Sunday, May 15, 2011

नंदीग्राम के इतिहास की पुनरावृत्ति


लेखक ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के आंदोलन में नंदीग्राम के घटनाक्रम की झलक देख रहे हैं

पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने एक बार कहा था कि अगर किसानों के लिए माओवादी भी बनना पड़े तो मैं तैयार हूं। इस वक्तव्य के कई मायने हो सकते हैं, जो आज के परिवेश में चरितार्थ होते दिख रहे है। नंदीग्राम की घटना का असर हमें कुछ ही दिनों में देखने को मिल जाएगा। अगर पश्चिम बंगाल की सरकार जाती है तो नंदीग्राम में हुए जनआंदोलन का ही असर कहा जाएगा और ऐसा होता भी दिख रहा है। उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले के भट्टा पारसौल गांव में फैली हिंसा ने नंदीग्राम में घटी खूनी घटना की यादें ताजा कर दी हैं। दोनों घटनाएं किसान और प्रशासन के बीच टकराव की हैं। भट्टा पारसौल गांव की घटना भी उग्र रूप लेती जा रही है। किसान सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के चलते आंदोलित हो रहे हैं। जिस किसान को अन्न देवता समझा जाता है, आज उसके उसी जरिए को जबरन छीना जा रहा है। जिस खेती में वह वषरें से अन्न उगाता रहा है, अब उसी खेती पर सरकार कब्जा करके फार्मूला वन रेस का परिसर, सड़कें आदि बनाना चाह रही है। इसी बात का किसान विरोध कर रहे हैं। भूमि अधिग्रहण के चलते देश में पहले भी कई आंदोलन हुए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के किसानों का भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन जहां राजधानी दिल्ली के आसपास उग्र आंदोलन के तरीकों को रेखांकित करता है तो वहीं राजनीतिक संवेदनहीनता और रूढि़वादी समझ को भी सवालों के चक्र में घुमाने के लिए काफी है। हम कह सकते हैं कि यह पूरा मसला भूमि अधिग्रहण कानून को सही से लागू न करने का ही कारण है। कई मायनों में देखा जाए तो इन किसानों का गुस्सा जायज भी है। पिछले महज कुछ ही वर्षो में देखा जाए तो जहां दिल्ली के आस-पास के गांव में रहने वाले ग्रामीण अपने खेतों में खेतीबाड़ी करते थे वहां सरकार ने अब बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर दी हैं। किसानों की उस खेती को सेक्टरों में तब्दील कर दिया गया है। सरकार चाहती तो वह न जाने कब भूमि अधिग्रहण कानून तैयार करके भविष्य में होने वाली फजीहत से बच सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि लालफीताशाही की नीयत में खोट थी। सरकार आज भी 1894 में ब्रिटिश शासनकाल में बने भूमि अधिग्रहण कानून से ही काम चला रही है, जो कभी भी प्रभावी नहीं रहा है। आजादी के 40 वर्षो के बाद तक इस कानून की उतनी जरूरत महसूस नहीं की गई जितनी आज के वक्त हो रही है। इसलिए सरकार में भी इस दिशा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई गई। यही कारण है कि अगस्त 2010 में प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया वयान कि भूमि अधिग्रहण कानून जल्द ही संसद में लाया जाएगा, भी सिर्फ कागजी ही साबित हुआ। उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार के इसी दोहरे रवैये का कारण है किसानों का उग्र आंदोलन। किसानों के प्रति बेफिक्र सरकार जिस तरह से किसानों पर कहर बरपा रही है, निश्चित ही उसका नुकसान उसे आगामी चुनावों में उठाना पड़ सकता है। कुछ भी हो, आए दिन हो रहे इस तरह के जनआंदोलन गैरजनवादी, अराजकता और हिंसक पहलुओं को जन्म दे रहे है। इन मुद्दों पर हर राजनीतिक दलों की सोच एक जैसी ही होती है। जो सत्ता में हैं वे शांत बैठे हैं और जो बाहर है वे बेमतलब बखेड़ा खड़ा कर किसानों के हितैषी बनने की कोशिश कर रहे हैं। सोचने वाली बात यह है अगर किसानों को इस भूमि का अच्छा दाम मिल भी जाता है तो क्या यह किसी ने सोचा है कि इन पैसों से वे खुद की और अपने बच्चों की पूरी जिंदगी बिता पाएंगे। शायद नहीं। जो किसान वषरें से जिस जमीन पर आश्रित रहा है उसके न रहने के बाद क्या होगा उसका? इस विषय में कोई नहीं सोचता। जाहिर है, जब उसकी जमीन छिन जाएगी तो वह भूमिहीन होकर दर-दर की ठोकर खाने के सिवाए कुछ नहीं करेगा। जमीन छिन जाने के बाद किसानों के पास रोजी-रोटी की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होगी। न ही सरकार इस बात की कोई गारंटी दे रही है। सोचने वाली बात है कि सरकार इस तरह की परियोजनाएं उन जगहों पर भी शुरू कर सकती हैं जो कारखाने वर्षो से बंद पड़े हैं। पूरे देश में तकरीबन 846 कारखाने ऐसे हैं जो सालों से धूल फांक रहे हैं। सरकार के इस काम से गुलामी के दिनों की याद ताजा हो जाती है। जिस तरह अंग्रेज जोर जबरदस्ती करके किसानों से जमीन छीन लेते थे उसी तरह आज लोकतांत्रिक सरकार कर रही है। कहते हैं कि जिसे चोट न लगे वह दर्द का एहसास क्या समझे। सरकार ने जो चोट इन किसानों को दी है, शायद उसका दर्द जल्द खत्म नहीं होगा। इस वक्त भट्टा पारसौल गांव के लोग किस तरह से रह रहे हैं, यह तो वही जानते हैं। चारों तरफ पीएसी के जवानों ने पहरा डाल रखा है और लोगों के आने-जाने पर रोक लगा दी है। कोई रिश्तेदार, दोस्त आदि उनका हाल नहीं जान सकता। दिहाड़ी करने वाले मजदूरों के घरों में चूल्हा जलना बंद हो गया है। इनको न जमीन से मतलव है और न किसी और से। वह भी इस आग में जल रहे है। इस घटना की आग अब धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल गई है और इसका अंजाम क्या होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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