ने केंद्र सरकार को 50 लाख टन अतिरिक्त अनाज देश के सबसे गरीब 150 जिलों को आवंटित करने का आदेश दिया है। यह आवंटन उसके द्वारा नियुक्त समिति की निगरानी में किया जाएगा। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की याचिका पर यह आदेश देते हुए कोर्ट ने यह भी ताकीद की है कि अब देश में भूख से एक भी मौत नहीं होनी चाहिए। याचिका में पंजाब में भारी मात्रा में खाद्यान्न नष्ट किए जाने की शिकायत की गई थी। सुप्रीमकोर्ट भूख और कुपोषण को लेकर कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छुट्टी होने के बावजूद न केवल याचिका की सुनवाई की, बल्कि सख्त आदेश भी पारित किया। सुप्रीमकोर्ट ने साफ कहा कि हमारी चिंता देश में हो रही भूख से मौतों को लेकर है और हमें नहीं लगता कि इससे ज्यादा कोई और बात हो सकती है। साथ ही कोर्ट का कहना था कि देश में गरीबों के पास इतना पैसा नहीं है कि वे जिंदा रहने के लिए अनाज खरीद सकें। इसीलिए अदालत ने सरकार से न्यायमूर्ति डीपी वाधवा की निगरानी में गर्मी के दौरान इन जिलों के गरीबों और समाज के कमजोर वर्गो को अतिरिक्त अनाज वितरित करने का भी निर्देश दिया है। वधवा समिति केंद्र सरकार के परामर्श से कमजोर वर्ग की पहचान करेगी और लक्षित लाभार्थियों को अन्न वितरित करने की सिफारिश करेगी। इसके अलावा कोर्ट ने वाधवा समिति को 22 जुलाई से पहले रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। यही नहीं, अदालत ने अतिरिक्त अनाज प्राप्त करने वाले इन राज्यों के मुख्य सचिवों को आदेश दिया है कि वह पहले से आवंटित अनाज का वितरण कर लें। इसके बाद अतिरिक्त अनाजों को वितरण गरीबों के बीच किया जाए। इससे पहले भी 10 मई को कोर्ट ने देश में कुपोषण के कारण होने वाली मौतों पर चिंता जाहिर की थी। जिस पर केंद्र सरकार ने कोर्ट से कहा था कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तरह 50 लाख टन अनाज गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को अगामी दो हफ्तों में वितरित कर दिया जाएगा। अत: कोर्ट ने अपने रुख पर कायम रहते हुए कई बार दोहराया कि अगर गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं है या विभिन्न कारणों से अनाज नष्ट हो रहा है तो इसे सस्ती दर पर गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने वाले परिवारों में क्यों नहीं बांट दिया जा रहा है? साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में कुपोषण के कारण हजारों लागों की मौतें हो जाती हैं। हो सकता है यह संख्या तीन हजार भी न हो, लेकिन हमारे देश में तीन लोग भी इस कारण से मरते हैं तो यह चिंता का विषय है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्तमान स्थिति में इसका कोई औचित्य नहीं है कि दस लोगों के परिवार को भी 35 किलो खाद्यान्न वितरण किया जाता है और एक व्यक्ति को भी इतना ही। ऐसे में अकेला व्यक्ति बचे हुए अनाज को अधिक दर पर बेचने की कोशिश बरता है, जबकि दस लोगों को पेट भरने के लिए परिवार के मुखिया को अतिरिक्त अनाज खरीदना पड़ता है। वह भी गैर बीपीएल दरों पर। अत: इस असमानता को दूर करना होगा। हमारे देश में रख-रखाव और भंडारण की पर्याप्त सुविधा न होने से हर साल 50,000 करोड़ से ज्यादा का खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है। जरा साचिए, इतने खाद्यान्न से कितने भूखे लोगों और उनके परिवार का पेट भरा जा सकता है। यह एक ऐसे देश की शर्मसार करने वाली तस्वीर है, जहां आज भी प्रतिदिन 26 करोड़ लोग एक वक्त बिना खाए भूखे सोने के लिए मजबूर हैं। यह सही है कि गरीबों को खाना देने की कई योजनाएं अरसे से हमारे यहां चल रही है। घटी दरों पर खाद्यान्न देने के कार्यक्रम भी होते रहते हैं। कहने के लिए राशन की व्यवस्था भी है, लेकिन इन सबके बावजूद हकीकत यह है कि लोग भूख से मरते हैं। गोदामों में खाद्यान्न हैं, लेकिन वह जरूरमंदों तक नहीं पहुंच पाता। यह सच है कि भारत में जितने गरीब लोग रहते हैं, उसे देखते हुए अनाज का उत्पादन बढ़ाना पड़ेगा और फिर उसकी बर्बादी रोकने के लिए उचित भंडारण की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। एक अनुमान के मुताबिक, हमारे यहां फसल की कटाई से लेकर उसे गोदाम में पहुंचाने तक जितने अनाज की बर्बादी होती है, उतना तो ऑस्ट्रेलिया में फसल की उपज होती है। हालांकि पिछले छह दशक में गरीबी और भुखमरी से लड़ने के लिए हमने काफी प्रयास किया है। फिर भी आज देश गरीबी और भुखमरी से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या सरकार इस दिशा में सकारात्मक प्रयास कर रही है? भले ही सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास हर स्तर पर किए जाते हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि आधुनिकता व भूमंडलीकरण के बावजूद स्थिति में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हो पा रहा है। दूसरी ओर सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि अनाज का वितरण किस तरह से किया जाए। क्योंकि सरकार के पास इस समय गरीबों की संख्या को लेकर कोई ठोस आंकड़ा नहीं है। अब तक इस देश में गरीबों की गणना और गरीबी के आंकड़ों को लेकर जितना विवाद हुआ है, इतना शायद ही विकास के किसी मुद्दे पर हुआ हो। जहां एक ओर देश में गरीबी का हिसाब-किताब योजना आयोग रखता है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण विकास मंत्रालय भी इस संबंध में गुणा-भाग करता रहता है। फिर भी सरकार के ये दोनों हिस्से मिलकर देश को यह नहीं बता पा रहे हैं कि आखिर देश में गरीब कितने हैं? पर अब योजना आयोग ने एक ऐसा विचित्र फरमान जारी किया हुआ है, जिसका कोई तुक नहीं है। उसने राज्यों से साफ कहा है कि गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को 36 फीसदी तक सीमित रखें। बीते महीने सुप्रीमकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इस पर हैरत जताई है। कोर्ट ने साफ कहा कि आयोग का यह निर्देश समझ से परे है। गरीबी रेखा की अधिकतम सीमा इस तरह कैसे तय की जा सकती है? क्या किसी राज्य में युवाओं या बुजुर्गो की अधिकतम संख्या का निर्धारण हो सकता है? अत: कोर्ट ने कहा कि आयोग का काम गरीबी मिटाने का लक्ष्यबद्ध कार्यक्रम बनाना है, लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी दिलचस्पी उस बात में है कि गरीबों की संख्या किस तरह कम करके दिखाई जाए। इस चक्कर में उसने अर्थशास्त्रीय मानदंडों को ताक पर रख दिया है। हालांकि देश के विभिन्न राज्यों के बीच जो अंतर है, वह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में बिहार, झारखंड या छत्तीसगढ़ में गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का अनुपात वही कैसे हो सकता है, जो गुजरात, केरल या कर्नाटक में हो? बेशक देश की आजादी के छह दशक बाद आज भी गरीबी एक गंभीर समस्या बनी हुई है, क्योंकि दुनिया के अधिकांश देशों में गरीबी और भूखमरी की जो स्थिति है, उन देशों की तुलना में भारत की स्थिति तो काफी विकराल है। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रिपोर्ट में हमें मानव जीवन के सूचकांक की कसौटी पर 134वें और ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भूख से लड़ रहे 88 देशों की सूची में भारत को 66वें स्थान पर रखा गया है, जो हमारी हालत दर्शाने के लिए काफी है। इसके साथ ही भुखमरी के कई अन्य आंकड़े भी दर्शाते हैं कि गरीबी के मोर्चे पर हमारी हालत क्या है। अहम प्रश्न यह भी है कि भूख की वजह से होने वाली पीड़ाओं और कुपोषण के अलावा कुछ भयानक नतीजे होते हैं, जैसे शरीर की मानसिक वृद्धि न होना, मस्तिष्क का पूरी तरह से विकास नहीं हो पाना। वहीं बच्चों का वजन उनके उम्र के हिसाब से कम होना इत्यादि कई ऐसे कई दुखद पहलू हैं। आज पांच में से एक भारतीय कुपोषण का शिकार है, जबकि 58 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया के शिकार हैं। वहीं 3 वर्ष से कम आयु के 46 प्रतिशत बच्चों का वजन उनके उम्र के हिसाब से कम है। साफ है कि देश की बहुसंख्य जनता या तो भूखी है या फिर भोजन के नाम पर जो खा रही है, उसे इंसानी भोजन में शुमार नहीं किया जा सकता। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सबको समान ढंग से भोजन मुहैया हो सके। सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में सख्ती तो दिखाई है, लेकिन देखना होगा कि सरकार इसे कितनी गंभीरता से लेती है। क्योंकि महज अन्न की उपलब्धता से लोगों को संतुलित भोजन नहीं मिल पाएगा, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिससे जरूरतमंदों तक अन्न समय रहते पहुंचाया जा सके।
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