देश के सबसे गरीब 150 जिलों को अतिरिक्त 50 लाख टन खाद्यान्न आवंटित करने के उच्चतम न्यायालय के आदेश पर यह सवाल उठना ही चाहिए कि आखिर उसे केंद्र सरकार को ऐसा निर्देश क्यों देना पड़ा? इसी तरह इस सवाल का जवाब भी खोजा जाना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय ने यह क्यों कहा कि खाद्यान्न का यह आवंटन उसकी ओर से नियुक्त समिति की निगरानी में किया जाए? क्या ये सवाल यह नहीं बताते कि जो काम केंद्र सरकार को करने चाहिए उनके बारे में न्यायपालिका को पहल करनी पड़ रही है? नि:संदेह यह स्वागत योग्य है कि उच्चतम न्यायालय निर्धन एवं कमजोर तबकों की चिंता कर रहा है और इसके लिए उसने एक समिति भी गठित कर रखी है, जिसने सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियों का अध्ययन किया है, लेकिन यह सब कुछ तो केंद्र और राज्यों की सत्ता में बैठे लोगों को करना चाहिए। नि:संदेह न्यायपालिका का यह दायित्व नहीं है कि वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली में व्याप्त खामियों को दूर करे, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों के नाकारापन के कारण उसे निर्धन तबके के हितों की रक्षा के लिए अतिरिक्त परिश्रम करना पड़ रहा है। विडंबना यह है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा केंद्र और राज्य सरकारों को बार-बार चेताने के बावजूद स्थितियों में सुधार होता नहीं दिख रहा। उच्चतम न्यायालय को एक बार फिर यह कहना पड़ा कि केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करे कि भूख से किसी की मौत न होने पाए। उच्चतम न्यायालय ने जिस तरह यह पाया कि खाद्यान्न आवंटन के तौर-तरीके सही नहीं उससे तो यह लगता है कि किसी को इसकी परवाह ही नहीं है कि इस संदर्भ में सुधार के लिए क्या कुछ किया जाना आवश्यक हो चुका है? यदि उच्चतम न्यायालय यह महसूस कर रहा है कि छोटे परिवारों को प्रति माह 35 किलो खाद्यान्न देने की नीति ज्यादा सदस्यों वाले परिवारों पर भारी पड़ रही है तो हमारे नीति-नियंता यह साधारण सी बात क्यों नहीं समझ पा रहे हैं? 150 गरीब जिलों को 50 लाख टन अतिरिक्त खाद्यान्न आवंटित करने का आदेश देते हुए उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर सरकारी गोदामों में सड़ते अनाज की ओर ध्यान दिलाया। अब यह सर्वज्ञात तथ्य है कि सरकारी गोदामों में अनाज भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं और इसके चलते प्रति वर्ष हजारों टन अनाज बर्बाद हो जाता है, लेकिन जब केंद्र सरकार को यह सुझाव दिया जाता है कि वह अनाज को सड़ाने के बजाय गरीबों में मुफ्त बांट दे तो न्यायपालिका को अपनी सीमा में रहने की हिदायत दी जाती है। इससे अधिक लज्जाजनक और क्या होगा कि हजारों टन अनाज सड़ता रहे और फिर भी भुखमरी के मामले सामने आते रहें? भले ही केंद्रीय सत्ता खुद को आम आदमी के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध बताती हो, लेकिन सच्चाई यह है कि यह प्रतिबद्धता नितांत खोखली है और इसका प्रमाण पिछले दिनों योजना आयोग की ओर से उच्चतम न्यायालय में दी गई यह दलील है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 20 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 35 रुपये प्रतिदिन अर्जित करने वाले गरीबी रेखा के नीचे माने जाएंगे। इसका मतलब है कि हमारे नीति-नियंताओं को अकल्पनीय और अस्वाभाविक आंकड़े पेश करने में शर्म भी नहीं महसूस होती। इसके आसार कम ही हैं कि उच्चतम न्यायालय की ओर से केंद्र सरकार को जो हिदायत दी गई उसका कोई सकारात्मक असर उसकी नीतियों में नजर आएगा।
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