वर्ष 2010-11 में अनाज का उत्पादन 232 मिलियन टन होने की उम्मीद में देश के कृषि मंत्री देश से गेहूं निर्यात करने की तैयारी करने लगे हैं। ध्यान देने वाली बात है कि वर्ष 2009-10 में यह उत्पादन महज 218 मिलियन टन ही था। देश में भंडारण की कमी के कारण अनाज के सड़ने की घटनाएं देशवासियों को व्यथित करती ही रहती हैं। ऐसे में कृषि मंत्री देशवासियों के लिए पर्याप्त अनाज की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बजाय गेहूं निर्यात को वरीयता दे रहे हैं। हालांकि आज हमारी राष्ट्रीय आय का 85.4 प्रतिशत गैर कृषि कार्यो से प्राप्त होता है और लगभग 50 प्रतिशत लोग गैर कृषि कार्यो में संलग्न हैं, फिर भी भारत को अब भी यदि कृषि प्रधान देश कहें तो गलत नहीं होगा। आज भी देश की अधिकाधिक जनसंख्या कृषि कार्यो में संलग्न है। चाहे राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान 14.6 प्रतिशत ही रह गया हो, लेकिन अब भी देश के लोगों का पेट भरने के लिए खाद्य पदार्थो की उपलब्धता देश की कृषि से ही होती है। भले ही चंद अमीरों के लिए विदेशी चॉकलेट बाजारों में उपलब्ध है, लेकिन जीवन के लिए आवश्यक सामग्री मसलन गेहूं, चावल, दालें, चीनी, खाद्य तेल, मछली, अंडे, दूध आदि कृषि, पशुपालन से ही प्राप्त होते हैं। देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता पिछले 20 वर्षो में काफी घट गई है और देश में प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता 185 किलो प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष से घटकर मात्र 162 किलोग्राम ही रह गई है। देश खाद्यान्नों के निर्यातक से अब खाद्यान्नों का आयातक बन चुका है, अभी भी देश की अधिकांश खाद्य पदार्थो की आपूर्ति देश की कृषि एवं सहायक गतिविधियों से ही प्राप्त होती है। कृषि की हो रही अनदेखी आज भारत 121 करोड़ लोगों का देश बन चुका है। देश की खाद्यान्नों एवं अन्य खाद्य पदार्थो की आवश्यकता भी बढ़ी है। जरूरत है खाद्य पदार्थो के अधिक उत्पादन, बेहतर रखरखाव और बेहतर वितरण प्रणाली की। देश का किसान कड़ी मेहनत से अधिक पैदावार तो दे सकता है, लेकिन उसके लिए जरूरी है कि देश की सरकार कृषि विकास के लिए आवश्यक नीतियां बनाकर उन्हें लागू करे। दुर्भाग्य का विषय है कि सरकार कृषि की बदहाली के बावजूद उसकी लगातार अनदेखी करती रही है। 90 के दशक में सरकारी बजट का लगभग 27 प्रतिशत कृषि और ग्रामीण विकास पर खर्च होता था, वह अब घटकर लगभग 5 प्रतिशत रह गया है। गेहूं और चावल जैसे जिंसों की खरीद तो सरकारी एजेंसियां करती हैं, लेकिन अधिकतर कृषि उत्पादों के संदर्भ में किसान को बाजारी शक्तियों के हाथों छोड़ दिया जाता है। आर्थिक क्षमता के अभाव और उचित भंडारण की व्यवस्था के अभाव के चलते किसान को उसकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाता। ऐसे में बड़ी बड़ी कंपनियां और बड़े बिचौलिए किसान से कृषि उत्पाद खरीदकर बाद में उसे ऊंची कीमत पर बेचते हैं। ऐसे में उपभोक्ता को तो खाद्य पदार्थो की ऊंची कीमत देनी पड़ती है, लेकिन किसान की गरीबी बदस्तूर जारी रहती है। इस वर्ष भी गेहूं की रिकॉर्ड फसल होने के बाद भी किसान की बदहाली जारी है। अभी किसान भारी मात्रा में अपनी फसल मंडियों में ला रहे हैं और सरकारी एजेंसियों ने खरीद बंद कर दी है। इसके चलते किसान मजबूरी में अपनी फसल को 1000 से 1050 रुपये प्रति क्विंटल के बीच में बेच रहा है, जबकि सरकार का समर्थन मूल्य ही 1170 रुपये प्रति क्विंटल है। जमीन की बर्बादी यही नहीं, 1991 के बाद नई आर्थिक नीति के नाम पर कृषि की अनदेखी हो रही है। सरकारों ने जमीन की बरबादी में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह सही है कि उद्योगों, सॉफ्टवेयर विकास के लिए परिसरों, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों और अन्य आवश्यक गैर कृषि कार्यो के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध होनी चाहिए, लेकिन खेद का विषय यह है कि औद्योगिक और व्यावसायिक विकास के नाम पर कृषियुक्त एवं अत्यंत उपजाऊ भूमि को कृषि कार्यो से हटाकर गैर कृषि कार्यो में लगाया जा रहा है। अभी हाल ही में एक मामला प्रकाश में आया कि उड़ीसा के पुरी क्षेत्र में लगभग 8,000 एकड़ भूमि को एक विश्वविद्यालय के नाम पर आवंटित कर दिया गया। यही नहीं, लाखों एकड़ भूमि देश भर में सात सौ से भी अधिक विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के नाम पर किसानों से प्रत्यक्ष रूप से सरकार द्वारा अधिग्रहित करते हुए या कंपनियों द्वारा खरीदकर किसानों के हाथ से खींची जा चुकी है। ऐसे में देश में मोटे तौर पर कृषि उत्पादन बढ़े भी तो कैसे? लेकिन कभी वर्षा की कमी के कारण कृषि उत्पादन घट जरूर जाता है। राह में रोड़ा भंडारण की समस्या देश में 2010-11 में खाद्यान्न उत्पादन 232 मिलियन टन होने की उम्मीद है। इससे पहले 2009-10 में यह मात्र 218 मिलियन टन ही रह गया था। 2008-09 में यह 235 मिलियन टन था। घटते-बढ़ते खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद अगर हमारी कृषि पदार्थो का रखरखाव यानी भंडारण एवं कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था ठीक हो तो भी हम खाद्यान्नों के उत्पादन में कमी होने पर उसकी आपूर्ति देश से ही कर सकते हैं। लेकिन हाल ही में बड़े पैमाने पर अनाज के सड़ने की घटनाओं के प्रकाश में आने से भारतीय खाद्य निगम के भंडारण की खस्ता हालत की पोल खुल चुकी है। योजना आयोग का कहना है कि देश में भंडारण की सही व्यवस्था कायम करने के लिए 7,689 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत है, लेकिन खेद का विषय यह है कि योजना आयोग इस बाबत राशि जुटाने की बजाय यह सुझाव दे रहा है कि देश में खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को अनुमति दे दी जाए। योजना आयोग का कहना है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी कंपनियां आकर भंडारण की व्यवस्था कराएंगी और कृषि पदार्थो की बर्बादी पर लगाम लगेगा। योजना आयोग शायद यह भूल जाता है कि देश में एक दशक से भी अधिक समय से भंडारण इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विदेशी निवेश को अनुमति है, लेकिन इसके बावजूद विदेशी निवेशकों द्वारा इस क्षेत्र में कोई निवेश नहीं किया गया है। ऐसे में देश के इस महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को विदेशी कंपनियों के रहमो-करम पर नहीं छोड़ा जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस बाबत आवश्यक धनराशि जुटाकर देश में पर्याप्त भंडारण एवं कोल्ड स्टोरेज की सुविधाएं उपलब्ध कराने में सहयोगी बनें। देश में कृषि उत्पादों की भारी कमी के चलते उनका निर्यात कोई समझदारी का कदम नहीं है। देश में हमेशा ही उत्पादन बढ़ने पर उसे सरकार खरीदकर उसका भंडारण करती रही है। तीन वर्ष पहले सरकार ने गेहूं का निर्यात किया था, लेकिन उसके कुछ ही माह के बाद हमें बड़ी मात्रा में घटिया गेहूं का आयात ऊंची कीमतों पर करना पड़ा था। पिछले कुछ समय से भंडारण सुविधाओं की कमी के चलते खाद्यान्नों के सड़ने की बात सामने आ रही है। ऐसे में देश में भंडारण की कमी को दूर करना ही समझदारी है। अनाज का निर्यात करके उसे बाद में ऊंची कीमतों पर विदेशों से आयात करना कोई समझदारी नहीं कही जा सकती। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)
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