Sunday, May 1, 2011

अन्ना के मकसद में अड़ंगेबाजी


भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठने के पहले अन्ना हजारे ने यह तो जरूर सोचा होगा कि उनकी लड़ाई आसान नहीं होगी, लेकिन शायद यह न सोचा हो कि शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच होने वाले उनके किसी कार्यक्रम को करने की अनुमति कोई विश्वविद्यालय नहीं देगा। लखनऊ विश्वविद्यालय ने ऐसा ही किया। भले ही अन्ना का लखनऊ आगमन रद हो गया हो, लेकिन सत्ता के आगे विश्वविद्यालय का यह समर्पण अन्ना हजारे के उन समर्थकों को शायद ही रोक सके जो एक मई को फोन से दिए जाने वाले उनके भाषण को सुनने लखनऊ के झूलेलाल पार्क में जमा होना चाहते हैं। अन्ना के अनशन पर बैठने से लेकर अब तक जो कुछ हुआ है उससे एक बनाम सरकार की लड़ाई में सत्ता का कुरूप चेहरा उजागर हो गया है। किसी भी अच्छी चीज को नष्ट करने का सरलतम उपाय उसे विवादित कर देना है। अन्ना विरोधी साजिशन यही कर रहे हैं। यह याद करना मुश्किल है कि दिग्विजय सिंह ने पिछली बार सकारात्मक बयान कब दिया था। अब तो उनके साथ कांग्रेसी समंदर में अपने लिए एक अदद टापू तलाश रहे अमर सिंह भी हैं। लगता है कि उनके पास एक ऐसा जादुई झोला है जिसमें हर किस्म की सीडी हैं। अपने गांव को आदर्श बना देने वाले एक पूर्व फौजी अन्ना में जब कमियां नहीं मिलीं तो उनके अनशन को अलोकतांत्रिक बताया जाने लगा। अन्ना हजारे के अनशन का मूल प्रश्न क्या था? प्रभावी लोकपाल की उनकी मांग कहां से उपजी थी? 72 साल के अन्ना के साथ अगर देश हो लिया तो कारण क्या था? कस्बाई सड़कों से लेकर दिल्ली के राजपथ तक जो जनसमूह उमड़ा वह क्या प्रश्न हल करना चाहता था? उस सवाल पर चर्चा क्यों नहीं होती? कोई पार्टी आगे आकर यह क्यों नहीं कहती कि अन्ना का तरीका गलत था, पर हम उनके मुद्दे से सहमत हैं और संकल्प लेते हैं कि हमारे राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक के नेता अपराधों में लिप्त नहीं होंगे, जमीन का धंधा नहीं करेंगे, वोट के लिए संसद में नोट उछालते नहीं दिखेंगे, विधानसभाओं में एक दूसरे पर कुर्सियां नहीं फेंकेंगे, गंभीर और विकासवादी राजनीति करेंगे। अपने चुनावी घोषणापत्रों में भ्रष्टाचार को कोढ़ बताने वाले दल इस समय या तो चुप हैं और या अन्ना व उनके सहयोगियों में कमियां निकालने के अभियान में लगे हैं। सच यह है कि अन्ना के अनशन ने यह बात बखूबी सिद्ध कर दी है कि भ्रष्टाचार सभी दलों के लिए केवल जबानी जमाखर्च है। विपक्ष चाहता तो आगे बढ़कर कहता कि लोकपाल मसौदा कमेटी में हमारे भी लोग होंगे और हम अन्ना की इस शुरुआत को तार्किक समापन तक ले जाएंगे। सच यह है कि सरकार अनशन से नहीं उसे मिले प्रबल समर्थन से डरी। आंदोलन के कारण सरकार, राजनीतिक दलों और पेशेवर नेताओं की असहजता समझी जा सकती है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से बुद्धिजीवी भी मौन हैं। कुछ बोले भी तो उन्हें आंदोलन में संसद की अवमानना नजर आई। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में कानून बनाने का काम संसद का है, लेकिन कोई अनशन करके इसके लिए दबाव डाले तो यह ब्लैकमेलिंग है। इन बुद्धिमानों को लगता है कि सभी ऐसा ही करने लगे तो लोकतंत्र का होगा क्या? अन्ना ने अनशन के दौरान टीवी पर कहा था कि संसद जो कहेगी उन्हें स्वीकार होगा और वह लोकपाल बिल पर चर्चा के लिए विशेष सत्र बुलाने के पक्ष में नहीं है। उनका कहना था कि संसद के सत्रों पर जनता का बहुत पैसा खर्च होता है और लोकपाल बिल पर चर्चा नियमित मानसून सत्र में की जा सकती है। इसमें कहां हो गई संसद की अवमानना। जनभावना लोक है और लोक से बड़ा कुछ नहीं। लोक मान चुका है कि यह अन्ना ही हैं जिन्होंने महाराष्ट्र में शरद पवार से लगातार लोहा लिया। अन्ना के अनशन की सफलता ही इस बात का प्रमाण है कि आम लोग भ्रष्टाचार से किस कदर ऊबे हैं। उन्हें जैसे ही कहीं मुक्ति का छोटा भी द्वार दिखा, वे दौड़ लिए। राज्यों में और राष्ट्रीय राजनीति में ऐसा कौन है जिसकेपीछे लोग इस तरह खड़े हो सकते हैं। अन्ना विरोधियों का तर्क यह भी है कि उनकेसाथ जो लोग खड़े हुए वे तो ऐसे सुविधाभोगी हैं जो वोट देने नहीं जाते। अगर यह मान भी लें तो इस बात पर किसे शर्मिदा होना चाहिए-आम जनता को या फिर राजनीतिक वर्ग को? अगर किसी एक मुद्दे पर अभी तक अपने को अलग-थलग रखता आया वर्ग मुखर हो रहा है तो यह हर्ष का विषय है। एक अन्ना केखिलाफ जिस तरह से पूरा सिस्टम जुट गया है उससे अगर कुछ दिनों बाद यह मुहिम ठंडी पड़ती दिखे तो ताज्जुब नहीं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना ने लोगों में भ्रष्टाचार के खिलाफ भीतर पैठी भावना को झकझोरा है। अन्ना से यह श्रेय कोई नहीं ले पाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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