भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अन्ना हजारे और उनकी टीम को सोमवार को एक और बड़ी कामयाबी मिली। सरकार ने ऐसी मांग को मंजूरी दे दी है, जो राजनीति में भ्रष्टाचार के प्रवेश द्वार पर सख्त पहरा लगाने वाली है। लोकपाल साझा मसौदा समिति की बैठक में सरकार इस बात के लिए तैयार हो गई है कि हर लोकसभा चुनाव के बाद सभी चुने गए सांसदों की संपत्ति की जांच लोकपाल करेगा। जिन बिंदुओं पर सहमति बन गई है, उसमें यह भी शामिल है कि मंत्रियों, अफसरों व जजों के पास पाई गई सभी ऐसी संपत्ति को भ्रष्टाचार से हासिल की गई माना जाएगा, जो उन्होंने घोषित नहीं की हो। सबसे अहम बात यह कि लोकपाल को दोषी लोक सेवक की संपत्ति बेच कर सरकारी खजाने के नुकसान की भरपाई करने का अधिकार भी होगा। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अगुवाई में लोकपाल मसौदा समिति की सोमवार को तीन घंटे तक चली इस बैठक के दौरान कई संवेदनशील मामलों पर सरकार टीम अन्ना की मांग पर राजी हो गई। हालांकि न्यायपालिका और प्रधानमंत्री कार्यालय को इसके अधिकार क्षेत्र में लाए जाने के सबसे जटिल मसले पर अभी चर्चा नहीं हुई है। ताजा सहमति के मुताबिक, लोकपाल को समन करने और अपना आदेश नहीं मानने वालों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई का अधिकार भी होगा। साथ ही अपने परिचालन के नियम यह खुद बनाएगा। इस बैठक के दौरान अन्ना हजारे और उनकी टीम ने यह मांग भी रखी कि लोकपाल को किसी भी सरकारी अधिकारी का तबादला करने का अधिकार हो। मसौदा समिति की बैठक में सरकारी प्रतिनिधियों ने इस पर चालाकी दिखाते हुए कहा, यह अधिकार तो लोकपाल को हो, लेकिन इसे सिर्फ सलाहकारी माना जाए, बाध्यकारी नहीं। मगर टीम अन्ना के इस पर सहमत नहीं होने के कारण इस पर फिर से चर्चा होगी। वहीं, अन्ना इस बात के लिए राजी हो गए हैं कि लोकपाल के पास निराधार आरोप लगाने वालों के खिलाफ जुर्माना भी हो सकता है। बैठक के बाद टेलीकॉम मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने का काम सही रफ्तार से चल रहा है। अगले महीने से यह समिति सप्ताह में कम से कम एक बार और जरूरी होने पर दो बार बैठक किया करेगी। उन्होंने कहा, सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के तहत, मसौदा समिति 30 जून की तय समय-सीमा के भीतर अपना काम पूरा कर लेगी और मानसून सत्र में विधेयक संसद में पेश कर दिया जाएगा। मसौदा समिति के सह अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण ने बैठक के दौरान प्रस्तावित विधेयक का मसौदा तैयारी की गति को धीमा बताते हुए कहा था कि इस रफ्तार से 30 जून की तय समय सीमा के भीतर विधेयक कैसे तैयार हो सकेगा.
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