भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन से युवाओं में आक्रोश का उभरना स्वाभाविक है। यह उम्मीद जगाता है कि देश अभी मुर्दा नहीं हुआ है। फिल्म रंग दे बसंती की मेरी कहानी भी मेरे पिछले 50 सालों के आक्रोश का नतीजा है। 1959-60 के दौरान जब मैं स्कूल में था तो हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक दिन घोषणा की कि देश में जो भी भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी पाया जाएगा, उसे नजदीक के टेलीफोन के खंभे से लटका दिया जाएगा। हम उन पर इतना भरोसा करते थे कि अगले दिन स्कूल जाते वक्त रास्ते के सारे टेलीफोन के खंभे देखते हुए गए कि किस खंबे से कौन लटका है, क्योंकि हमें पता था कि हमारे शहर में कौन भ्रष्टाचारी है। मगर सारे खंभे खाली थे और वे आज तक उसी तरह खाली पड़े हैं। दरअसल, इसकी मुख्य वजह है हमारा सिस्टम। इस सिस्टम को मैंने गौर से देखा है, समझा है। यह इतना चालाक है कि वह कई अन्ना हजारे को हजम कर जाएगा और डकार भी नहीं लेगा। हरेक राजनीतिक पार्टी में आजकल वकीलों की भरमार का यदि कारण खोजा जाए तो इनकी उपस्थिति इसीलिए होती है ताकि अन्ना जैसों के आंदोलन को दबाया और मिटाया जा सके। यह सिस्टम इतना चालाक है कि उसने अपने अंदर एक सेफ्टी वॉल्व बना रखा है जिसके रास्ते लोकतंत्र के नाम पर कभी-कभी वह हमें अपने गुस्से की भाप निकालने का मौका दे देता है ताकि हमें यह वहम बना रहे कि हम एक लोकतांत्रिक देश और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं और हमें अपनी आवाज बुलंद करने का और आक्रोश व्यक्त करने का पूरा-पूरा हक है। मगर एक बार यदि भाप निकल जाए तो सिस्टम वापस फिर से हावी हो जाता है। कांग्रेस ने करीब 60 साल के अपने शासन में इसका अच्छी तरह अभ्यास कर लिया है, लेकिन दूसरे दलों को अभी इसमें पारंगत होना बाकी है। मैं डरता हूं कि कहीं अन्ना हजारे का यह आंदोलन भी सेफ्टी वॉल्व बनकर न रह जाए। अन्ना के आंदोलन को बदनाम करने की सरकार की जो साजिश है उसके पीछे मंशा कुछ और नहीं, बल्कि यही चाल है। इसके अलावा नेता के मनोविज्ञान को अगर समझें तो पता चल जाएगा कि वह क्यों नहीं चाहते कि इस समस्या का समाधान हो। विचारणीय प्रश्न है कि आखिर हमें नेता की जरूरत पड़ती ही क्यों है? जाहिर है अपनी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए। समस्याएं न हों तो हमें नेता की जरूरत क्यों पड़ेगी और जो खुश है वह नेता के पास क्यों जाएगा? सुखी आदमी को नेता की जरूरत नहीं होती। सिर्फ दुखी आदमी को इसकी जरूरत होती है अपने दुख से छुटकारा पाने के लिए। नेता यह बात बखूबी समझता है। सीधे शब्दों में कहें तो उसका भविष्य हमारे दुखों से बंधा होता है। इसलिए ऊपर से वह यह दिखाने की कोशिश करता रहता है कि वह हमारे दुख दूर करना चाहता है मगर उसकी सारी कोशिश यह होती है कि हमारे दुख किसी न किसी रूप में बने रहें तकि हमें उसकी जरूरत भी बनी रहे। रंग दे बसंती के अंत में भ्रष्ट मंत्री की हत्या को लेकर यह प्रश्न मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि क्या इसका हिंसक होना जरूरी था? इसका जवाब मैं हमेशा गीता के उद्धरण से देता रहा हूं कि समय और परिस्थितियों के अनुसार जो भी उचित हो उसका उपयोग करना चाहिए। हमें सिद्धांतों के किताबी आचरण की बजाय व्यावहारिक आचर-व्यवहार को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए जो कि समय, काल और परिस्थिति पर निर्भर होता है। उदाहरण के तौर पर आज पाकिस्तान या चीन यदि भारत पर अचानक हमला कर दें तो अन्ना हजारे के नारा लगाने या उपवास करने के तरीके से वे वापस नहीं भाग जाएंगे। उनसे निपटने की रणनीति हमें उन्हीं की शैली में अपनानी होगी और उनसे सशस्त्र युद्धकरना होगा। भगवान श्रीराम ने रावण के हाथों कैद सीता माता को छुड़ाने के लिए उपवास का सहारा नहीं लिया और न ही भगवान कृष्ण ने कौरवों के खिलाफ जनांदोलन किया था। उस काल में समय और परिस्थिति का तकाजा थी हिंसा। जब सारे रास्ते बंद हो गए तो हिंसा का ही रास्ता बचा। गांधीजी अंग्रेजों के खिलाफ हिंसा का सहारा नहीं ले सकते थे, क्योंकि अंग्रेज उस भाषा को समझते थे और उसका उत्तर देना बखूबी जानते थे। मगर गांधीजी के अहिंसा के हथियार ने अंग्रेजों को निहत्था कर दिया, क्योंकि इसका अंग्रेजों के पास कोई जवाब नहीं था। 1948 में जब कश्मीर पर पाकिस्तानी कबायलियों ने अचानक हमला कर दिया तो गांधीजी उनके खिलाफ उपवास पर नहीं बैठे, बल्कि वह भारतीय सेना को जीत का आशीर्वाद देने पहुंचे। सोचिए अगर हिटलर से गांधीजी का पाला पड़ा होता तो क्या गांधीजी सफल होते? शायद हिटलर गांधीजी को उपवास पर ही गोली मरवा देता। ब्रिटेन में लोकतंत्र था, इसलिए अंग्रेजों को वहां की जनता का भी डर था। यही वजह थी कि उन्हें गांधीजी के सामने झुकना पड़ा। हिटलर तानाशाह था, उसे किसी का डर नहीं था। इसलिए हिंसा या अहिंसा कोई सनातन मूल्य नहीं है, समय और परिस्थिति के अनुसार उसका उपयोग जायज है। मेरा मानना है कि दौर कोई भी हो जो भी भगत सिंह बनने की जुर्रत करेगा वह मारा जाएगा। पिछले 63 सालों में न जाने कितने युवा अपने ही देश की पुलिस के हाथों मारे गए हैं और न जाने कितने मासूम और निरपराध प्रताडि़त किए गए। मेरी बात तो छोडि़ए, मैं तो एक मामूली सा फिल्म लेखक हूं, विजय तेंदुलकर जैसे बुद्धिजीवी कहते थे कि जब वह किसी नेता को स्टेज पर देखते हैं तो उनका मन करता है कि अगर उनकी जेब में पिस्तौल होती तो वह उसे गोली मार देते। मिस्त्र में लोग हिंसा पर उतर आए आखिर उन्होंने उपवास का सहारा क्यों नहीं लिया? आज लीबिया में क्या हो रहा है? साहिर लुधियानवी की ही पंक्तियां हैं-तुमने जिस खून को मक्ताल में दबाना चाहा, आज वो कूचा-ए-बाजार में आ निकला है,, कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर ..। जैसा कि भगत सिंह ने असेंबली में बम फोड़ने से पहले कहा था, सत्ता जब बहरी हो जाए तो उसके कान खोलने के लिए सिर्फ चिल्लाना काफी नहीं होता, उसके लिए कभी-कभी एक धमाका भी जरूरी होता है। यह सरकार भी इस वहम में नींद ले रही थी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं के आक्र ोश की भाप (अन्ना का आंदोलन) भी हमेशा की तरह थोड़े समय में ही सेफ्टी वॉल्व से बाहर निकल जाएगी, लेकिन जब उसने देखा कि पूरा प्रेशर कूकर ही फटने वाला है तब जाकर उसकी नींद टूटी। हालांकि आशंका अभी भी बरकरार है। दरअसल, सत्ता भ्रष्ट नहीं करती, बल्कि जो भ्रष्ट हैं अक्सर वही सत्ता की तरफ आकर्षित होते हैं। सत्ता अगर भ्रष्ट करती होती तो लाल बहादुर शास्त्री भी भ्रष्ट हो गए होते और सरदार पटेल भी। मगर ऐसा नहीं हुआ। सत्ता इतनी कीमती चीज है कि उसे राजनीतिज्ञों के हाथ में देना ही खतरनाक है। इसे उनके हाथ में देना चाहिए जो उस विषय के जानकार हों, तभी भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं का कोई हल संभव है। (ऋतुराज गुप्ता से बातचीत पर आधारित) (लेखक जानेमाने पटकथा लेखक हैं)
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Sunday, May 1, 2011
अन्ना के मकसद में अड़ंगेबाजी
भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठने के पहले अन्ना हजारे ने यह तो जरूर सोचा होगा कि उनकी लड़ाई आसान नहीं होगी, लेकिन शायद यह न सोचा हो कि शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच होने वाले उनके किसी कार्यक्रम को करने की अनुमति कोई विश्वविद्यालय नहीं देगा। लखनऊ विश्वविद्यालय ने ऐसा ही किया। भले ही अन्ना का लखनऊ आगमन रद हो गया हो, लेकिन सत्ता के आगे विश्वविद्यालय का यह समर्पण अन्ना हजारे के उन समर्थकों को शायद ही रोक सके जो एक मई को फोन से दिए जाने वाले उनके भाषण को सुनने लखनऊ के झूलेलाल पार्क में जमा होना चाहते हैं। अन्ना के अनशन पर बैठने से लेकर अब तक जो कुछ हुआ है उससे एक बनाम सरकार की लड़ाई में सत्ता का कुरूप चेहरा उजागर हो गया है। किसी भी अच्छी चीज को नष्ट करने का सरलतम उपाय उसे विवादित कर देना है। अन्ना विरोधी साजिशन यही कर रहे हैं। यह याद करना मुश्किल है कि दिग्विजय सिंह ने पिछली बार सकारात्मक बयान कब दिया था। अब तो उनके साथ कांग्रेसी समंदर में अपने लिए एक अदद टापू तलाश रहे अमर सिंह भी हैं। लगता है कि उनके पास एक ऐसा जादुई झोला है जिसमें हर किस्म की सीडी हैं। अपने गांव को आदर्श बना देने वाले एक पूर्व फौजी अन्ना में जब कमियां नहीं मिलीं तो उनके अनशन को अलोकतांत्रिक बताया जाने लगा। अन्ना हजारे के अनशन का मूल प्रश्न क्या था? प्रभावी लोकपाल की उनकी मांग कहां से उपजी थी? 72 साल के अन्ना के साथ अगर देश हो लिया तो कारण क्या था? कस्बाई सड़कों से लेकर दिल्ली के राजपथ तक जो जनसमूह उमड़ा वह क्या प्रश्न हल करना चाहता था? उस सवाल पर चर्चा क्यों नहीं होती? कोई पार्टी आगे आकर यह क्यों नहीं कहती कि अन्ना का तरीका गलत था, पर हम उनके मुद्दे से सहमत हैं और संकल्प लेते हैं कि हमारे राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक के नेता अपराधों में लिप्त नहीं होंगे, जमीन का धंधा नहीं करेंगे, वोट के लिए संसद में नोट उछालते नहीं दिखेंगे, विधानसभाओं में एक दूसरे पर कुर्सियां नहीं फेंकेंगे, गंभीर और विकासवादी राजनीति करेंगे। अपने चुनावी घोषणापत्रों में भ्रष्टाचार को कोढ़ बताने वाले दल इस समय या तो चुप हैं और या अन्ना व उनके सहयोगियों में कमियां निकालने के अभियान में लगे हैं। सच यह है कि अन्ना के अनशन ने यह बात बखूबी सिद्ध कर दी है कि भ्रष्टाचार सभी दलों के लिए केवल जबानी जमाखर्च है। विपक्ष चाहता तो आगे बढ़कर कहता कि लोकपाल मसौदा कमेटी में हमारे भी लोग होंगे और हम अन्ना की इस शुरुआत को तार्किक समापन तक ले जाएंगे। सच यह है कि सरकार अनशन से नहीं उसे मिले प्रबल समर्थन से डरी। आंदोलन के कारण सरकार, राजनीतिक दलों और पेशेवर नेताओं की असहजता समझी जा सकती है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से बुद्धिजीवी भी मौन हैं। कुछ बोले भी तो उन्हें आंदोलन में संसद की अवमानना नजर आई। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में कानून बनाने का काम संसद का है, लेकिन कोई अनशन करके इसके लिए दबाव डाले तो यह ब्लैकमेलिंग है। इन बुद्धिमानों को लगता है कि सभी ऐसा ही करने लगे तो लोकतंत्र का होगा क्या? अन्ना ने अनशन के दौरान टीवी पर कहा था कि संसद जो कहेगी उन्हें स्वीकार होगा और वह लोकपाल बिल पर चर्चा के लिए विशेष सत्र बुलाने के पक्ष में नहीं है। उनका कहना था कि संसद के सत्रों पर जनता का बहुत पैसा खर्च होता है और लोकपाल बिल पर चर्चा नियमित मानसून सत्र में की जा सकती है। इसमें कहां हो गई संसद की अवमानना। जनभावना लोक है और लोक से बड़ा कुछ नहीं। लोक मान चुका है कि यह अन्ना ही हैं जिन्होंने महाराष्ट्र में शरद पवार से लगातार लोहा लिया। अन्ना के अनशन की सफलता ही इस बात का प्रमाण है कि आम लोग भ्रष्टाचार से किस कदर ऊबे हैं। उन्हें जैसे ही कहीं मुक्ति का छोटा भी द्वार दिखा, वे दौड़ लिए। राज्यों में और राष्ट्रीय राजनीति में ऐसा कौन है जिसकेपीछे लोग इस तरह खड़े हो सकते हैं। अन्ना विरोधियों का तर्क यह भी है कि उनकेसाथ जो लोग खड़े हुए वे तो ऐसे सुविधाभोगी हैं जो वोट देने नहीं जाते। अगर यह मान भी लें तो इस बात पर किसे शर्मिदा होना चाहिए-आम जनता को या फिर राजनीतिक वर्ग को? अगर किसी एक मुद्दे पर अभी तक अपने को अलग-थलग रखता आया वर्ग मुखर हो रहा है तो यह हर्ष का विषय है। एक अन्ना केखिलाफ जिस तरह से पूरा सिस्टम जुट गया है उससे अगर कुछ दिनों बाद यह मुहिम ठंडी पड़ती दिखे तो ताज्जुब नहीं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना ने लोगों में भ्रष्टाचार के खिलाफ भीतर पैठी भावना को झकझोरा है। अन्ना से यह श्रेय कोई नहीं ले पाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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