महेश परिमल बचपन से सुनता आ रहा हूं, भारत एक कृषि प्रधान देश है! पर देश पर हावी लालफीताशाही ने इसे बरबादी के उस कगार पर पहुंचा दिया है, जहां से वापसी संभव नहीं। हर साल की तरह इस बार भी हमारी शस्य-श्यामला धरती ने गेहूं के रूप में सोना उगला है। इसे हम धरती माता का आभार ही मानें, क्योंकि उसकी रक्षा के लिए हम ऐसा कुछ भी नहीं कर रहे हैं, जिसे उपलब्धि कहा जाए। इसके बाद भी धरती ने हमें पेट भरने के लिए गेहूं के रूप में सोना दिया। पर अच्छी फसल के बावजूद किसान इस लालफीताशाही के आगे बेबस है। गेहूं तो उसने सरकार को बेच दिया, पर सरकार अभी तक उसका भुगतान नहीं कर पा रही है। कई स्थानों पर अभी तक गेहूं को सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं हो पाई है। लगता है इस बार भी देश में लाखों टन अनाज फिर सड़ जाएगा। पिछले साल जब हजारों टन अनाज सड़ गया था, तब सुप्रीमकोर्ट ने केंद्र सरकार को लताड़ लगाई थी कि अगर अनाज को सुरक्षित नहीं रख सकते तो उसे गरीबों में मुफ्त में बांट दो। कोर्ट के इस रवैये से केंद्र सरकार इतनी अधिक नाखुश हुई कि उसने कोर्ट से ही कह दिया कि वह अपने सुझाव अपने तक ही सीमित रखे। आज पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में कमोबेस यही हालत है कि पिछले साल का ही अनाज इतना अधिक है कि इस साल के अनाज को रखने की जगह ही नहीं बची। अनाज का विपुल उत्पादन होने के बाद भी न तो किसानों को अनाज का सही दाम मिल रहा है और न ही नागरिकों को सस्ता अनाज मिल रहा है। अनाज के बारे में केंद्र सरकार की स्पष्ट नीति न होने के कारण आज अनाज सड़कों पर बिखरा है। मौसम न जाने कब बदल जाए, इससे लाखों टन अनाज बरबाद हो सकता है। सरकार भले ही यह कहती रहे कि आवश्यकता पड़ने पर अनाज को खाली स्कूलों में रखा जा सकता है। पर स्कूलों की हालत कितनी अच्छी है, यह किसी से छिपा नहीं है। इसलिए सरकार की यह घोषणा बेमानी साबित होती है। आज देश की अनाज मंडिया अव्यवस्था की शिकार हैं। वहां किसानों के लिए न तो आवश्यक सुविधाएं हैं और न ही किसी प्रकार की छूट। अपनी फसल का पूरा मुआवजा तक समय पर नहीं मिल रहा है। इससे अधिक बदतर स्थिति और क्या हो सकती है। न चाहते हुए भी किसानों को साहूकार से कर्ज लेना पड़ रहा है। वह भी ऊंची ब्याज दरों पर। आखिर क्या कर रही है सरकार? इसी अवस्था में जीते हुए किसान लाचारी में यदि आत्महत्या करने लगें, आंदोलन पर उतारू हो जाएं तो चारों तरफ हाहाकार मच जाता है। पंजाब-हरियाणा से जानकारी है कि वहां मौसम का मिजाज अक्सर बदलता रहता है। इन दिनों शिमला में बारिश हो रही है। ऐसे में वहां की धरती ने जो सोना उगला है, उसका क्या होगा। सरकारी गोदामों की हालत यह है कि उसमें पिछले साल का ही अनाज भरा है। जब तक उसे खाली न किया जाए, तब तक नया अनाज उसमें भरा नहीं जा सकता। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में आज भी अनाज खुले में पड़ा है। ऐसे में प्रकृति का मिजाज बिगड़ गया तो गई भैंस पानी में। अनाज सड़ेगा, वह तो अलग बात है, उससे जो दुर्गध फैलेगी, फिर जो बीमारी फैलेगी, उसका क्या? क्या नई फसल आने के पहले पुरानी फसल का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। क्या हमारे नेता-अधिकारी इतने भी दूरंदेशी नहीं हैं कि अनाज सड़े, उसके पहले ही वह सही हाथों तक पहुंच जाए। हमारे पास अनाज का विपुल भंडार है, उसके बाद भी देश में भुखमरी है। तेल कंपनियों को होने वाले घाटे की चिंता सरकार को सबसे अधिक है। उनकी चिंता में शामिल होते ही सरकार पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ा देती है, पर कृषि प्रधान देश में सरकार किसानों के लिए कभी चिंतित होती है, ऐसा जान नहीं पड़ता। जब देश में गोदाम नहीं हैं तो फिर गोदाम बनाना ही एकमात्र विकल्प है। शर्म आती है कि हम उस देश में रहते हैं, जहां अनाज तो खूब पैदा होता है, लेकिन लोग भूख से भी तड़पते हुए अपनी जान दे देते हैं। यह सब सरकारी अव्यवस्था के कारण है। आखिर गठबंधन सरकार की कुछ मजबूरियां होती हैं। करते रहें किसान आत्महत्या, हमें क्या पड़ी है। बस तेल कंपनियों को कभी किसी तरह का घाटा नहीं होना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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