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Tuesday, March 22, 2011

चुनावी खर्च पर निगाह रखेगा एजेंट


चुनावों में काले धन के प्रयोग पर अंकुश की तैयारी, पहली बार लागू की जाएगी यह व्यवस्था
देश के चुनावों में बेतहाशा खर्च और काले धन के प्रयोग पर अंकुश के लिए निर्वाचन आयोग (ईसी) ने सख्त उपाय का फैसला किया है। देश के चुनावी इतिहास में पहली बार, चुनावी जंग में तकदीर आजमा रहे प्रत्याशियों की मदद के लिए ‘खर्च एजेंट’ मौजूद रहेगा। ईसी ने चुनाव से संबंधित खर्चों पर निगाह रखने के इरादे से इस बारे में अधिसूचना जारी की है। पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव से इस व्यवस्था को लागू किया जाएगा।
निर्वाचन आयोग ने इलेक्शन चार्टर के रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट में बदलाव करते हुए इस नई व्यवस्था को शामिल किया है। सूत्रों के मुताबिक, हालांकि प्रत्याशी के लिए ऐसा एजेंट रखना अनिवार्य नहीं है। अपनी जरूरत को ध्यान में रखते हुए वह इस बारे में कदम उठा सकता है। निर्वाचन आयोग ने गत 9 मार्च को राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों के साथ हुई मुलाकात के बाद यह फैसला किया है। इस दौरान विभिन्न पार्टियों के प्रतिनिधियों ने पोलिंग एजेंट के अलावा एक और ऐसे एजेंट की नियुक्ति का आग्रह किया था जो संसदीय और विधानसभा चुनावों के दौरान खास तौर पर प्रत्याशी के कुल खर्च पर निगाह रखे। आयोग जल्द ही आदेश को अधिसूचित कर इसे सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय, राज्यों की राजनीतिक पार्टियों और राज्यों की मुख्य चुनाव आयुक्तों को भेजेगा। निर्वाचन आयोग पिछले वर्ष से चुनावी खर्च पर नियंत्रण के उपायों पर विचार कर रहा है। प्रत्याशियों के लिए चुनावी खर्च के लिए अब न केवल एक रजिस्टर रखना अनिवार्य होगा बल्कि इसे नियमित रूप से अपडेट भी करना होगा। राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों ने इस तमाम जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए एक व्यक्ति की नियुक्ति की इजाजत मांगी थी, जिस पर आयोग ने सहमति जताई है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) एसवाय कुरैशी ने हाल ही में चुनावी प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में काला धन लगाए जाने को लेकर गंभीर चिंता जताई थी और पांच राज्यों में चुनाव में मद्देजनर आयकर विभाग व प्रवर्तन निदेशालय को इस पर निगाह रखने को कहा था। कुरैशी ने केवल उन्हीं राजनीतिक पार्टियों के दान पर आयकर छूट देने को वकालत की थी जो वास्तव में चुनावों में हिस्सा लेती हैं।
अब तक की व्यवस्था :
पोलिंग एजेंट के रूप में अब तक केवल एक व्यक्ति को ही प्रत्याशी की ओर से काम करने की छूट थी। खर्च एजेंट की व्यवस्था के साथ ही प्रत्याशी को अब एक और ‘सहयोगी’ मिल जाएगा। खर्च एजेंट हर पोलिंग स्टेशन पर प्रत्याशी के प्रतिनिधि के तौर पर काम करेगा।

Tuesday, March 15, 2011

समान नागरिक संहिता क्यों नहीं


विगत पच्चीस वर्षों में यह पांचवीं बार है, जब सर्वोच्च न्यायालय ने विविध समुदायों के लिए अलग-अलग कानून को गलत बताया है। हाल में राष्ट्रीय महिला आयोग की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि हिंदुओं पर लागू नागरिक कानून में समय-समय पर हुए हस्तक्षेप के प्रति हिंदू समुदाय सहनशील रहा है। लेकिन दूसरे समुदायों के साथ ऐसा नहीं हुआ। यह सेक्यूलर निष्ठा में कमी ही है कि अन्य समुदायों के लिए नागरिक संहिता को सूत्रबद्ध नहीं किया गया। सर्वोच्च न्यायालय की यह तीखी टिप्पणी हमारे पूरे राजनीतिक वर्ग पर लागू होती है। एक देश में दो नागरिक कानून अस्वस्थ मानसिकता का चिह्न है।
इससे पहले जुलाई, 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता बनाने को कहा था। उससे भी पहले जोरेन दियेनगेध बनाम एसएस चोपड़ा (1985), मो. अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम (1985) तथा सरला मुद्गल बनाम केंद्र सरकार (1995) मामलों में सुप्रीम कोर्ट यही कह चुकी है। शाहबानो मामले में तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने फैसले में लिखा, ‘धार्मिक स्वतंत्रता हमारी संस्कृति की नींव है। लेकिन जो धार्मिक रीति मनुष्य की मर्यादा, मानवाधिकार का उल्लंघन करती हो, वह स्वतंत्रता नहीं, उत्पीड़न है। इसलिए उत्पीड़ितों की रक्षा और राष्ट्रीय एकता के विकास के लिए समान नागरिक संहिता परम आवश्यक है।’ फिर सरला मुद्गल मामले में कोर्ट ने रेखांकित किया कि विवाह, संपत्ति उत्तराधिकार जैसे मामले धार्मिक विषय नहीं हैं। इसमें जोर देकर कहा गया कि भारत में ‘मुसलिम पर्सनल लॉ’ का जन्म मजहब से नहीं, बल्कि लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स के बनाए कानून से हुआ था। 1791 में वह कानून आया, जिसके अनुसार शादी, तलाक तथा संपत्ति-विरासत मामलों में मुसलमान और हिंदू अपने-अपने धार्मिक चलन से चल सकते थे। लेकिन उसी ब्रिटिश सरकार ने 1832 में आपराधिक मामलों में मुसलिम लॉ को खत्म कर समान कानून लागू कर दिया। अर्थात् इसलामी शरीयत अनुल्लंघनीय नहीं है। इसीलिए यहां मुसलिम चोरों के हाथ नहीं काटे जाते, बल्कि हिंदू चोरों की तरह उन्हें भी जेल ही मिलती है। सरला मुद्गल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीधा आदेश दिया था कि केंद्र सरकार अगस्त, 1996 तक हलफनामा देकर अदालत को बताए कि सभी नागरिकों के लिए एक समान संहिता बनाने के लिए उसने क्या कदम उठाए। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का वही हुआ, जो हर देशहित की बातों के साथ होता है-उपेक्षा, टाल-मटोल या ऐसी बातें करने वाले व्यक्ति या संगठन पर लांछन लगाकर मामले से कन्नी काट लेना। इसके पीछे विभिन्न समुदायों को बांटे रखने की घातक राजनीतिक मंशा रही है। हमारे सेक्यूलर-वामपंथी उसी नीति पर चल रहे हैं, जिस पर अंगरेज चलते थे। अन्यथा जहां भारतीय संविधान का स्पष्ट निर्देश हो तथा जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट बार-बार कहे, उसे न लागू करने के पीछे और क्या कारण है?
संयुक्त राष्ट्र ने भी समान नागरिक कानून न बनाने के लिए भारत की छीछालेदर की। जनवरी, 2000 में वहां महिलाओं के प्रति भेदभाव के विरुद्ध हुए सम्मेलन में कहा गया कि भारत को सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून बनाना चाहिए। समान नागरिक संहिता के पक्ष में सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता, नारी-मुक्ति, मानवाधिकार, धर्मनिरपेक्षता और हिंदू-मुसलिम बराबरी जैसे तमाम तर्क हैं। इन्हीं की मौखिक दुहाई हमारे धर्मनिरपेक्षवादी रोज देते हैं, मगर जब वास्तविक कदम उठाने का समय आता है, तो बगलें झांकने लगते हैं। निरंतर ऐसा होने से एक समुदाय को अन्याय का भान होता है। सुप्रीम कोर्ट के ही शब्दों में, ‘जब अन्याय बिलकुल साफ हो, तो वह संवेदनशील लोगों की सहनशक्ति से बाहर हो जाता है।’
सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही नहीं, बल्कि जनता भी यही चाहती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 84 प्रतिशत लोग समान नागरिक संहिता के पक्ष में हैं। इनमें बड़ी संख्या में मुसलिम महिलाएं और पुरुष भी हैं। मगर उनकी भावनाओं को कठमुल्लों के सामने उपेक्षित किया जाता है। जाहिर है, ऐसा केवल वोटों के लिए किया जाता है।
धार्मिक अल्पसंख्यक भारत में ही नहीं, अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, अरब देशों और चीन में भी हैं, लेकिन कहीं भी अलग मजहबी कानून नहीं है। मगर अपने यहां मुसलिमों व हिंदुओं को अलग करने वाला कानून है, जो किसी भी तरह देश के लिए हितकर नहीं है।

Sunday, March 6, 2011

संस्था की गरिमा


केंद्रीय सतर्कता आयोग को ताकतवर बनाने की भी जरूरत है
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को निरस्त करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार-निरोधक इस शीर्ष संस्था के मुखिया को पारदर्शी चरित्र का होना चाहिए। यानी इसका नेतृत्व ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए, जिसके आचरण पर उंगली न उठाई जा सके। अंगरेजी में एक कहावत है, जिसका अर्थ है कि राजा (सीजर) की पत्नी को संदेह से परे होना चाहिए। इसका सीधा-सा मतलब यह कि महत्वपूर्ण और सार्वजनिक पदों पर बैठने वाले व्यक्ति का आचरण पारदर्शी होना ही चाहिए। तभी केंद्रीय सतर्कता आयोग जैसी संस्था की शुचिता भी बरकरार रह सकेगी।
पीजे थॉमस की नियुक्ति के खिलाफ दायर जनहित याचिका में बहस के दौरान थॉमस के वकील वेणुगोपाल ने अनेक तर्क देकर सर्वोच्च अदालत को यह बताने की कोशिश की थी कि थॉमस पारदर्शी व्यक्तित्व के अधिकारी रहे हैं और केरल में पाम ऑयल घोटाले में उनके खिलाफ आरोप पत्र राजनीतिक कारणों से दायर किया गया था। थॉमस बेईमान हैं या नहीं, यह अलग बहस का विषय है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एच कपाडिया ने इन तर्कों को यह कहकर काट दिया कि यह आरोप पत्र ही उनके आचरण पर संदेह पैदा करने के लिए काफी है। सीधी-सी बात है, एक ऐसे महत्वपूर्ण पद पर, जहां से देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त को देश भर के अधिकारियों के आचरण पर टिप्पणी करनी हो या जांच के आदेश देने हों, संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिए।
दरअसल सीवीसी की नियुक्ति के समय उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने जब यह मुद्दा उठाया था, तब प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को थॉमस की नियुक्ति के पक्ष में दुराग्रह नहीं करना चाहिए था। लेकिन वे दोनों थॉमस को मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाने पर अड़े हुए थे, ऐसे में, उन्होंने नेता विपक्ष की दलीलों को बहुत महत्व नहीं दिया। इस पर सुषमा स्वराज ने अपनी उपेक्षा का आरोप लगाया, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘हवाला कांड’ में निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया था कि ऐसे फैसले विपक्ष के नेता की सहमति से किए जाने चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है, तो फिर चयन समिति में विपक्ष के नेता को रखने का भला क्या औचित्य है? अगर बहुमत के आधार पर ही निर्णय करना था, तब तो समिति के बाकी दो सदस्य प्रधानमंत्री और गृह मंत्री कोई भी निर्णय लेने में सक्षम हैं। इस लिहाज से देखें, तो उच्चाधिकार प्राप्त समिति मात्र दिखावे की रह गई है।
जैन हवाला कांड के मुकदमे की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जब देखा कि सीबीआई लगातार प्रधानमंत्री कार्यालय से निर्देश लेती है और स्वतंत्र व्यवहार नहीं कर पाती, तो उसने सीबीआई की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उसे केंद्रीय सतर्कता आयोग के अधीन किए जाने के निर्देश दिए थे। अदालत ने साथ ही, यह भी निर्देश दिया था कि ‘कानून की निगाह में सब बराबर हैं’ के सिद्धांत का पालन करते हुए किसी भी पद पर बैठे वरिष्ठ अधिकारी या मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत आने पर सीबीआई को सरकार से अनुमति नहीं लेनी होगी। पर विडंबना देखिए कि ‘विनीत नारायण’ फैसले के बाद शरद पवार की अध्यक्षता में बनी संसदीय समिति ने जो विधेयक तैयार किया, उसमें केंद्रीय सतर्कता आयोग को वह ताकत दी ही नहीं गई, जिससे वह अपना काम पूरी स्वतंत्रता से कर पाता। नतीजतन कहने को तो सीबीआई केंद्रीय सतर्कता आयोग की निगरानी में कार्य करती है, लेकिन वास्तव में उसकी स्थिति आज भी पूर्ववत् है। यानी उच्च पदस्थ अधिकारियों और मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच करने की उसे छूट नहीं है। ऐसा करने से पहले सीबीआई को प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति लेनी होती है। विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सीबीआई की ऐसी सभी प्रार्थनाओं पर चुपचाप बैठा रहता है और वर्षों तक अनुमति प्रदान नहीं करता। नतीजतन उच्च पदस्थ भ्रष्ट अधिकारी न सिर्फ अपने पद पर बने रहते हैं, बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय के अघोषित सुरक्षा कवच में अपने अनैतिक कारनामों को डंके की चोट पर अंजाम भी देते रहते हैं। ऐसा अब तक के हर प्रधानमंत्री के कार्यकाल में होता आया है, चाहे वह यूपीए का रहा हो या एनडीए का। इतना ही नहीं, पिछले दिनों इस आयोग से सरकार ने वह अधिकार भी छीन लिया, जिसके तहत वह सीबीआई को केस रजिस्टर करने का निर्देश देता था। ऐसे तमाम प्रमाण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि केंद्र में सरकार कोई भी हो, वह उच्च पदासीन व्यक्तियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की जांच नहीं होने देना चाहती। इसलिए केंद्रीय सतर्कता आयोग की लगातार दुर्गति की जा रही है।
सर्वोच्च न्यायालय के मौजूदा फैसले ने भविष्य के लिए यह सुनिश्चित कर दिया कि ‘पारदर्शी’ का अर्थ वह नहीं होगा, जो कोई भी सरकार मनमाने ढंग से लगाना चाहे। बल्कि सार्वजनिक महत्व के पदों पर नियुक्ति के समय व्यक्ति के आचरण की पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करना चयन समिति का दायित्व होगा। यह बहाना नहीं चलेगा कि समिति को अमुक व्यक्ति के बारे में वही जानकारी थी, जो उसके बायोडाटा में थी। आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में फिर कोई पीजे थॉमस पिछले दरवाजे से ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर नहीं बैठ पाएगा। इस सबके बावजूद सीवीसी भ्रष्टाचार से निपटने में सक्षम होगा, इसमें संदेह है। इसलिए जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय ‘हवाला कांड’ के फैसले का फिर से मूल्यांकन करते हुए सीवीसी को मजबूत बनाने के लिए भी कड़े निर्देश जारी करे। तभी यह आयोग नाम के अनुरूप अपनी सार्थकता सिद्ध कर पाएगा।