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Saturday, March 12, 2011

प्रभावी लोकपाल के लिए जन-जागरण


आज की परिस्थितियों में यह मांग उचित ही लगती है कि अगर लोकपाल को प्रभावी होना है तो उसके पास अपना जांच तंत्र होना चाहिए जो किसी नौकरशाह या राजनीतिक पदाधिकारी के नियंतण्रमें न हो। ये मागें नई नहीं हैं। पहले भी कई विशेषज्ञ इन्हें उठाते रहे हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी सरकार के लिए अब इस मुद्दे पर अन्ना हजारे के आंदोलन की अनदेखी करना आसान नहीं होगा

यह बात समझ से परे है कि सरकार को राष्ट्रीय महत्व की नीतियों के बारे में भी पहला कदम उठाने के लिए अक्सर क्यों धकेलना पड़ता है ? बरसों पहले सरकार ने माना था कि देश में एक ऐसी संस्था होनी चाहिए जो शासन के विभिन्न पदों पर बैठे बड़े से बड़े अधिकारी को भी जवाबदेही पर मजबूर कर सके। लोकपाल विधेयक लाने का वायदा तभी से किया जाता रहा है लेकिन अभी तक संसद में विधेयक पेश करने की बात तो दूर, प्रस्तावित विधेयक का प्रारूप तक नहीं बन सका है। राष्ट्रीय दृष्टि से हानिकारक और भ्रष्ट आचरण पर रोक लगाने के लिए जवाबदेही के इस विधेयक की चर्चा आरम्भ होने के बाद से तो भ्रष्टाचार अपनी सारी सीमाएं तोड़ कर देश की सारी शासन व्यवस्था को ही नहीं, जनजीवन को भी तहस-नहस करने लगा है। हर मामले पर अपनी बेबसी का रोना रोने वाली सरकार के कदमोें में हरकत पैदा करने के लिए किसी राजनीतिक आंदोलन से अच्छा तो अन्ना हजारे और उनके साथियों का सत्याग्रह ही कारगर साबित होगा। वे अपनी छोटी सी देहाती कर्मभूमि से बाहर निकल कर दिल्ली के राजनीति के विशाल वातावरण में कूद पड़े हैं। उन्होंने पंद्रह अप्रैल तक का समय दिया है सरकार को, लोकपाल विधेयक के बारे में साफ-साफ फैसला करने के लिए। प्रधानमंत्री ने यह वायदा तो किया है कि वे जल्द ही लोकपाल विधेयक लोकसभा में रखेंगे लेकिन प्रश्न केवल विधेयक को संसद में रखने का ही नहीं है। सवाल यह भी है कि उसका प्रारूप कैसा हो। इस विधेयक का जिस तरह का प्राथमिक प्रारूप गृहमंत्री ने बनाया है, वह अन्ना हजारे को स्वीकार नहीं, क्योंकि उसे अधिकतर विशेषज्ञ ‘लीपापोती’ ही मानते हैं। उसी को यदि विधेयक का रूप दिया गया तो उससे न तो प्रशासनिक तंत्र लोकपाल के दायरे में आएगा और न ही प्रधानमंत्री। अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बातचीत का आकलन स्वयं अन्ना हजारे के ही शब्दों में मुलाकात ‘बुरी’ रही। सरकारी प्रारूप के जवाब में ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’

नामक संगठन ने भारत के नागरिक समाज की ओर से एक ‘जन लोकपाल विधेयक’ पेश किया है। इस संगठन में पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी, विधिवेत्ता प्रशांत भूषण , संतोष हेगडे और पूर्व चुनाव आयुक्त लिंगदोह आदि शामिल हैं। अन्ना हजारे की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री ने उन्हें बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया था लेकिन नागरिक समाज की ओर से प्रमुख सुझावों पर प्रधान मंत्री कोई आासन नहीं दे पाए। अन्ना हजारे मानते हैं कि लोकपाल के लिए केवल मंत्रियों की उपसमिति के ही बनाए प्रारूप में वह पारदर्शिता नहीं आ सकती है जिसकी आवश्यकता है। इसलिए इसके लिए नागरिकों और मंत्रियों की संयुक्त समिति का गठन होना चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री को यह स्वीकार नहीं था। हालांकि सरकार ने यह आासन दिया है कि मंित्रयों की उपसमिति नागरिक प्रतिनिधियों से परामर्श कर सकती है। दरअसल दोनों पक्षों में जो मतभेद हैं, वे सामान्य नहीं, मौलिक हैं और उन्हें सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री को हिम्मत जुटानी होगी। सरकार की मंशा आरम्भ से ही प्रधानमंत्री को लोकपाल के कार्यक्षेत्र से अलग रखने की रही है। दबाव के बाद सरकार में नई सोच बनी है। उसके अनुसार प्रधानमंत्री के बारे में लोकपाल जांच तो कर सकता है लेकिन ऐसा करने के लिए पहले सदन के अध्यक्ष से अनुमति लेनी होगी। सैद्धांतिक तौर पर लोकसभा के अध्यक्ष को निष्पक्ष माना जाता है लेकिन देश में जिस तरह के राजनीतिक हालात पैदा हो गए हैं, उनमें राजनीतिक स्तर पर चुने गए किसी भी अध्यक्ष के बारे में राजनीतिक आग्रहों का आरोप लगना अस्वाभाविक नहीं है। अध्यक्षों की राजनीतिक कारणों से फैसले लेने की घटनाएं हमारे देश में कम नहीं है। सरकार की दूसरी पारी भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामलों के लिए ही जानी जाएगी। अधिकतर मामलों में प्रधानमंत्री स्वयं लिप्त नहींतो मूक दर्शक की भूमिका में तो दिखाई ही दिए। उनका काफी समय तो अपने बारे में सफाई देने में ही बीता जिसमें उनकी बेबसी ही सामने आई। यह अस्वाभविक नहीं है कि कई देशों में प्रधान मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। अपने देश में भी बोफोर्स का भूत अब तक कांग्रेस का पीछा करता रहा है । इसलिए जरूरी है कि अगर कोई ऐसा तंत्र खड़ा करना है जो राजनीतिक पदाधिकारियों और अफसरशाही पर अंकुश रख सके तो उसके दायरे में प्रधानमंत्री को भी पूरी तरह लाया जाना चाहिए। विवाद का दूसरा बिंदु है कि लोकपाल को वर्तमान जांच एजेंसियों पर ही निर्भर रहना चाहिए कि नहीं। लगता है कि सरकार की नजर में केंद्रीय खुफिया ब्यूरो के अतिरिक्त केंद्रीय सतर्कता आयोग तकनीकी तौर पर सक्षम संगठन है जिसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए लेकिन आम जनता का अनुभव इस से अलग है। केंद्रीय खुफिया ब्यूरो की जांच सम्बंधी क्षमताओं पर भले ही भरोसा किया जा सकता हो लेकिन उसकी निष्पक्षता पर उसके राजनीतिक इस्तेमाल के आरोपों के कारण आंख मूंद कर भरोसा करने की स्थिति में आज आम जनता नहीं है। सबसे बड़ा कारण है कि केंद्रीय खुफिया ब्यूरो सीधे प्रधानमंत्री के अधीन काम करता है। केंद्रीय सतर्कता आयोग तो काफी दिनों से चर्चा में है ही। गनीमत है कि इस मामले में भी प्रधानमंत्री स्वयं कठघरे में खड़े हो गए है और उन्हें इसके लिए अपना दोष स्वीकार करना भी पड़ा है। इन परिस्थितियों में यह मांग उचित ही लगती है कि अगर लोकपाल को प्रभावी होना है तो उसके पास अपना जांच तंत्र होना चाहिए जो किसी नौकरशाह या राजनीतिक पदाधिकारी के नियंतण्रमें न हो। ये मागें नई नहीं हैं। पहले भी कई विशेषज्ञ इन्हें उठाते रहे हैं लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी सरकार के लिए अब इस मुद्दे पर अन्ना हजारे के आंदोलन की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। न केवल इसलिए कि वे कोई राजनीतिक नेता नहीं है, अपितु इसलिए भी कि इसका उपयोग विपक्ष सरकार को घेरने में करेगा, जो पहले ही दबाव महसूस कर रही है।


Thursday, February 24, 2011

दलितों के परिप्रेक्ष्य में विकेंद्रीकरण का महत्व


पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण की व्याख्या और उसके कार्यान्वयन में अब भी काफी सारी ख़्ामियां हैं। भारतीय समाज में व्यापक रूप से मौज़ूद जाति, वर्ग और जेंडर संबंधी भेदभाव महज़ आरक्षण के बूते दूर नहीं किया सकता है। इसके लिए ठोस रणनीति की दरकार है
हालांकि राज्यों ने पंचायती राज अधिनियम लागू कर दिया है लेकिन शक्ति/सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण तथा स्वशासन की संस्थाओं के रूप में पंचायती राज संस्थाओं के सशक्तीकरण की जि़म्मेदारी अभी पूरी होनी बाक़ी है। लिहाज़ा इस संदर्भ में अब तक असमान विकास ही हुआ है। बहुत से राज्यों में पंचायतें अब तक आर्थिक प्रगति और सामाजिक न्याय का प्रभावी औज़ार नहीं बन सकी हैं, क्योंकि कायरें, कोषों तथा पदाधिकारियों का हस्तांतरण महज़ कागज पर ही सीमित है। स्थानीय स्तरों पर कायरे, शक्तियों तथा संसाधनों का समुचित हस्तांतरण न हो पाने के कारण आजीविका के गम्भीर मसले का हल निकालने के प्रति ध्यान नहीं दिया जा सका है और न समुचित संसाधन की व्यवस्था की जा सकी है। सेवाओं के सफलतापूर्ण निष्पादन के लिए ‘विकास के संवाहक’ के तौर पर उल्लिखित इन संस्थाओं में जाति और राजनीतिक दलों के दबावों के चलते संसाधनों से लेकर विकास के लाभ तक के मामलों में, सभी स्तरों पर वर्चस्वशाली समुदायों का दखल दिखता है। ग्राम सभाओं और पंचायतों में सहभागिता के सवाल पर समुचित ज़ोर नहीं दिया गया है और न ही उन अवरोधों को दूर करने की कोशिशें हुई हैं जो ग्राम सभाओं में वंचित तबक़ों के प्रवेश को अवरुद्ध करती हैं। जबरन थोपे जाने वाले जाति, वर्ग और जेंडर के भेदभावपूर्ण नियम और तौरत रीक़ों के चलते महिलाओं का उनके निर्वाचन-क्षेत्रों में ख़्ाराब प्रदर्शन दिखता है, जिसके चलते उनके लिए ग्राम सभाओं में बराबरी के साथ भागीदारी और विकास कायरें के कार्यान्वयन तथा पंचायत फंड का इस्तेमाल करने में दिक्कत खड़ी होती है। समर्थवान माहौल की कमी और वर्चस्वशाली जाति के सदस्यों द्वारा शक्ति क़ब्ज़ा लेने के चलते दलित महिलाओं और पुरुषों के सामने जाति, वर्ग और जेंडर से जुड़े व्यावहारिक मसलों और ज़रूरतों को उठाने में और उन पर काम करने में अवरोध पैदा होते रहने का सामना करना पड़ता है। पंचायतों में भाग लेने वाली दलित महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों पर होने वाले कुठाराघात से निबटने और जिन अवरोधों का उन्हें सामना करना पड़ता है उनसे उन्हें निजात दिलाने में राज्य मशीनरी लगातार असफल रही है। सूचना के लोकतंत्रीकरण को सुनिश्चित करने में सूचना का अधिकार क़ानून सबसे प्रगतिशीत अधिनियमों में से एक रहा है। इस अधिकार का इस्तेमाल करने वाले बहुत से अपीलार्थियों को सूचना मांगने के एवज़ में व्यक्तिगत तौर से लक्ष्य बनाया गया, या फिर जानकारी प्रदान करने में भयानक देरी की गई। रिकॉर्ड की कमी और अपीलार्थियों को विभिन्न जनसूचना अधिकारियों द्वारा बार-बार चक्कर कटवाए जाने के कारण सूचना के अधिकार की प्रक्रिया लालफीताशाही के भार के नीचे कराह रही है। कुछ मूलभूत फायदों को समावेशित करने के छोटे-मोटे प्रयास किए गए। हालांकि पंचायतों में स्वास्थ्य और अन्य मूलभूत सेवाओं के मामले में बहिष्करण और भेदभाव की निरंतरता बनी ही हुई है। इतना ही नहीं, सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच के मामले में ग्राम आधारित मॉडल का इस्तेमाल किया जा रहा है न कि टोला आधारित। जब भी इन सेवाओं को प्रदान करने की बात आती है तो आवासीय पृथकत्व के कारण अनुसूचित जाति के बहुत से टोले- मोहल्ले नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं। प्रवासी कामगारों की दलित बसावटों में न स्वच्छता की व्यवस्था है, न पेयजल और बिज़ली की। उन बसावटों में खेल का मैदान नहीं है, स्कूल, सामुदायिक केंद्र नहीं हैं और न कोई तालाब वग़ैरह ही है। सूचना के अपर्याप्त प्रवाह तथा एससी/एसटी समुदायों से संबंधित परियोजनाओं वाले विभागों में उत्तरदायित्व तंत्र के ढुलमुल रवैये के चलते अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के मद की एससीपी तथा टीएसपी जैसी योजनाओं का ठीक से कार्यान्वयन नहीं हो पाता है। परिणामस्वरूप दलितों और आदिवासियों के हित में एससीपी/टीएसपी को साकार करने में भारी रुकावटें आएंगी। हालांकि, व्यय देखने पर इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं कि दलित समुदायों के पक्ष में एससीपी/टीसीपी के फंड का व्यय करने के बजाय उसे अन्य ढांचागत परियोजनाओं पर ख़्ार्च कर दिया गया है। कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान दिल्ली में ही एससीपी के पैसे अन्य मदों में खर्च करने की मिसाल हमारे सामने है। दलितों में विकलांगता की स्थिति काफी ज्यादा है। दलितों की कल्याणकारी सेवाओं तक पहुंच न हो पाने और स्वास्थ्य पण्राली तथा स्कूलों में उनके साथ होने वाले भेदभाव के चलते विकलांग आबादी का एक बड़ा हिस्सा किसी भी प्रकार की मदद या अनुदान से वंचित रह जाता है। आर्थिक संवृद्धि का मतलब यह भी है एक बहुत बड़ी प्रवासी आबादी आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काम करे। जबकि हक़ीक़त यह है कि उनके लिए सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए समुचित संरचनाएं और संस्थान न तो उपलब्ध कराए गए हैं और न ही उनका निर्माण किया गया है। पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण की व्याख्या और उसके कार्यान्वयन में अब भी काफी सारी ख़्ामियां हैं। भारतीय समाज में व्यापक रूप से मौज़ूद जाति, वर्ग और जेंडर संबंधी भेदभाव महज़ आरक्षण के बूते दूर नहीं किया सकता है। इसके लिए ठोस रणनीति की दरकार है। लिहाजा यह जरूरी है कि चुनावों में दलितों के भयमुक्त मदतान और उम्मीदवारी के अधिकार को सुनिश्चित करने और आरक्षित सीटों से चुनाव जीत जाने के बाद निर्भय होकर जनादेश पर काम करने के लिए प्रभावपूर्ण ढंग से आरक्षण की नीति लागू की जाए। इसके लिए समुचित नीतियों और आधिकारिक सरकारी निगरानी की ज़रूरत पड़ेगी तथा दलित उम्मीदवारों और प्रतिनिधियों को सुरक्षा भी मुहैया करानी होगी। सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण तभी मुमकि़न हो सकेगा जब बजटीय आवंटन, सम्बंधित कायरे और पदाधिकारियों के अधिकार पंचायतों को दिए जाएंगे ताकि उनके पास प्रभावी राजनीतिक शक्ति आए और वे अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन कर सकें। यह भी ज़रूरी है कि पंचायत के कार्यक्रमों पर नौकरशाही का नियंतण्रन्यूनतम हो तथा वे पंचायतों के प्रति उत्तरदायी बनें। यह भी ज़रूरी है पंचायत के तीनों स्तरों के बीच तथा पंचायतों और ग्रामीण विकास परियोजनाओं के लिए जि़म्मेदार सरकारी विभागों के बीच संयोजन और समन्वय स्थापित हो और इन सबके बीच नियमित बैठकें हों और उनमें आपसी तालमेल ठीक-ठाक रहे। निचले स्तर की नौकरशाही में एससी/एसटी महिलाओं और पुरुषों के लिए पंचायत के कोटे के अनुरूप कोटा निर्धरित किया जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बीडीओ अपनी आबादी के इस हिस्से के प्रतिनिधि ही हों।


Monday, February 21, 2011

उत्तराखंड के लिए गम्भीर खतरा हैं जल विद्युत परियोजनाएं


देश के पहाड़ी राज्यों, खासकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में आजकल जल विद्युत परियोजनाओं की जैसे भरमार हो गई है। इस समय केवल उत्तराखंड में पांच सौ से अधिक राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है। इन सभी परियोजनाओं को उत्तराखंड सरकार की पूर्ण मंजूरी के बाद ही चलाया जा रहा है। पर शायद सरकार अभी तक इन परियोजनाओं से उत्तराखंड के ग्रामीणों के समक्ष होने वाले संकट को नहीं समझ पा रही है। इन सभी परियोजनाओं से सीधे तौर पर यहां की आम गरीब जनता को नुकसान हो रहा है। साथ ही पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है वह तो अभी अलग ही है। जबकि इन परियोजनाओं को अंजाम देने वाली कम्पनियों और संस्थाओं को केवल अपने लाभ से मतलब है, चाहे वे इसके लिए किसी का घर उजाड़ दें, या डायनामाइट लगाकर कई गांवों के मकानों में दरारें पैदा कर दें। एक आम इंसान जब घर बनाता है तो उसकी कितनी मेहनत और जीवन भर की कमाई उसमें लग जाती है, इसका अंदाजा उसको ही पूर्ण रूप से होता है। पर यदि उसका बनाया हुआ घर एक साल में ही जगह-जगह दरार प्रभावित हो जाए तो उस पर क्या बीतेगी? इसका अनुमान उत्तराखंड सरकार को नहीं हो पा रहा है। अगर यह किसी की कही बात होती तो शायद हम यकीन नहीं कर पाते, पर हमने खुद जाकर देखा है कि इन इलाकों में कैसे एक साल पुराने मकानों में भी दरारें आ चुकी हैं। कारण सिर्फ और सिर्फ एक है- टनल बनाने के लिए चटटनों में जो डायनामाइट से विस्फोट किया जाता है वही इन मकानों को खतरनाक हालात की तरफ धकेल रहा है। साथ ही इस कार्य से खेती, जंगल, पीने के पानी तथा आम लोगों की आजीविका को जो नुकसान हो रहा है वह तो अलग है। परंतु सरकार है कि चुप्पी तोड़ने को तैयार नहीं। पिछले दिनों मंदाकिनी नदी को बचाने के लिए आंदोलन कर रहे लगभग 70 ग्रामीणों पर गलत मुकदमें दर्ज करके सरकार ने सभी को जेल में डाल दिया। यह घटना सभी को आश्र्चय में डाल सकती है क्योंकि एक तरफ जहां सरकार पर्यावरण सुरक्षा का राग अलापती है और गंगा को बचाने के लिए उसे ‘राष्ट्रीय नदी’ घोषित करती है, वहीं दूसरी तरफ उसकी सहायक नदी- मंदाकिनी को बचाने को अपराध मानती है और इस सोच के तहत, नदी बचाव के लिए आंदोलन करने वाली ग्रामीण महिला सुशीला भंडारी एवं जगमोहन सहित 70 ग्रामीणों को अपराधी घोषित करती है। ये वे लोग हैं जो पिछले पांच वर्षों से मंदाकिनी नदी और क्षेत्र में पर्यावरण का स्वास्थ्य बचाने के लिए कार्यरत हैं। आज के समय में उत्तराखंड के अधिकतर गांवों की प्राकृतिक सुंदरता खत्म होती जा रही है। इंसान की हर मूल जरूरत की व्यवस्था जैसे पानी, जंगल, फल, कृषि इत्यादि का लगभग अंत होता जा रहा है। और इन सभी का कारण सरकार द्वारा विकसित की जा रही परियोजनाएं हैं। इस समय उत्तराखंड की कोई भी छोटी या बड़ी नदी ऐसी नहीं है जिस पर कोई परियोजना न चल रही हो। जिस आम इंसान की मदद से नेतागण अपनी सरकार बनाते हैं उसी के लिए सरकारें इतनी लाचार क्यों हो जाती हैं, यह बात उत्तराखंड की आम जनता अभी तक नहीं समझ पा रही है। सरकार बनाते वक्त नेतागण पर्यावरण को बचाने के लिए तमाम तरह की प्रतिबद्धताएं दर्शाते हैं; पर उनको व्यवहार में लाने के समय सारी प्रतिबद्धताएं भूल जाते हैं। अब तो उत्तराखंड की जनता को अपनी कृषि और खेतों को बचाने के लिए भी जबरदस्त मेहनत करनी पड़ रही है, क्योंकि दिन प्रति दिन प्राकृतिक जंगलों में कमी की वजह से जंगली जानवर जैसे- सुअर, बंदर, तथा और भी कई प्रकार के जंगली जानवर अपना पेट भरने के लिए किसानों के खेतों में चले आते हैं। पहले वे प्राकृतिक संसाधनों से अपना काम चला लेते थे पर अब ऐसा नहीं रह गया है। इस समस्या से भी निपटना भी इस समय उत्तराखंड के किसानों के लिए एक चुनौती बन गया है। इन सभी के बीच नुकसान केवल आम इंसान का हो रहा है और अब सरकार को इस पर गम्भीर होने की सख्त आवश्यकता है। (सुश्री भट्ट इस समय गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली की अध्यक्ष हैं)



बांध परियोजनाओं से उपजे सवाल


उत्तर औपनिवेशिक भारत की पहली नदी घाटी परियोजना से विस्थापित लोगों का अब भी पुनर्वास नहीं हुआ है। पिछले 57 साल से पुनर्वास की आस लगाए लगभग चार हज़ार प्रभावित लोगों ने अब 27 फ़रवरी से आमरण अनशन पर जाने का फ़ैसला किया है। इसमें आंदोलन कर रहे लोगों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी भी शामिल हो रही है, जो विस्थापित अवस्था में ही पैदा और जवान हुई। दामोदर घाटी परियोजना के समय, 1954 में जब इनकी ज़मीन अधिग्रहीत की गई थी तो पश्चिम बंगाल और मौजूदा झारखंड के 250 से अधिक गांव इसकी जद में थे। इन गांवों से विस्थापित हुए लोगों में से सिफऱ् 340 लोगों को ही सरकार ने अब तक मुआवजा और नौकरी दी है, जबकि एक हज़ार से अधिक विस्थापित परिवार पिछली आधी सदी से सरकारी दफ्तरों में भटक और सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। इन लोगों ने ‘दामोदर घाटी विस्थापित कल्याण संघ’ के बैनर तले इस संघर्ष को तेज करने का फ़ैसला किया है। बीते साल भी इनमें से लगभग तीन हज़ार लोगों ने तीन दिनों तक भूख हड़ताल की थी, जिस पर हुआ समझौता अभी तक अधर में लटका हुआ है। ’50 के दशक में शुरू हुई दामोदर घाटी निगम और हीराकुंड बांध परियोजना देश की सबसे महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं में से थी। विद्युत उत्पादन और सिंचाई व्यवस्था को लक्ष्य करते हुए 7 जुलाई 1948 को संवैधानिक एक्ट के तहत दामोदर घाटी परियोजना की शुरुआत की गई और 5 सालों के भीतर 1953 में ही तिलैया में दामोदर की एक सहायक नदी बराकर पर पहला बांध बन कर तैयार हो गया। तब से लेकर अब तक इन विस्थापितों के संदर्भ में पुनर्वास की जितनी कवायदें हुई हैं, वे थोथी साबित हुई। दामोदर घाटी निगम का प्रबंधन पुनर्वास की ज़िम्मेदारी से कई दफ़ा इनकार कर चुका है। सम्बंधित राज्यों के राज्यपालों सहित उच्चतम न्यायालय द्वारा विस्थापितों के पक्ष में फ़ैसला सुनाने के बाद भी पीड़ितों को उचित आवास और मुआवजा अब तक नहीं मिला है। देश में बांधों और नदी घाटी परियोजनाओं की ऐतिहासिक समीक्षा करने पर सरकारी नीतियों का लचरपन साफ़ हो जाता है। पर्यावरण क़ानून और ज़मीन अधिग्रहण से लेकर पुनर्वास तक की व्यवस्था के साथ खिलवाड़ हुआ है। 1953 में महानदी पर बने हीराकुंड बांध से विस्थापित हुए लोगों का भी संघर्ष अब तक जारी है। नदी घाटी परियोजनाएं जिन लक्ष्यों को साधने के लिए शुरू हुई थीं, उनके बजाय इन्हें औद्योगिक कामों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। संभलपुर में ‘हीराकुंड नागरिक परिषद’ ने औद्योगिक क्षेत्र के लिए पानी भेजने के विरोध में राष्ट्रपति से मुलाकात करने के बाद अक्टूबर 2006 में बांध के एक छोर से दूसरे छोर तक 20 किलोमीटर लम्बी मानव श्रृंखला बनाकर लोगों का ध्यान खींचा था। हीराकुंड बांध की दो ऊंची मीनारों का नामकरण नेहरू और गांधी के नाम पर किया गया है, लेकिन इन दो मीनारों को ‘मानव शरीर से जोड़ देने’ के बावज़ूद प्रभावितों को राहत नहीं मिली। बांध के मुद्दे पर देश में ऐसे संघर्ष कई रूपों में और कई मामलों को लेकर चल रहे हैं। रेणुका बांध के विरोध में हिमाचल प्रदेश के लोग पिछले एक साल से सड़क पर हैं। इस बांध के डूब क्षेत्र के अंतर्गत सिरमौर ज़िले के 33 गांव आते हैं। दिल्ली को पानी मुहैया कराने के लिए यह बांध बनाया जा रहा है। ऐसा आकलन है कि अभी दिल्ली में सिफऱ् 60 फीसद पानी का ही सही इस्तेमाल हो पा रहा है। दिल्ली के नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री को कुछ तरीके सुझाए हैं जिनमें तकनीकी सुधार के जरिये इसे 90 फीसद के स्तर तक बढ़ाया जा सकता है। इस उपक्रम के जरिये रेणुका से बचा जा सकता है। नर्मदा घाटी में जल-जंगल-ज़मीन के संघर्ष को 25 साल हो गए और यहां से विस्थापित हुए 50 हज़ार से अधिक लोग अब भी सही मुआवजे और पुनर्वास के लिए आंदोलनरत हैं। सरदार सरोवर परियोजना के लिए 50 साल से अधिग्रहीत की गई भूमि का 40 फीसद हिस्सा बिना किसी इस्तेमाल के परती पड़ा हुआ है। ज़मीन के कुछ टुकड़े को सरकार ने कम्पनियों और उद्योगों को किराये पर दे रखा है। ज़मीन अधिग्रहण करने के बाद उसके ग़्ौर-परियोजनाकारी इस्तेमाल का प्रचलन देश में एक मामले तक नहीं सिमटा है। लवासा परियोजना को अभी जहां विकसित किया जा रहा है, उसका कुछ हिस्सा 1975 में बने बारसगांव बांध के नाम पर अधिग्रहीत किया गया था और अगले 25-30 सालों तक वह परती पड़ा रहा। अब इसे लवासा पर खरचा जा रहा है। बांध से मार खाई ज़िंदगियों के चलते कई बार लोगों ने आमरण अनशन को विरोध के तरीके के तौर पर चुना है। ‘दामोदर घाटी विस्थापित कल्याण संघ’ उसी परम्परा की अगली कड़ी है। नर्मदा घाटी में जब 7 जनवरी 1991 को सात लोगों के बलिदानी जत्थे ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का ऐलान किया था, तब जाकर सरदार सरोवर परियोजना की स्वतंत्र समीक्षा कराने की स्थिति बन पाई थी। यह निर्णय भूख हड़ताल के 22वें दिन आया। 1993 में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने यह घोषणा की थी कि अगर सरकार इस परियोजना का पुनरीक्षण करने को राजी नहीं हुई तो उनके कुछ कार्यकर्ता नर्मदा में जल समाधि ले लेंगे, लेकिन अपनी ताकत के बल पर राज्य ने इसे टाल दिया। पुनर्वास के अधिकतर मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद सरकारी पहलक़दमी हुई है। कई बार तो बाध्यकारी उपबंधों के तले ऐसे क़दम उठाए गए। ओंकारेश्वर बांध के सिलसिले में विस्थापितों के पक्ष में जब राज्य उच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया तो मध्य प्रदेश सरकार और एनएसडीसी ने उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी। सरकारी पक्ष यह था कि राज्य के पास पुनर्वास के लिए मात्र 5000 हेक्टेयर ज़मीन ही है। तब जाकर उच्चतम न्यायालय में तत्कालीन न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति आर. वी. रवींद्रन ने सरकार को लगभग फ़टकार लगाते हुए पीड़ितों को सही व्यवस्था देने को कहा था।


Monday, February 7, 2011

साथ सिर्फ विनायक सेन का या जनतंत्र का


तीस जनवरी को इस बार भी गांधीजी की शहादत को छोड़कर, बाकी सब कुछ याद किया गया। बहरहाल, इस बार खासतौर पर सिविल सोसाइटी कहलाने वाले तबके ने गांधीजी को दो संदभरे में याद किया। पहला, आम तौर पर भ्रष्टाचार तथा खासतौर पर काले धन के विरोध के संदर्भ में। दूसरा, डॉ. विनायक सेन को छत्तीसगढ़ में एक निचली अदालत द्वारा राजद्रोह के आरोप में सुनायी गयी सजा के विरोध के संदर्भ में। इनमें पहला संदर्भ, गांधी की शहादत के संदर्भ को छोड़कर, इस मौके पर भी गांधी को नशा मुक्ति, स्वच्छता आदि के लिए ही याद करने की परम्परा की ही एक और कड़ी है। लेकिन, दूसरा संदर्भ विडम्बना का बहुत अर्थपूर्ण उदाहरण है। आखिरकार, गांधीजी की जान विचार-संचालित हिंसा ने ली थी। अब गांधी की दुहाई का उपयोग विनायक सेन के लिए न्याय तथा मानवीय अधिकारों की लड़ाई में किया जा रहा था, जबकि उन पर सच हो या झूठ, विचार-संचालित हिंसा से जुड़े माओवादियों का साथ देने का ही आरोप है। विनायक सेन के मामले में देश भर में ही नहीं, दूसरे देशों से भी जिस तरह से आवाज उठी है, उससे एक बात तो बिल्कुल साफ हो ही जाती है। पहली तो यही कि अगर छत्तीसगढ़ की निचली अदालत ने उन्हें संदिग्ध आधार पर कड़ी सजा देकर माओवादियों के समर्थन पर अंकुश लगाना चाहा था, तो उसकी यह कोशिश उल्टी पड़ी है। उसकी इस ‘कड़ी कार्रवाई’ ने ठीक उल्टा ही काम किया है और माओवादियों की मदद ही की है। बेशक, इसमें विनायक सेन के व्यक्तित्व और काम की अपनी भूमिका भी है। फिर भी इससे, बहुत बार भुला दिये जाने वाले इस सच की भी पुष्टि होती है कि अगर हमारे मुख्यत: संविधान व कानून से संचालित समाज के लिए विचारधारा- संचालित हिंसा के खतरे को शिकस्त देनी है, तो यह काम हिंसा के मुकाबले कथित रूप से ‘कड़े कदम’ उठाने भर से नहीं हो सकता। उल्टे इसके लिए हिंसा का मुकाबला करने के कदमों का, पूरी मुस्तैदी से संविधान व कानून के दायरे में होना सुनिश्चित करना होगा। ऐसी जनतांत्रिक वैधता के बिना, शासन की कार्रवाई अपने लक्ष्य से दूर से दूर ही होती जाती है। लेकिन, ऐसी जनतांत्रिक वैधता की जरूरत क्या सिर्फ शासन को ही है? क्या शासन से बाहर, कथित सिविल सोसाइटी को और खासतौर पर खुद को जनतंत्र तथा मानवाधिकारों का संरक्षक मानने वालों को, ऐसी जनतांत्रिक वैधता की कोई जरूरत नहीं है? आमतौर पर इन ताकतों के व्यवहार को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि नहीं। या शायद यह कहना ज्यादा सही होगा कि यहां यह मानकर चला जाता है कि शासन के बाहुबल के विरोध में, जनतांत्रिक वैधता अपने आप ही समायी हुई है। हमारे देश में, जहां सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में इमज्रेसी के अनुभव के बीच से ही किसी ध्यान देने लायक पैमाने पर मानवाधिकार व नागरिक अधिकार के सवालों ने सिविल सोसाइटी के बीच जगह बनायी थी, कुछ समय तक यह स्थिति आसानी से चलती रही। लेकिन, जल्द ही व्यापक नागरिक अधिकार गोलबंदी के पीयूसीएल तथा पीयूडीआर में विभाजन ने इस मोर्चे पर दक्षिण व वामपंथी राजनीतिक रुझानों के अंतर को सामने ला दिया। और इन दोनों के ही सिविल सोसाइटी में हाशिये पर ही पड़े रहने ने, जनतांत्रिक वैधता के अभाव में इन चिंताओं के ही बहुत सीमित दायरे में बने रहने को सामने ला दिया। जनतांत्रिक व नागरिक अधिकार संगठनों व ग्रुपों का यह संकट तब और खुलकर सामने आ गया, जब शासन-इतर संगठित हिंसा एक वास्तविकता बनकर सामने आ गयी। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध से साम्प्रदायिक आक्रामकता व हिंसा, फिर अतिवादी व आतंकवादी हिंसा और अंतत: माओवादी हिंसा ने, इसकी गुंजाइश खत्म कर दी कि शासन के बल प्रयोग की अवैधता को या शासन के विरोध में बल प्रयोग की वैधता स्वयंसिद्ध मानकर चला जाए। बेशक, ऐसा मानने पर भी कोई रोक नहीं है। सच तो यह है कि साम्प्रदायिक आक्रामकता, अतिवादी व आतंकवादी कार्रवाइयों और इसी तरह माओवादी गतिविधियों के पक्ष में और उसी ठिकाने से शासन की कार्रवाइयों के विरोध में, नागरिक व मानव-अधिकारों की दुहाइयां आये दिन सुनने को मिलती भी हैं। लेकिन, इन दुहाइयों को सम्बंधित राजनीतिक धाराओं का विस्तार ही माना जाता है, जिनका आमतौर पर सिविल सोसाइटी पर शायद ही कोई खास असर होगा। यह बात माओवादियों से जुड़ी धारा के मामले में भी सच है, हालांकि उसका दायरा कहीं बड़ा है, उसका नैतिक आभामंडल कहीं ज्यादा चौंधियानेवाला है और उसमें अरुंधती राय तथा महाश्वेता देवी जैसे चमकीले बौद्धिक सितारे भी शामिल हैं। दुर्भाग्य से यह ठीक उस मुकाम पर, जहां नागरिक व मानव-अधिकारों के पक्ष में आवाज की कारगर मौजूदगी सबसे ज्यादा जरूरी है, उस आवाज के एक तरह से गायब हो जाने जैसा है। इस आवाज की जगह आज हमें जनतांत्रिक वैधता से निरपेक्ष, शासन की पक्षधर बल्कि उसके ज्यादा से ज्यादा दमनकारी रूप की मांग करने वाली आवाजें और जवाब में, उसके खुल्लमखुल्ला हिंसक विरोध की लड़ाकू आवाजें ही ज्यादा सुनने को मिलती हैं। वास्तव में इन आवाजों की तेज से तेज होती टक्कर में, नागरिक व मानवाधिकारों की उस आवाज की जगह सिकुड़ती ही जा रही है, जो जनतांत्रिक वैधता के बल पर सिविल सोसाइटी के बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ सकती है। ठीक इसी के बल पर यह आवाज, एक ओर शासन का जनतांत्रिक व्यवस्था की लक्ष्मण रेखाओं को न लांघना सुनिश्चित कर सकती और दूसरी ओर, विचार-संचालित ¨हसा की वैधता पर गम्भीर सवाल खड़े कर, उसे हाशिये पर डाल सकती है। आज के हालात में, ये दोनों ही काम समान रूप से जरूरी हैं। दुर्भाग्य से इसके बावजूद, शासन बनाम अन्य के बढ़ते धुवीकरण के बीच, इस आवाज की कद्र करने वाले कम ही दिखाई देते हैं। डॉ. विनायक सेन के साथ हुए अन्याय का मुद्दा उठाने के लिए, गांधी की शहादत का सहारा लेने की उपयोगिता संदेह से परे है। लेकिन, यह तब तक गांधी की शहादत के इस्तेमाल का ही मामला रहेगा, जब तक अन्याय की इस पहचान को शासन तक ही सीमित रखा जाएगा और माओवादियों की हिंसा तथा जोर-जब्र के शिकार होने वालों के लिए न्याय के सवालों को या तो अनदेखा ही किया जाता रहेगा या गैर-महत्वपूर्ण मानकर टरकाया ही जाता रहेगा। याद रहे कि ऐसा पक्षपात, अंतत: विनायक सेनों के पक्ष को भी कमजोर करता है; देश के तथा आम जनता के वास्तविक हितों को तो खैर कमजोर करता ही है। विनायक सेन के साथ हुए अन्याय का मुद्दा उठाने के लिए, गांधी की शहादत का सहारा लेने की उपयोगिता संदेह से परे है। यह तब तक गांधी की शहादत के इस्तेमाल का ही मामला रहेगा, जब तक अन्याय की इस पहचान को शासन तक ही सीमित रखा जाएगा और माओवादियों की हिंसा तथा जोर- जब्र के शिकार होने वालों के लिए न्याय के सवालों को अनदेखा ही किया जाता रहेगा या गैर-अहम मानकर टरकाया जाता रहेगा। याद रहे कि ऐसा पक्षपात, अंतत: विनायक सेन जैसों के पक्ष को भी कमजोर करता है; देश के तथा आम जनता के वास्तविक हितों को तो खैर कमजोर करता ही है



Thursday, February 3, 2011

अच्छी पुलिस या अपनी पुलिस


पुलिस कार्यपण्राली प्रजातांत्रिक मूल्यों, वैधानिक अधिकारों के प्रति उदार, खरी तथा जवाबदेह हो, इस नजरिये से सुप्रीम कोर्ट ने कोई पांच साल पहले राज्य सरकारों को पुलिस व्यवस्था में फेरबदल के लिए सुझाव दिए थे। इन पर अमल के लिए कुछ राज्यों ने आयोग व समितियों गठित कीं लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले कोशिशें आईएएस बनाम आईपीएस के बीच उठे वर्चस्व के सवाल और अहं के टकराव में उलझकर रह गई। लिहाजा पांच साल बाद एक बार फिर उच्चतम न्यायालय को पुलिस व्यवस्था में जरूरी सुधार के लिए हिदायत देने को मजबूर होना पड़ा है। किन्तु ब्रितानी हुकूमत के दौरान 1861 बने ‘पुलिस एक्ट’ में बदलाव लाकर कोई ऐसा कानून अस्तित्व में आए जो पुलिस को कानून के दायरे में काम करने को बाध्य करे और पुलिस की भूमिका जनसेवक के रूप में चिह्नित हो, क्या ऐसा नैतिकता और ईमानदारी के बिना सम्भव है? पुलिस राजनीतिज्ञों के दखल के साथ पहुंच वाले लोगों के अनावश्यक दबाव से भी मुक्त रहते हुए जनता के प्रति संवेदनशील बने ऐसे फलित तब सामने आएंगे जब कानून निर्माता व नियंता ‘अपनी पुलिस के बजाय अच्छी पुलिस’ बनाने की कवायद करें। पुलिस को समर्थ व जवाबदेह बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस व्यवस्था को व्यावहारिक बनाने की दृष्टि से सोराबजी समिति की सिफारिशें लागू करने की हिदायत राज्यों को दी थी। पर पुलिस की कार्यपण्राली को जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप बनाने की पहल किसी भी राज्य सरकार ने नहीं की। न्यायालय ने पुन: पांच साल पुराने निर्देशों को दोहरा कर सुसुप्त राज्य सरकारों को चेताया है। चूंकि ‘पुलिस’ राजनीतिज्ञों के पास एक ऐसे संवैधानिक औजार की तरह है जो विपक्षियों को कानूनन फंसाने या उन्हें जलील व उत्पीड़ित करने के आसान तरीके के रूप में पेश आता है लिहाजा इसको विपक्षी दल सत्ताधारियों के हाथ का खिलौना कहते नहीं अघाते। पर जब इसे जनहितकारी बनाने की हिदायत सुप्रीम कोर्ट दे रहा है तब कांग्रेस व साम्यवादी राज्य सरकारों की बात छोड़िए, ‘कथित राष्ट्रवादी दलों’ की सरकारें तक ‘ब्रिटिश कालीन एक्ट’ को पलटने की उदारता नहीं दिखा रहीं, जो पानी पी-पीकर फिरंगी हुकूमत को कोसती रहती हैं। इससे जाहिर है सभी राजनीतिक दलों की फितरत कमोबेश एक जैसी है। नौकरशाही की तो डेढ़ सौ साल पुराने इस कानून के बने रहने में बल्ले-बल्ले है ही। सो पूरे देश में ‘यथा राजा, तथा प्रजा’ की कहावत फलीभूत हो रही है। इसे दुर्भाग्य कहा जाएगा कि आजादी के 63 साल बाद भी पुलिस की कानूनी संरचना, संस्थागत ढांचा और काम करने का तरीका औपनिवेशिक नीतियों का पिछलग्गू है। अलबत्ता, इसमें परिवर्तन की मांग न सिर्फ लम्बी बल्कि लाजिमी है। लिहाजा इस क्रम में कई समितियां व आयेग बने और उन्होंने सिफारिशें भी कीं परन्तु कोर्ट के बार-बार निर्देशरे के बावजूद राज्य सरकारें सिफारिशें लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देने के बजाय इन्हें टालती रही हैं। कुछ सरकारें तो न्यायालय के आदेश को विधायिका व कार्यपालिका में दखल के रूप में देखती हैं। सोराबजी समिति ने पुलिस विधेयक का जो आदर्श प्रारूप तैयार किया है, वह ठंडे बस्ते में है। पुलिस की स्वच्छ छवि के लिए जरूरी है कि उसे दबावमुक्त बनाया जाए क्योंकि पुलिस काम तो सत्ताधारियों के दबाव में करती है, लेकिन जलील खुद उसे होना पड़ता है। झूठे मामलों में कोर्ट की फटकार का सामना पुलिस को करना होता है। पुलिस के आला अधिकारियों की निश्चित अवधि के लिए तैनाती भी जरूरी है क्योंकि सिर पर तबादले की तलवार लटकी हो तो पुलिस भयमुक्त या भयनिरपेक्ष कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकती है। पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के लिए बाध्यकारी बनाए जाने की कवायद भी सिफारिशों में है। वजह यह है कि पुलिस कमजोर और पहुंच विहीन व्यक्ति के खिलाफ तुरंत एफआईआर लिख लेती है, लेकिन ताकतवर के खिलाफ ऐसा नहीं करती। नाइंसाफी का शिकार बने लोग मामलों को अदालत के संज्ञान में ला रहे हैं और ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है। इस वजह से पहली नजर में जो जिम्मा पुलिस का है उसका निर्वहन अदालतों को करना पड़ रहा है। उन पर यह अतिरिक्त बोझ है। ऐसे मामले अपवाद रूप में ही पेश होने चाहिए। कोर्ट ने निर्देशित भी किया है कि पुलिस किसी का एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। दिल्ली हाईकोर्ट ने तो एफआईआर की प्रति भी अनिवार्यत: फरियादी को देने और उसे फौरन वेबसाइट पर डालने की हिदायत दी है। राष्ट्रीय पुलिस आयोग भी पुलिस की कार्यपण्राली से संतुष्ट नहीं है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक देश में 60 फीसद ऐसे लोगों को हिरासत में लिया जाता है, जिन पर लगे आरोप सही नहीं होते। कारागारों में बंद 42 फीसद कैदी इसी श्रेणी के हैं। इन्हीं कैदियों के रखरखाव और भोजन पानी पर सबसे ज्यादा धनराशि खर्च होती है। आरुषि हत्याकाण्ड, असीमानंद की गिरफ्तारी और बांदा में बसपा विधायक द्वारा बलात्कार की शिकार नाबालिग किशोरी की हिरासत कुछ ऐसे ताजा मामले हैं जिनमें सीबीआई और पुलिस की नाकामी जाहिर तो हुई ही, निदरेषों को प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी है। इसलिए राज्य सरकारों को पुलिस व्यवस्था में सुधार की जरूरत को नागरिक हितों की सुरक्षा के तईं देखने की जरूरत है, न कि पुलिस को राजनीतिक हित-साध्य के लिए खिलौना बनाने की।