आखिरकार केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जाति आधारित जनगणना को मंज़ूरी दे ही दी। आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका होगा, जब भारत में जाति आधारित जनगणना होगी। इससे पहले 1931 में जाति आधारित जनगणना हुई थी। इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की गणना भी कराई जाएगी। 3,500 करोड़ की लागत से जून में जनगणना शुरू होगी और दिसंबर में पूरी होगी। इसके आंकड़े भी मार्च 2012 तक प्राप्त हो जाएंगे। यह पहली बार है, जब गरीबों की उनके धर्म और उनकी जाति के आधार पर पहचान की जा रही है। पिछली बीपीएल जनगणना वर्ष 2002 में हुई थी। इससे यह पता चल सकेगा कि मुसलामानों, ईसाइयों, सिखों और हिंदुओं में कितने प्रतिशत लोग बीपीएल की श्रेणी में आते हैं। वैसे जाति आधारित जनगणना में जाति और धर्म से संबंधित आंकड़े समूह के रूप में विभिन्न एजेंसियों को उपलब्ध कराए जाएंगे और इनकी व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी। कई लोगों और समाज सुधारकों को लगता है कि जातिगत जनगणना के कारण समाज में विघटन आएगा और लोगों में दूरियां बढेंगी। चूंकि भारत में जातिवाद को नाकारा नहीं जा सकता, इसलिए कई राजनीतिक संगठनों ने जाति आधारित जनगणना की पुरजोर वकालत की है। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव, राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव आदि ने जाति आधारित जनगणना को उचित ठहराते हुए कहा है कि इससे देश में जातियों की स्थिति के बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध होगी। इससे सरकारी योजनाओं में उचित वर्ग को प्रतिनिधित्व मिल पाएगा। वैसे देखा जाए तो भारत की बड़ी आबादी इस बात से सहमत है कि जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए ताकि जाति और धर्म को लेकर होने वाली वैमनस्य की राजनीति का अंत हो सके। इसके पीछे भी कई तर्क दिए जा रहे हैं। मसलन, जाति आधारित जनगणना होने से सभी जातियों और वर्गो की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, जिससे वास्तव में शोषित और पिछड़ी जातियों को सही प्रतिनिधित्व मिल पाएगा तथा इससे राजनीतिक दलों के उन दावों की पोल भी खुल जाएगी, जिसमें वे दावा करते हैं कि फलां जाति का प्रतिशत इतना है और यह हमारा परंपरागत वोट बैंक है। जाति आधारित जनगणना का एक फायदा यह भी होगा कि धर्म के आधार पर देश को बांटने का कार्य करने वाले कथित सेक्युलर दलों की राजनीति ही खतरे में पड़ जाएगी। यदि धर्म के आधार पर देखा जाए तो 2001 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की संख्या 80.5 प्रतिशत थी, जबकि मुस्लिम 13.4 प्रतिशत थे। वहीं ईसाइयों का प्रतिशत 2.3 था तो सिख 1.9 प्रतिशत थे। बाकी अन्य धर्मो को मानने वाले थे। 9 साल बाद यकीनन इनके प्रतिशत में अंतर आना चाहिए। जाति आधारित जनगणना से राजनीतिक और सामाजिक बदलाव आना निश्चित है। राजनीतिक दल इस संभावना पर गौर करेंगे कि उनके लिए किस प्रदेश में क्या समीकरण बन रहे हैं। जातियों की वास्तविक स्थिति का पता लगने से नए सामजिक न्याय का उपयुक्त सामजिक आधार बनेगा। मिटने की कगार पर खड़ी जातियों के लिए विकासोन्मुख योजनाएं चला कर उनका पुनरुत्थान किया जा सकेगा। इसी तरह अति गरीब एवं पिछड़ी जातियों के उठान हेतु प्रयास किया जा सकता है। जाति आधारित जनगणना होने से आम व्यक्ति को यह पता चल सकता है कि अमुक जाति की सरकारी एवं निजी क्षेत्र में कितनी भागीदारी है? इससे जाति और धर्म के आधार पर धमकी भरे अंदाज में आरक्षण मांगने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगेगा। जाति आधारित जनगणना की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी और तीन प्रमुख केंद्रीय एजेंसियां इस जनगणना की निगरानी करेंगी। यदि गणना निष्पक्ष और सटीक हुई तो निश्चित ही यह भारत के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामजिक परिवेश के लिए बदलाव का सूचक होगी। जाति और धर्म के नाम पर देश को दिग्भ्रमित करने की प्रवृत्ति पर भी इससे रोक लगेगी और पिछड़े वर्ग का सही अर्थो में पुनरुत्थान होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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