आज भ्रष्टाचार के मामले को लेकर देश में लोकपाल बिल की मांग जोर पकड़ रही है और अन्ना हजारे के नेतृत्व में जनता आंदोलित है लेकिन बच्चों के व्यापार, उनके शोषण, उत्पीड़न और अन्य मामलों पर निगरानी को लेकर लोकपाल की नियुक्ति की कोई बात नहीं करता। विडंबना यह है कि इस दिशा में आज तक कोई प्रयास ही नहीं हुआ जबकि फिनलैंड, नार्वे, स्वीडन, स्पेन और कोस्टारिका जैसे देशों में इसके लिए अलग से लोकपाल नियुक्त हैं। आज देश में बाल वेश्यावृत्ति का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है और तो और लापता बच्चों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। इस मामले में राजधानी दिल्ली समूचे देश में लापता होने वाले बच्चों के मामले में शीर्ष पर है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की स्थिति इस मामले में और भी खौफनाक है। राजधानी दिल्ली और इससे सटे जिलों यथा गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर खासकर नोएडा की हालत ज्यादा बदतर है। इन इलाकों में बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। निठारी कांड के बावजूद इन जिलों में इन मामलों में कमी नहीं आई है। इसमें सबसे बड़ा कारण पुलिस की उदासीनता, गरीबी और कानून व्यवस्था के साथ-साथ बाल अधिकारों को लेकर जागरूकता का अभाव है। पुलिस भले दावा कुछ भी करे, लेकिन हकीकत यह है कि वह इसे रोक पाने में पूरी तरह नाकाम रही है। मिसिंग परसंस स्क्वाड के आंकड़े इस तथ्य की गवाही देते हैं। दिल्ली से औसतन हर रोज 16 बच्चे गायब हो रहे हैं। मासिक हिसाब से यह आंकड़ा औसतन पांच सौ बच्चों का सालाना है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों की मानें तो राजधानी दिल्ली बच्चों के गायब हाने के मामलों में पहले स्थान पर है। पिछले तीन साल में दिल्ली से लगभग 18 हजार से ज्यादा बच्चे लापता हुए हैं। हालांकि इसमें से करीब 85 फीसदी गुमशुदा बच्चे वापस अपने परिवार के पास लौट आए हैं। इसमें से करीब 15 फीसदी बच्चे खुद ही वापस घर लौट आए हैं, जबकि पुलिस के प्रयास से करीब 70 फीसदी गायब बच्चों की बरामदगी की गई है।। ज्यादातर मामलों में बच्चों को अगवा करने वाले उनके परिचित लोग ही होते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की मानें तो हर साल दिल्ली से तकरीब सात हजार बच्चे गायब हो रहे हैं। लापता बच्चों के मामले में कार्यरत संगठन भले अलग-अलग आंकड़े पेश करें, लेकिन असलियत यह है कि ये सभी आंकड़े पुलिस की सूचना पर ही आधारित हैं। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि पुलिस के पास आने वाले मामलों में 10-12 फीसदी मामलों की ही पुलिस रिपोर्ट दर्ज हो पाती है। पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी बताती हैं कि पुलिस के इस रवैये को लेकर लोग इस कदर हताश हो चुके हैं कि बच्चों की गुमशुदगी के मामले अब पुलिस से ज्यादा चाइल्ड हेल्प लाइन के पास दर्ज कराए जाते हैं। इस दिशा में यदि पुलिस की मानें तो अधिकांश बच्चों के लापता होने के पीछे किसी आपराधिक गैंग का हाथ नहीं है। चूंकि लापता होने वालों में अधिकांश बच्चे स्लम एरिया से संबंध रखते हैं इसलिए इनके गायब होने का एक बड़ा कारण उनका सामाजिक या आर्थिक परिवेश होता है। परिजनों की डांट-फटकार, सही देखभाल न होना और गरीबी के चलते ऐसे बच्चे घर छोड़ने में देरी नहीं लगाते। दूसरी तरफ बच्चों की भलाई के लिए जुटी संस्थाओं का कहना है कि कुछ मामलों में तो बच्चा खुद ही घर से चला जाता है, लेकिन सभी मामलों में यह बात सही नहीं है। बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी का कहना है कि इनके गायब होने के पीछे आपराधिक गिरोह का हाथ होता है। अपनी साख बचाने के लिए पुलिस द्वारा सामाजिक या आर्थिक कारणों की आड़ ली जाती है। पुलिस इस मामले में कोई भी जिम्मेवारी अपने ऊपर नहीं लेना चाहती। पुलिस उपायुक्त अशोक चांद कहते हैं कि अधिकांश मामलों में बच्चों के लापता होने के पीछे उनकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति जिम्मेवार होती है। विगत वर्षो में जो बच्चे बरामद हुए उनके गायब होने के पीछे भी यही वजह रही हैं। पुलिस द्वारा इस तरह के मामलों की जांच आपराधिक नजरिए से की जाती है। अपने दायित्वों के निर्वहन के बारे में एक पुलिस अधिकारी बताते हैं कि पुलिस तमाम पहलूओं का अध्ययन करती है ताकि किसी संगठित गिरोह के हाथ होने का पता चलते ही अपराध शाखा को सूचित किया जा सके। बच्चों का पता लगाने के लिए मिसिंग परसंस स्क्वॉड में पूरा विवरण दर्ज कर उसे पूरे देश में संदेश के रूप में प्रसारित कर दिया जाता है। इसमें दो राय नहीं कि इस मामले में सामाजिक-आर्थिक कारणों को भी नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि अधिकांश बच्चे आपराधिक गिरोहों द्वारा उठाए जाते हैं जिन्हें ढाबों पर काम करने, भीख मांगने, जेब तराशने के काम के लिए और बच्चियों को बाल वेश्यावृत्ति आदि के लिए बेच दिया जाता है। दुश्मनी निकालने अथवा फिरौती ऐंठने की खातिर अपहृत होने वाले बच्चों की तादाद कम होती है। यदि पूरे देश की हालात पर नजर डालें तो पिछड़े, दूर-दराज और पूर्वोत्तर के इलाकों के आंकड़े हमें नहीं मिल पाते हैं। एक अनुमान के अनुसार समूचे देश में सालाना तकरीब 44-55 हजार बच्चे गायब होते हैं। विडंबना यह है कि इन गायब बच्चों में तकरीबन 11 हजार बच्चे कहां चले जाते हैं पता ही नहीं चलता। जाहिर सी बात है ये बच्चे आपराधिक गिरोहों के हत्थे चढ़ जाते हैं जहां शोषण और उत्पीड़न उनकी नियति बन जाती है इस तरह के ज्यादातर मामलों में थानों में रिपोर्ट दर्ज नहीं होती और यदि होती भी है तो इसे एक सामान्य सी बात मान लिया जाता है। यदि एक बार बच्चा आपराधिक गिरोह के हत्थे लग गया तो फिर उसका चंगुल से बाहर निकल पाना मुश्किल होता है। पर्यटन उद्योग ने इसमें प्रमुख भूमिका निभाई है, जिसके चलते इस बाजार में कम उम्र यानी 14 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों की मांग सबसे ज्यादा होती है। यही वजह रही है कि बीते सालों में 12 से लेकर 16-17 वर्ष की लापता लड़कियों की तादाद ज्यादा है, जबकि 12 साल से कम उम्र के लापता बच्चों में लड़कों की तादाद ज्यादा है। आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण बाल वेश्यावृत्ति है जिसे रोक पाने में सरकार नाकाम रही है। बच्चों की गुमशुदगी के मामले में जहां तक पुलिसिया जांच का सवाल है तो जब गुमशुदा बच्चा किसी बड़े परिवार का होता है तो पुलिस रात-दिन एक कर देती है और गरीब थाने के चक्कर ही काटता रहता है। न्यायपालिका के हस्तक्षेप से कुछ सक्रियता बढ़ी जरूर है, लेकिन न्यायपालिका की भी सीमाएं हैं। आखिरकार पुलिस को अपने दायित्व का निर्वहन तो ईमानदारी से करना ही चाहिए। इसी से उसमें जनता का भरोसा टिका रह पाएगा। कुछ बड़े परिवारों के बच्चे की बरामदगी दिखाकर अपनी पीठ थपथपाना अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने से ज्यादा और कुछ नहीं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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