Sunday, May 15, 2011

तो अन्ना को तरसेगा देश


अभी पिछले दिनों जिस तरह से हरियाणा की मंडियों में उत्तर प्रदेश के किसानों की गेहूं की फसल के प्रवेश पर वहां के स्थानीय निवासियों द्वारा रोक लगाई गई है, इससे भारतीय कृषि के भविष्य पर चिंताजनक लकीरें खिंच गई हैं। भारत की आधे से अधिक आबादी गावों में बसती है और भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली कृषि का वही केंद्र है। लेकिन खाद्यान्न सुरक्षा का आधार भारतीय कृषि आज कई चुनौतियों का सामना कर रही है। इन चुनौतियों और जोखिम से इसके विकास में बाधा पहुंच रही है। यही कारण है कि कृषि क्षेत्र का विकास लगभग स्थिर है। इसके समग्र और तीव्र विकास के लिए समय-समय पर कुछ सरकारी किए तो किए गए हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस नीति नहीं बनी है। दरअसल, वैश्विक स्तर पर उत्पन्न खाद्यान्न संकट के इस दौर में भारत जैसे कृषि प्रधान देश को इन चुनौतियों से निबटने के लिए अपनी प्रबंधकीय व तकनीकी विशेषज्ञता को सकारात्मक नीति के साथ उपयोग में लाने की भी जरूरत है। वर्तमान में कृषि योग्य भूमि का रकबा घटता जा रहा है। किसानों की जमीन का अधिग्रहण परमाणु संयंत्रों, विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड), कारखानों आदि की स्थापना के लिए हो रहा है। जाहिर है, इससे किसानों की मुश्किलें बढ़ी हैं और पैदावार में कमी आई है। चूंकि कृषि राज्य सूची का मसला है, लिहाजा केंद्रीय योजनाओं को समग्र रूप में लागू करने में अक्सर समस्या पैदा हो जाती है। इसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है। वर्तमान में भू-नीतियों, भूमि खरीद-बिक्री नीतियों में कई खामियों के मौजूद रहने के कारण भी समस्या बढ़ी है। इस समस्या के समाधान के लिए हमें दीर्घकालीन नीतियों के साथ ही लघु नीतियों को अमल में लाना होगा। समग्र रूप में भूमि प्रबंधन कानून को लागू करना होगा, जिसके तहत पुरानी पड़ चुकी भूमि नीतियों में सुधार करने के साथ ही जमीन अधिग्रहण की नीतियों को सामाजिक सरोकारों से जोड़कर आर्थिक विकास का लक्ष्य निर्धारित करने का प्रयास होना चाहिए। जनसंख्या नियंत्रण के उपाय करके हम कृषि योग्य भूमि के बंटवारे की समस्या से निजात पा सकते हैं। उपयुक्त वित्त व्यवस्था के अभाव के कारण ही किसान उच्च ब्याज दरों पर पारंपरिक ऋण व्यवस्था के तहत या साहूकारों से ऋण प्राप्त करते हैं। भारतीय किसानों की ऋण समस्या काफी जटिल है, लेकिन हमें यह सोचना चाहिए कि हम उन्हें ऋण पर ही आश्रित रखें? क्या किसानों को इतना सशक्त नहीं बनाया जा सकता कि उनकी निर्भरता सरकारी अनुदानों और ऋण पर से कम हो या फिर खत्म हो जाए। फसल अच्छी न होने की स्थिति में जब वे ऋण चुका पाने में असमर्थ हो जाते हैं तो कई तरह के दबाव में आकर ही आत्महत्या तक करने का अंतिम विकल्प चुनते हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1997 से 2009 के बीच 2,16500 किसानों ने आत्महत्या की थी। ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए कई किसान खेती छोड़कर अन्य रोजगार या तो हासिल कर चुके हैं या करना चाहते हैं। एक यह भी वजह है कि देश की कुल आय में कृषि क्षेत्र का योगदान घट रहा है। आम किसानों में जागरूकता की कमी और सशक्त कृषि विकास में अनुसंधान का अभाव सकारात्मक परिणाम नहीं दे रहा है। कृषि क्षेत्र में तकनीक और अनुसंधान के जरिए बेहतर पैदावार प्राप्त की जा सकती है। विदेशी अनुसंधानों से निर्मित बीजों के प्रति हमारा अनुभव नकारात्मक रहा है। यहां मिट्टी के अनुरूप फसलों की पैदावार नगण्य है और किसान पारंपरिक बीजों और तरीकों से ही काम चला रहे हैं। प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामीनाथन ने कृषि उपज को दोगुना करने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तकनीक और अनुसंधान पर जोर देने की पहल की है। लेकिन अनुसंधान संस्थाओं और प्रबंधन संस्थाओं की निष्कि्रयता व कृषि क्षेत्र में निवेश की कमी के चलते किसानों के सामने संकट बरकरार है। अनिश्चितताओं से भरे कृषि के क्षेत्र में लोगों की खेती के प्रति अरुचि पैदा हुई है। किसानों में यह धारणा बैठ गई है कि खेती अब लाभ का क्षेत्र नहीं रह गई है। हमें अपनी कुशल प्रबंधकीय क्षमता का परिचय देते हुए ऐसी नीति बनानी होगी, जिससे कृषकों के मन में बैठी इस गलत धारणा को खत्म किया जा सके। हां, सरकार को भी चाहिए कि वह ऐसे कदम उठाए, जिससे किसान कृषि को सिर्फ जीविकोपार्जन का साधन मात्र न समझें और इसे एक संगठित क्षेत्र का रोजगारोन्मुख व्यवसाय मानकर अपनाएं। तभी देश की कृषि और किसानों की तरक्की हो सकती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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